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महाराणा की महिमा का आधार तो लोककाव्य और लोकगाथाएं हैं

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राजेंद्र रंजन चुतर्वेदी
वरिष्ठ लेखक-लोकवार्ता और ब्रज साहित्य

इस बात में भला किसको शंका हो सकती है कि राष्ट्रीय-अन्दोलन के दिनों में महाराणा के वीर -चरित्र ने देश की स्वतन्त्रता के लिये समष्टि-चेतना को आन्दोलित किया था ?वह प्रसंग हिला देता है ,जब उनकी पुत्री भूखी थी और घास की रोटी को भी वन-बिलाव ले गया था ।उन्होंने संधि के प्रस्ताव पर भी सोच लिया था !इतिहास की बात इतिहासकार जानें किन्तु महाराणा की महिमा का आधार तो लोककाव्य और लोकगाथाएं हैं ।वे भूभरिया ,जो आजतक महाराणा की आन को निभा रहे हैं , कोई मानवशास्त्री उनके बीच रह कर उनको पहचाने तो सही >> मूं भूख मरूं मूं प्यास मरूं ,घास्याणी रोटी खाऊं सूं ।सुख-दुख रौ साथी चेतकड़ौ राणा री पार लगावै सै ।रहीम खानखाना की बेगम को अत्यन्त प्रतिष्ठा और सम्मान के साथ रहीम के पास क्षमायाचना के साथ पंहुचवाया था और रहीम ने अकबर से कहा था कि ऐसा शत्रु भी भाग्य से ही मिलता है । जयशंकर प्रसाद ने महाराणा का महत्त्व में इस प्रसंग को लिया है ।रांगेयराघव ने आंधी की नींव उपन्यास लिखा ।निराला ने लिखा । जगन्ना्थप्रसाद मिलिन्द की प्रताप प्रतिज्ञा ,गोकुलचन्द्र जी का प्रणवीर प्रताप ,ब्रजेन्द्र अवस्थी का चेतक । हरिपालनिराश का प्रताप परिताप ।मैथिलीशरणगुप्त , बालकृष्णशर्मा नवीन , रामनरेशत्रिपाठी ,श्यामनारायण पांडेय ,मखनलालचतुर्वेदी ,रामधारीसिंहदिनकर ,शान्तिप्रियद्विवेदी,कन्हैयालाल जी सेठिया, लाला भगवान ‘दीन आदि ने महाराणा को अपने काव्य में नमन किया है ।हिन्दी के साथ ही तेलुगु .गुजराती ,बंगाली ,मराठी ,कन्नड़ ,अंग्रेजी और संस्कृत में भी महाराणा को आधार बना कर काव्य ,नाटक , उपन्यास लिखे गये हैं ।

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