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उत्तराखण्ड

ग्राम प्रधान से शुरू हुआ सफर, अब 14वें चुनाव की चाह! करीब 55 साल की राजनीति में हरीश रावत ने कितने चुनाव लड़े, कहां जीते-कहां हारे?

 

 

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत का चुनावी सफर एक बार फिर चर्चा में है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने आगामी विधानसभा चुनाव में हरिद्वार जिले की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की है। 24 सितंबर को सोशल मीडिया पर लिखे संदेश में उन्होंने कहा कि उम्र बढ़ रही है, लेकिन हरिद्वार के साथ उनका जुड़ाव भी बढ़ रहा है और उनके मन में हरिद्वार के लिए कई योजनाएं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह एक बार फिर हरिद्वार का विधानसभा में प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं।

 

रावत की इस इच्छा को उनके पूरे राजनीतिक सफर के संदर्भ में देखें तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है। ग्राम स्तर की राजनीति से शुरुआत करने वाले हरीश रावत करीब साढ़े पांच दशक से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं और सीधे चुनावी मुकाबलों की बात करें तो अब तक 13 चुनाव लड़ चुके हैं। इनमें नौ लोकसभा और चार विधानसभा चुनाव शामिल हैं। 2027 में यदि वह विधानसभा चुनाव के मैदान में उतरते हैं तो यह उनका 14वां प्रत्यक्ष चुनावी मुकाबला होगा।

 

ग्राम प्रधान से शुरू हुआ राजनीतिक सफर

 

हरीश रावत की राजनीति की शुरुआत सीधे संसद से नहीं हुई थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह गांव लौटे और ग्रामीणों के आग्रह पर ग्राम प्रधान का चुनाव लड़ा। इसके बाद वह ब्लॉक प्रमुख बने। उपलब्ध जीवन-परिचयों में ग्राम प्रधान के रूप में करीब एक वर्ष और ब्लॉक प्रमुख के रूप में करीब दो वर्ष की भूमिका का उल्लेख मिलता है। 2026 में उनके जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री में भी ग्रामसभा स्तर से मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री तक की राजनीतिक यात्रा का उल्लेख किया गया है।

 

उनके शुरुआती राजनीतिक जीवन के वर्ष को लेकर अलग-अलग स्रोतों में मामूली अंतर मिलता है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि उनकी जमीनी राजनीति 1970 के दशक की शुरुआत में शुरू हो गई थी। इसके बाद वह युवा कांग्रेस, कांग्रेस संगठन और श्रमिक संगठनों से जुड़े और धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीति की ओर बढ़े। 2024 में न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने भी उनके राजनीतिक सफर को करीब छह दशक के अनुभव वाला सफर बताया था।

 

यानी 2026 में उनकी राजनीतिक सक्रियता को करीब 54-55 वर्ष का सफर कहा जा सकता है।

 

1980 : पहली बार लोकसभा और फिर लगातार तीन जीत

 

हरीश रावत के चुनावी सफर का पहला बड़ा पड़ाव 1980 का लोकसभा चुनाव था। उन्होंने अल्मोड़ा लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद 1984 और 1989 में भी वह अल्मोड़ा से लोकसभा चुनाव जीतकर लगातार तीसरी बार संसद पहुंचे। चुनावी रिकॉर्ड में इन तीनों चुनावों में उनकी जीत दर्ज है।

 

लेकिन इसके बाद कहानी बदल गई। 1991 में वह अल्मोड़ा से चुनाव हार गए। इसके बाद 1996, 1998 और 1999 में भी उन्हें लगातार हार का सामना करना पड़ा। यानी 1991 से 1999 के बीच वह लोकसभा के चार चुनाव लगातार हारते रहे।

 

फिर करीब एक दशक बाद उन्होंने दोबारा लोकसभा चुनाव जीता। 2009 में हरिद्वार लोकसभा सीट से चुनाव लड़कर वह संसद पहुंचे। यही वह चुनाव था जिसने उन्हें अल्मोड़ा से हरिद्वार की राजनीति के केंद्र में ला दिया।

 

2019 में उन्होंने फिर लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार नैनीताल-ऊधमसिंह नगर सीट से भाजपा के अजय भट्ट के सामने उन्हें हार मिली। इस तरह लोकसभा में उनके खाते में कुल नौ चुनावी मुकाबले, चार जीत और पांच हार दर्ज हैं।

 

लोकसभा में हरीश रावत का पूरा चुनावी हिसाब

 

1980 — अल्मोड़ा — जीत

 

1984 — अल्मोड़ा — जीत

 

1989 — अल्मोड़ा — जीत

 

1991 — अल्मोड़ा — हार

 

1996 — अल्मोड़ा — हार

 

1998 — अल्मोड़ा — हार

 

1999 — अल्मोड़ा — हार

 

