उत्तराखण्ड
गहरे कोमा से जिंदगी की ओर लौटे पान सिंह, डॉ. महेश शर्मा ने दी नई जिंदगी
हल्द्वानी। हाथ-पैरों की ताकत लगातार कम होना और चलने में परेशानी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज करना कई बार गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी का संकेत हो सकता है। हल्द्वानी के विवेकानंद अस्पताल में ऐसे ही एक गंभीर मामले में समय पर चिकित्सकीय उपचार और न्यूरोसर्जरी के जरिए मरीज को नई जिंदगी मिली।
श्री पान सिंह पिछले करीब एक महीने से चल नहीं पा रहे थे। इस दौरान उनके हाथ-पैरों की ताकत भी धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। उन्होंने इस बीच झाड़-फूंक का सहारा लिया और कुछ राहत भी महसूस हुई, लेकिन बीमारी की वास्तविक वजह सामने नहीं आ सकी। अचानक एक दिन वह बेहोश होकर गहरे कोमा में चले गए। इसके बाद परिजन उन्हें गंभीर हालत में विवेकानंद अस्पताल लेकर पहुंचे।
अस्पताल में तत्काल जांच के दौरान सीटी स्कैन में मस्तिष्क के भीतर काफी बड़ा रक्त का थक्का जमा मिला। चिकित्सकीय भाषा में मस्तिष्क के भीतर रक्त का इस तरह जमा होना आसपास के ऊतकों पर दबाव डाल सकता है। दबाव बढ़ने पर मरीज में कमजोरी, चलने में परेशानी, बोलने में दिक्कत, बेहोशी और गंभीर स्थिति में कोमा जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।
मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए विवेकानंद अस्पताल के वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. महेश शर्मा ने तत्काल ऑपरेशन कर मस्तिष्क में जमा रक्त के थक्के को बाहर निकाला। उपचार के बाद मरीज की हालत में तेजी से सुधार हुआ और महज 2-3 दिन में उन्हें दोबारा होश आ गया। इसके बाद उन्होंने सामान्य गतिविधियां भी करना शुरू कर दीं।
चिकित्सकों के अनुसार, मस्तिष्क से जुड़ी कई बीमारियों में शुरुआती लक्षण धीरे-धीरे सामने आ सकते हैं। शरीर के किसी हिस्से में लगातार कमजोरी, चेहरे में कमजोरी या टेढ़ापन, आवाज में परेशानी, चलने में असंतुलन अथवा अचानक बेहोशी जैसे लक्षणों को सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण सामने आने पर सीटी स्कैन या एमआरआई जैसी जांच के जरिए कारण का पता लगाना बेहद जरूरी है।
डॉ. महेश शर्मा के अनुसार, झाड़-फूंक आस्था का विषय है, जिस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है, लेकिन बीमारी के लक्षण सामने आने पर चिकित्सकीय परामर्श लेने में देरी नहीं होनी चाहिए। समय पर जांच और सही उपचार मिलने से गंभीर स्थिति को जटिल होने से बचाया जा सकता है।

