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हरक की वापसी……तब हरक ने हरीश को पटका, अब हरीश ने हरक को पटका दिया!

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मनोज लोहनी
यह राजनीतिक पटखनें हैं। कब कौन, किसे कहां पटक दे कोई अंदाजा नहीं। वह भी तब चुनाव सिर पर हों। हालांकि एक राजनीतिक का पटका भी होता है। मगर यह पटकने से बिलकुल अलग है। २०१६ मार्च में हरीश रावत मुख्यमंत्री थे, हरक सिंह रावत उनकी सरकार में कैबिनेट मंत्री। तब हरक सिंह रावत ने ८ कांग्रेसियों के साथ मिलकर हरीश रावत की सरकार को पटक दिया। सारे के सारे भाजपा में जा पहुंचे। तब सदन के भीतर, हरक सिंह रावत को जोर-जोर से कहते हुए सुना गया…सरकार अल्पमत में आ गई है, सरकार गिर गई है….। हरक सिंह रावत ने सरकार को पटका जिसके मुखिया हरीश रावत थे। उन्हीं हरीश रावत ने शुक्रवार को हरक सिंह को बहुत प्यार से पटका दिया। हरक सिंह रावत को पटका देना इसलिए जरूरी था क्योंकि वह पिछले कई दिनों से त्रिशंके बने हुए अटके थे। इसलिए कि कुछ दिनों पहले भाजपा ने हरक सिंह रावत को पटक दिया था। इस पटखनी के बाद उनकी स्थिति अजीब हुई। इसलिए उन्हें कहीं न कहीं पटका पहनना जरूरी था। उनके और पटके के बीच में वही हरीश रावत थे जिनकी सरकार को हरक सिंह ने २०१६ में पटका था। जाहिर है, हरीश रावत खार में तो होंगे ही, मगर यह राजनीति है। पता नहीं क्या सोचा होगा, काफी इंतजार कराया, मगर आखिर भाई तो भाई हुआ। हरक सिंह पहले ही कह रहे थे कि हरीश रावत उनके बड़े भाई हैं। बड़े ने छोटे के कान भी अलग अंदाज में ऐंठे, एहसास कराया कि तुमने हमें २०१६ में गलत पटका था। ऐसे ही कोई क्या किसी को पटकता है। बहरहाल अब पटखनी का यह खेल हरक सिंह रावत के कांग्रेस का पटका पहनते ही खत्म हो गया है। रावत ने रावत को पटका दिया, अब आगे क्या होता है, यह हरक, हरीश ही जाने।

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