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हल्द्वानी, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, लोहाघाट समेत 2027 की तैयारी में भाजपा का बड़ा फोकस, हारी हुई 23 सीटों पर जीत का मिशन; सांसदों को सौंपी जिम्मेदारी

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2027 की तैयारी में भाजपा का बड़ा फोकस, हारी हुई 23 सीटों पर जीत का मिशन; सांसदों को सौंपी जिम्मेदारी

 

राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का स्पष्ट संदेश- पिछली हार को जीत में बदलने के लिए अभी से जुटे संगठन और सांसद

 

देहरादून। भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी अभी से शुरू कर दी है और इस बार पार्टी का सबसे बड़ा फोकस उन 23 विधानसभा सीटों पर है, जहां उसे 2022 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। तीन दिवसीय प्रवास पर देहरादून पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने संगठन की बैठकों में साफ संदेश दिया कि इन सीटों पर हर हाल में जीत सुनिश्चित करने के लिए विशेष रणनीति के तहत काम किया जाए।

 

 

बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि पिछली बार जिन सीटों पर भाजपा को पराजय मिली थी, वहां पार्टी को संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर अतिरिक्त मेहनत करनी होगी। उन्होंने कहा कि इन सीटों पर जीत केवल स्थानीय कार्यकर्ताओं की नहीं बल्कि सांसदों की भी जिम्मेदारी होगी। इसी उद्देश्य से राज्यसभा और लोकसभा सांसदों को इन क्षेत्रों में विशेष रूप से सक्रिय रहने के निर्देश दिए गए हैं।

 

 

सूत्रों के अनुसार, संगठन इन सीटों पर पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की तैनाती भी करेगा, जो लगातार क्षेत्र में रहकर संगठनात्मक गतिविधियों को मजबूत करेंगे और जनता से संवाद बढ़ाएंगे। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि जिन सीटों पर हार का अंतर कम रहा या स्थानीय कारणों से नुकसान हुआ, वहां समय रहते रणनीतिक प्रयास कर परिणाम बदले जा सकते हैं।

 

 

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा यमुनोत्री, बदरीनाथ, प्रतापनगर, चकराता, ज्वालापुर, भगवानपुर, झबरेड़ा, पिरान कलियर, खानपुर, मंगलौर, लक्सर, हरिद्वार ग्रामीण, धारचूला, पिथौरागढ़, द्वाराहाट, अल्मोड़ा, लोहाघाट, हल्द्वानी, जसपुर, बाजपुर, किच्छा, नानकमत्ता और खटीमा विधानसभा सीटों पर हार गई थी। इनमें कई सीटें ऐसी हैं जो क्षेत्रीय और राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में राष्ट्रीय अध्यक्ष का यह संदेश संकेत देता है कि भाजपा 2027 के चुनाव में अपनी पिछली कमजोरियों को ताकत में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि हारी हुई सीटों में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की जाती है तो सत्ता में वापसी का रास्ता और मजबूत होगा। यही कारण है कि संगठन अब जीत वाली सीटों के साथ-साथ हार वाली सीटों पर भी बराबर का फोकस कर रहा है।

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