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अब क्या ‘तीरथ’ चाहते हैं त्रिवेंद्र

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मनोज लोहनी, हल्द्वानी

अपनी ही सरकार के खिलाफ बयानबाजी, सरकार के कार्यों को कमतर बताना, ऐसी सीख इस वक्त तीरथ सिंह रावत और त्रिवेंद्र सिंह रावत जनता के बीच बांट रहे हैं जिसे समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं। क्या यह कुर्सी जाने की पीड़ा और छटपटाहट है, या फिर दोनों ही नेता जनता के बीच यह सिद्ध करना चाह रहे हैं की वह राजा हरीश चंद्र की राह पर चले थे उसी राह चलेंगे!!! वह राह जहां जनता सर्वोपरि और जनता को अगर जरा भी कष्ट हुआ तो राजा कुर्सी त्यागने को आतुर। इधर त्रिवेंद्र जनता के हित में अचानक स्मार्ट और राजनीतिक चातुर्य का प्रदर्शन कर रहे हैं यह बताकर की काम स्मार्ट नहीं हो रहे, मगर इस बात का अर्थ जनता कम उनकी पार्टी ज्यादा समझ रही है, इसीलिए पार्टी प्रदेश अध्यक्ष ने उलाहना दी कि ऐसी बात जनता नहीं, परिवार के बीच आनी चाहिए।

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अब तीरथ, त्रिवेंद्र किस मनोदशा के चलते वह सब कर रहे हैं यह बात समझना वर्तमान सरकार और उसके मुखिया पुष्कर सिंह धामी के लिए समझना ज्यादा जरूरी हो जाता है। आखिर सरकार और संगठन को ताक पर रखकर वह कौन सी लॉबी खड़ी करने की कोशिश की जा रही है जो कुछ अस्थिर चाह रख रही है। राज्य में एक कमजोर विपक्ष की मौजूदगी में सरकार के सामने खुद अपनी ही लॉबी मजबूत विपक्ष की भूमिका में आखिर क्यों नजर आ रही है? वर्तमान सरकार के कामकाज क्या उसे असहज कर रहे हैं जब इन दोनों नेताओं के कार्यकाल में हुए घोटालों की परत अब खुल रही है जो कि इस वक्त की बड़ी उपलब्धि है। अपनी सरकार पर हमलावर होकर आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं अपने इस बात को संगठन को भी समझना होगा, यह जरूरी है। तीरथ, त्रिवेंद्र बनाम वर्तमान सरकार के मायने और मंशा से सावधान किसे रहना है, यह हम नहीं आप ही तय करें अब। नमस्कार।

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