Connect with us

अंतर्राष्ट्रीय

क्या वायरल वीडियो से तय होगी देश की ईंधन नीति? या फिर व्यूज की दौड़ में फैलाया जा रहा है भ्रम….

खबर शेयर करें -

 

क्या वायरल वीडियो से तय होगी देश की ईंधन नीति? या फिर व्यूज की दौड़ में फैलाया जा रहा है भ्रम

मनोज लोहनी

देश में E20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। इसकी वजह एक यूट्यूबर का वह दावा है, जिसमें उन्होंने अपनी कार की माइलेज में आई भारी गिरावट के लिए E20 पेट्रोल को जिम्मेदार ठहराया। वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कुछ लोगों ने बिना किसी तकनीकी जांच के इस दावे को सच मान लिया, तो कुछ ने सरकार की पूरी ईंधन नीति पर ही सवाल खड़े कर दिए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी एक व्यक्ति का अनुभव, वह भी बिना किसी आधिकारिक जांच के, देश की ऊर्जा नीति पर फैसला सुनाने का आधार बन सकता है?

 

 

आज का दौर सोशल मीडिया का है, जहां कुछ ही मिनटों में कोई भी वीडियो लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। ऐसे माहौल में कंटेंट बनाने वालों की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। यदि कोई दावा तकनीकी विषय से जुड़ा हो और उसका असर करोड़ों उपभोक्ताओं पर पड़ सकता हो, तो उसे सार्वजनिक करने से पहले तथ्यों की पुष्टि करना भी उतना ही जरूरी है। लेकिन अफसोस, आज कई बार तथ्य बाद में और सनसनी पहले दिखाई देती है।

 

 

यह सवाल भी उठना लाजिमी है कि क्या इस तरह के दावे वास्तव में किसी तकनीकी समस्या को उजागर करने के लिए किए जा रहे हैं या फिर सोशल मीडिया पर चर्चा, लाइक्स और व्यूज हासिल करने की होड़ का हिस्सा बन चुके हैं? क्योंकि जितना बड़ा विवाद, उतनी बड़ी पहुंच और उतनी ही ज्यादा कमाई। ऐसे में यदि बिना प्रमाण किसी नीति या उत्पाद को कठघरे में खड़ा किया जाए, तो उसका नुकसान केवल सरकार या कंपनियों को नहीं, बल्कि आम जनता को भी उठाना पड़ता है।

 

 

दरअसल, E20 पेट्रोल कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं है। इसके पीछे वर्षों का शोध, परीक्षण और चरणबद्ध तैयारी है। सरकार ने इसे लागू करने का उद्देश्य विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना, किसानों को इथेनॉल उत्पादन के माध्यम से अतिरिक्त आय उपलब्ध कराना, पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन कम करना और देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना बताया है। यह एक राष्ट्रीय नीति है, जिसे वैज्ञानिक अध्ययन और विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर आगे बढ़ाया गया है।

 

 

ऐसे में यदि कोई यह दावा करता है कि उसकी कार की माइलेज अचानक आधी या उससे भी कम हो गई और उसका एकमात्र कारण E20 पेट्रोल है, तो स्वाभाविक रूप से इसकी तकनीकी जांच होनी चाहिए। लेकिन जांच से पहले ही इसे अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं कहा जा सकता। किसी भी वाहन की माइलेज केवल ईंधन पर निर्भर नहीं करती। इंजन की स्थिति, सर्विसिंग, ड्राइविंग का तरीका, ट्रैफिक, सड़क की स्थिति, टायरों का दबाव, वाहन पर भार, मौसम और ईंधन की गुणवत्ता जैसे कई कारक माइलेज को प्रभावित करते हैं। इसलिए किसी एक कारण को दोषी ठहरा देना तकनीकी रूप से भी सही नहीं माना जाता।

 

 

 

यह भी याद रखना होगा कि देश में लाखों वाहन रोजाना E20 पेट्रोल पर चल रहे हैं। यदि वास्तव में यह ईंधन हर वाहन की माइलेज को इतनी गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा होता, तो देशभर से बड़ी संख्या में प्रमाणित शिकायतें सामने आतीं और वाहन निर्माता कंपनियां भी इसे लेकर खुलकर चिंता जतातीं। लेकिन फिलहाल ऐसा कोई व्यापक तकनीकी निष्कर्ष सामने नहीं आया है, जो यह साबित करता हो कि E20 पेट्रोल ही इस तरह की समस्याओं का मुख्य कारण है।

 

 

 

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यहां व्यक्तिगत अनुभव कई बार सार्वभौमिक सच बनाकर पेश कर दिए जाते हैं। लाखों लोग बिना जांच-पड़ताल के उन पर विश्वास भी कर लेते हैं। लेकिन किसी एक वीडियो या व्यक्तिगत अनुभव को वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जा सकता। तकनीकी विषयों पर अंतिम राय विशेषज्ञों, परीक्षणों और प्रमाणों के आधार पर ही बननी चाहिए।

 

 

 

लोकप्रियता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। जिन लोगों के लाखों-करोड़ों दर्शक हैं, उनके एक-एक शब्द का असर व्यापक होता है। इसलिए ऐसे दावे करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतना आवश्यक है। यदि किसी वाहन में वास्तव में समस्या है तो संबंधित कंपनी, अधिकृत सर्विस सेंटर और तकनीकी एजेंसियों के माध्यम से उसकी जांच कराई जानी चाहिए। यदि जांच में E20 जिम्मेदार साबित होता है तो उस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन बिना किसी निष्कर्ष के राष्ट्रीय नीति पर अविश्वास पैदा करना जनहित में नहीं कहा जा सकता।

 

 

 

लोकतंत्र में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन सवाल तथ्यों, आंकड़ों और प्रमाणों के आधार पर होने चाहिए। केवल वायरल वीडियो के सहारे देश की ऊर्जा नीति पर अविश्वास पैदा करना न तो जिम्मेदार पत्रकारिता है और न ही जिम्मेदार डिजिटल कंटेंट।

आखिरकार, देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों का भविष्य और पर्यावरण संरक्षण जैसे गंभीर विषय सोशल मीडिया की सनसनी से कहीं बड़े हैं। इन पर बहस जरूर होनी चाहिए, लेकिन तथ्यों के साथ। क्योंकि देश की नीतियां वायरल वीडियो से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध, तकनीकी परीक्षण और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं।

Continue Reading
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

More in अंतर्राष्ट्रीय

Recent Posts

Facebook

Trending Posts