2009 — हरिद्वार — जीत

 

2019 — नैनीताल-ऊधमसिंह नगर — हार

 

यानी लोकसभा : 9 चुनाव, 4 जीत और 5 हार।

 

राज्यसभा का चुनावी सफर अलग

 

इन आंकड़ों में 2002 का राज्यसभा निर्वाचन शामिल नहीं है, क्योंकि हरीश रावत राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे और यह लोकसभा या विधानसभा की तरह प्रत्यक्ष चुनावी मुकाबला नहीं था। वह 2002 से 2008 तक राज्यसभा सदस्य रहे।

 

मुख्यमंत्री बनने के लिए पहली बार विधानसभा का चुनाव

 

2014 में मुख्यमंत्री बनने के बाद विधानसभा की सदस्यता के लिए हरीश रावत ने धारचूला विधानसभा सीट पर उपचुनाव लड़ा और जीत हासिल की। यह उनका पहला विधानसभा चुनावी मुकाबला था।

 

इसके बाद 2017 का विधानसभा चुनाव उनके चुनावी जीवन का एक खास अध्याय बना। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने एक साथ दो विधानसभा सीटों—हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा—से चुनाव लड़ा। दोनों जगह उन्हें हार मिली। हरिद्वार ग्रामीण में यतीश्वरानंद और किच्छा में राजेश शुक्ला ने उन्हें पराजित किया।

 

इसके बाद 2022 में कांग्रेस ने उन्हें लालकुआं विधानसभा सीट से मैदान में उतारा। यहां भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट से उन्हें हार मिली। इस तरह विधानसभा के चार चुनावी मुकाबलों में उनके खाते में एक जीत और तीन हार हैं।

 

विधानसभा में हरीश रावत का पूरा हिसाब

 

2014 — धारचूला उपचुनाव — जीत

 

2017 — हरिद्वार ग्रामीण — हार

 

2017 — किच्छा — हार

 

2022 — लालकुआं — हार

 

यानी विधानसभा : 4 चुनावी मुकाबले, 1 जीत और 3 हार।

 

13 चुनाव, पांच जीत और आठ हार

 

लोकसभा और विधानसभा को जोड़ दें तो तस्वीर पूरी तरह सामने आती है। हरीश रावत ने अब तक कुल 13 प्रत्यक्ष चुनावी मुकाबले लड़े हैं। इनमें लोकसभा के नौ और विधानसभा के चार मुकाबले शामिल हैं।

 

इन 13 चुनावों में उन्हें पांच बार जीत मिली—1980, 1984, 1989, 2009 के लोकसभा चुनाव और 2014 का धारचूला विधानसभा उपचुनाव।

 

वहीं आठ चुनावों में हार का सामना करना पड़ा—1991, 1996, 1998, 1999, 2019 के लोकसभा चुनाव तथा 2017 में हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा और 2022 में लालकुआं विधानसभा चुनाव।

 

अब हरिद्वार से 14वें चुनाव की दस्तक

 

यही आंकड़ा हरीश रावत के ताजा बयान को महत्वपूर्ण बनाता है। 2022 के लालकुआं विधानसभा चुनाव के बाद से वह कोई प्रत्यक्ष चुनाव नहीं लड़े हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव भी उन्होंने नहीं लड़ा। अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने स्वयं हरिद्वार की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा सामने रख दी है।

 

हरिद्वार उनके लिए नया राजनीतिक मैदान भी नहीं है। 2009 में इसी हरिद्वार लोकसभा सीट ने उन्हें संसद पहुंचाया था और 2009 से 2014 का दौर वह अपने राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल बता चुके हैं। अब वही हरिद्वार उन्हें विधानसभा की ओर खींचता दिखाई दे रहा है।

 

हालांकि अभी कांग्रेस ने 2027 के लिए उनकी उम्मीदवारी घोषित नहीं की है। इसलिए फिलहाल इसे चुनाव लड़ने की इच्छा के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन अगर उनकी इच्छा उम्मीदवार बनने तक पहुंचती है और वह वास्तव में मैदान में उतरते हैं तो ग्राम प्रधान से शुरू हुआ करीब 55 साल का राजनीतिक सफर 2027 में 14वें प्रत्यक्ष चुनावी मुकाबले तक पहुंच जाएगा।

 

अल्मोड़ा से शुरू हुआ सफर, चार लोकसभा जीत, पांच लोकसभा हार, विधानसभा की एक जीत और तीन हार—और अब नजर फिर हरिद्वार पर। हरीश रावत के राजनीतिक सफर का अगला अध्याय 14वें चुनाव के रूप में लिखा जाएगा या नहीं, इसका फैसला अभी बाकी है, लेकिन रावत ने अपनी इच्छा सार्वजनिक कर दी है।

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