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ब्रेक के बाद फुल एक्टिव—दून से दिल्ली तक सियासी मूव, देहरादून में संदेश, दिल्ली में रणनीति—फिर सक्रिय हुए हरीश रावत
देहरादून में संदेश, दिल्ली में रणनीति—फिर सक्रिय हुए हरीश रावत
ग्राउंड से लेकर दिल्ली तक एक्टिव मोड में हरीश रावत
दून में शक्ति दिखाने के बाद दिल्ली में सियासी मंथन
ब्रेक के बाद फुल एक्टिव—दून से दिल्ली तक सियासी मूव
दिल्ली में मुलाकात से सक्रिय हुई सियासत, हरीश रावत की नई पारी के संकेत
हल्द्वानी। उत्तराखंड की राजनीति में हलचल अक्सर संकेतों से समझी जाती है और इस बार भी मामला कुछ ऐसा ही दिख रहा है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरीश रावत की दिल्ली में कुमारी शैलजा से मुलाकात ने राजनीतिक चर्चाओं को नई दिशा दे दी है।
लंबे समय तक सार्वजनिक और संगठनात्मक गतिविधियों से दूरी बनाए रखने के बाद हरीश रावत ने अचानक सक्रियता बढ़ाई है। देहरादून में अपने ‘फल भोज’ कार्यक्रम से कार्यकर्ताओं के बीच उपस्थिति दर्ज कराने के अगले ही दिन उनका नई दिल्ली पहुंचना और प्रदेश प्रभारी से मुलाकात करना महज औपचारिकता नहीं माना जा रहा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह मुलाकात संगठनात्मक रणनीति और आगामी कार्यक्रमों के लिहाज से बेहद अहम हो सकती है, खासकर 27 अप्रैल से ऋषिकेश से शुरू होने वाले प्रस्तावित जनसंपर्क दौरे के संदर्भ में।
उत्तराखंड कांग्रेस में कुमारी शैलजा बतौर प्रभारी संगठन और रणनीति की कमान संभाल रही हैं। ऐसे में हरीश रावत जैसे वरिष्ठ और जनाधार वाले नेता का सीधे उनसे संवाद करना यह दर्शाता है कि पार्टी आगामी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर गंभीर है।
रावत ने हाल ही में “उपार्जित अवकाश” लिया था, जिसके दौरान वे पार्टी गतिविधियों से दूर रहे। इस दौरान उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन अब देहरादून में कार्यकर्ताओं से जुड़ाव, पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों के जरिए जमीनी संदेश और तुरंत दिल्ली जाकर हाईकमान से संपर्क जैसे कदम एक सुनियोजित वापसी की ओर इशारा करते हैं।
उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी और नेतृत्व के सवालों से जूझती रही है। ऐसे में हरीश रावत का अनुभव और कुमारी शैलजा का संगठनात्मक नियंत्रण, इन दोनों का तालमेल पार्टी के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
27 अप्रैल से प्रस्तावित ऋषिकेश दौरे को केवल जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं बल्कि संगठन को रिचार्ज करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। यह दौरा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने, जनता के मुद्दों को उठाने और आगामी चुनावी रणनीति की नींव रखने का माध्यम बन सकता है।
इस पूरी कवायद से एक स्पष्ट संकेत निकलता है कि हरीश रावत अब बैकफुट से फ्रंटफुट पर आ चुके हैं, कांग्रेस हाईकमान उत्तराखंड में नई सक्रियता चाहता है और आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो सकती है।
हरीश रावत और कुमारी शैलजा की यह मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक बैठक नहीं बल्कि उत्तराखंड कांग्रेस की आगामी रणनीति का संकेत मानी जा रही है। अब नजरें 27 अप्रैल से शुरू होने वाले दौरे और उसके राजनीतिक प्रभाव पर टिकी होंगी, जो यह तय करेगा कि कांग्रेस राज्य की राजनीति में कितनी मजबूती से वापसी कर पाती है।
