उत्तराखण्ड
क्या इस बार कुमाऊं का आएगा नंबर? उत्तराखंड में राज्यसभा की खाली हो रही सीट पर गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन की चर्चा तेज
देहरादून। उत्तराखंड में राज्यसभा की एक सीट खाली होने से पहले भाजपा के भीतर प्रत्याशी चयन को लेकर मंथन तेज हो गया है। मौजूदा राज्यसभा सांसद नरेश बंसल का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को पूरा हो रहा है और निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के अनुसार इस सीट के लिए 16 अक्टूबर को मतदान होना है। भाजपा की प्रदेश कोर कमेटी में शुक्रवार को संभावित नामों पर चर्चा और तीन नामों का पैनल तैयार किए जाने की बात सामने आई है।
लेकिन इस पूरी कवायद में एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है—क्या भाजपा इस बार राज्यसभा के लिए कुमाऊं से किसी चेहरे को मौका देगी?
तीनों सीटों पर गढ़वाल का प्रतिनिधित्व
फिलहाल उत्तराखंड की तीनों राज्यसभा सीटों पर भाजपा के ही सांसद हैं। इनमें महेंद्र भट्ट, डॉ. कल्पना सैनी और नरेश बंसल शामिल हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय की मौजूदा सूची भी इन तीनों को उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद के रूप में दर्ज करती है।
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के नजरिये से देखें तो तीनों सांसदों का संबंध गढ़वाल क्षेत्र से माना जाता है। यही वजह है कि नरेश बंसल का कार्यकाल समाप्त होने के साथ इस बार गढ़वाल बनाम कुमाऊं का क्षेत्रीय संतुलन भाजपा के सामने एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गया है।
कुमाऊं की ओर देखें तो राज्यसभा में उसका आखिरी प्रतिनिधित्व भगत सिंह कोश्यारी के रूप में रहा था, जिनका कार्यकाल 2008 से 2014 के बीच रहा। इसके बाद से कुमाऊं के किसी नेता को उत्तराखंड कोटे से राज्यसभा भेजने का अवसर नहीं मिला है।
यानी अगर केवल क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का आंकड़ा देखा जाए तो पिछले करीब एक दशक से अधिक समय से राज्यसभा में कुमाऊं की हिस्सेदारी नहीं रही है।
2027 से पहले क्षेत्रीय संतुलन भी अहम
राज्यसभा चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं बचा है। भाजपा अगले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है। ऐसे में प्रत्याशी चयन केवल संगठनात्मक या व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरणों तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व का पहलू भी चर्चा में है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि कुमाऊं से ही उम्मीदवार तय होना सुनिश्चित है। भाजपा के सामने संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व, राजनीतिक उपयोगिता और आगामी विधानसभा चुनाव के समीकरण जैसे कई पहलू हैं। हालिया रिपोर्टों में भी प्रत्याशी चयन में गढ़वाल-कुमाऊं संतुलन को संभावित कसौटी बताया गया है।
कुमाऊं से कई चेहरे, लेकिन फैसला दिल्ली से
कुमाऊं से भाजपा में कई ऐसे चेहरे हैं जिनके नाम अलग-अलग राजनीतिक चर्चाओं में सामने आते रहे हैं। वहीं गढ़वाल क्षेत्र से भी पार्टी के पास अनुभवी और संगठन में सक्रिय नेताओं की लंबी सूची है।
यही वजह है कि प्रदेश स्तर पर नामों को लेकर चर्चा के बावजूद अंतिम निर्णय केंद्रीय नेतृत्व को करना है। भाजपा कोर कमेटी में संभावित नामों का पैनल तैयार होने के बाद उसे केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखा जाना है।
एक और समीकरण इस चुनाव को दिलचस्प बनाता है। मौजूदा राज्यसभा सांसद नरेश बंसल वैश्य समाज से आते हैं। इसलिए पार्टी के सामने क्षेत्रीय संतुलन के साथ-साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी रहेगा। इसी संदर्भ में पूर्व मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल का नाम भी चर्चाओं में आया है। हालांकि भाजपा की ओर से अंतिम प्रत्याशी की घोषणा अभी नहीं हुई है।
भगत सिंह कोश्यारी के बाद पहली बार कुमाऊं की उम्मीद?
कुमाऊं के लिहाज से इस बार की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि भगत सिंह कोश्यारी के बाद राज्यसभा में कुमाऊं का प्रतिनिधित्व नहीं रहा है। दूसरी ओर वर्तमान में तीनों सीटें गढ़वाल क्षेत्र के नेताओं के पास हैं।
ऐसे में भाजपा यदि क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को आधार बनाती है तो कुमाऊं का दावा स्वाभाविक रूप से चर्चा में आएगा। लेकिन यदि पार्टी किसी दूसरे सामाजिक, संगठनात्मक या चुनावी समीकरण को प्राथमिकता देती है तो तस्वीर अलग भी हो सकती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 25 नवंबर को खाली होने वाली राज्यसभा सीट के लिए भाजपा गढ़वाल के मौजूदा प्रतिनिधित्व को जारी रखती है या इस बार कुमाऊं को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व देने का फैसला करती है?
नामांकन की प्रक्रिया 29 सितंबर से शुरू होनी है और 6 अक्टूबर नामांकन की अंतिम तारीख है। ऐसे में अगले कुछ दिनों में यह तस्वीर साफ होने की उम्मीद है कि उत्तराखंड भाजपा राज्यसभा की इस सीट के जरिए क्षेत्रीय संतुलन का संदेश देती है या किसी अन्य समीकरण को प्राथमिकता देती है।

