उत्तराखण्ड
कांग्रेस को जिंदा करने आया हूं’… खड़गे के एक डायलॉग ने छेड़ी नई सियासी बहस, क्या खुद कांग्रेस अध्यक्ष मान रहे हैं पार्टी को ‘की वह जिंदा नहीं है ’?
‘कांग्रेस को जिंदा करने आया हूं’… खड़गे के एक डायलॉग ने छेड़ी नई सियासी बहस, क्या खुद कांग्रेस अध्यक्ष मान रहे हैं पार्टी को ‘की वह जिंदा नहीं है ’?
हल्द्वानी। उत्तराखंड में चुनावी सरगर्मियां तेज होने के साथ ही कांग्रेस और भाजपा के बीच जुबानी जंग भी धार पकड़ने लगी है। रुद्रपुर में कांग्रेस की बैठक को संबोधित करने पहुंचे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा। मगर उनके भाषण का एक संवाद ऐसा रहा, जिसने राजनीतिक बयानबाजी से आगे निकलकर नई चर्चा को जन्म दे दिया।
खड़गे ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के उस बयान का जवाब देते हुए कहा कि वह उत्तराखंड में ‘टूरिज्म करने नहीं आए हैं, बल्कि कांग्रेस को जिंदा करने और भाजपा को खत्म करने आए हैं।’ खड़गे का यही वाक्य अब कांग्रेस के भीतर और भाजपा के राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
दरअसल, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के उत्तराखंड दौरों पर सवाल उठाते हुए कहा था कि कांग्रेस के बड़े नेता पिछले चार वर्षों में प्रदेश में दिखाई नहीं दिए, लेकिन चुनाव नजदीक आते ही उनका उत्तराखंड दौरा शुरू हो गया है। धामी ने इसे राजनीतिक ‘टूरिज्म’ करार दिया था।
खड़गे ने इसी तंज को पकड़ते हुए पलटवार किया। लेकिन जवाब देते हुए उन्होंने जिस शब्द का इस्तेमाल किया, वही अब कांग्रेस के लिए राजनीतिक बहस का नया आधार बन गया है—‘जिंदा करना।’
‘जिंदा करना’ शब्द पर क्यों अटक गई सियासत?
राजनीति में शब्द महज शब्द नहीं होते। खासकर जब कोई राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष हजारों कार्यकर्ताओं के बीच किसी राज्य में चुनावी माहौल के दौरान भाषण दे रहा हो, तब उसके एक-एक शब्द का राजनीतिक अर्थ निकाला जाता है।
सामान्य अर्थ में किसी जीवित व्यक्ति या सक्रिय संगठन को ‘जिंदा करने’ की बात नहीं कही जाती। ‘जिंदा करना’ शब्द का इस्तेमाल प्रायः उस चीज के लिए होता है जो निष्क्रिय हो चुकी हो, कमजोर पड़ गई हो या लगभग समाप्ति की स्थिति में पहुंच गई हो।
यही वजह है कि खड़गे के इस बयान ने सवाल खड़ा कर दिया है—क्या कांग्रेस अध्यक्ष अनजाने में ही सही, उत्तराखंड में कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को ‘मृतप्राय’ मान रहे हैं?
भाजपा के लिए तो यह बयान स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हथियार बन सकता है। भाजपा इसे कांग्रेस की स्वीकारोक्ति के तौर पर पेश कर सकती है कि प्रदेश में पार्टी संगठन और राजनीतिक प्रभाव कमजोर स्थिति में है और अब राष्ट्रीय नेतृत्व को आकर उसे फिर से खड़ा करना पड़ रहा है।
धामी के ‘टूरिज्म’ तंज का जवाब देते-देते नई बहस
दरअसल, खड़गे का पूरा संवाद मुख्यमंत्री धामी के ‘टूरिज्म’ वाले तंज का जवाब था। धामी का कहना था कि कांग्रेस के बड़े नेता चार साल तक उत्तराखंड नहीं आए और अब चुनाव सामने देखकर प्रदेश में पहुंच रहे हैं।
खड़गे ने इसी आरोप को पलटते हुए कहा कि उनका उद्देश्य पर्यटन नहीं बल्कि कांग्रेस को मजबूत करना है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो खड़गे का संदेश साफ था—कांग्रेस चुनावी मैदान में सक्रिय है और भाजपा को चुनौती देने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व खुद मैदान में उतर रहा है।
लेकिन सियासत में कई बार संदेश से ज्यादा शब्द चर्चा में आ जाते हैं। यहां भी यही हुआ। ‘कांग्रेस को मजबूत करने’ या ‘कांग्रेस को फिर खड़ा करने’ जैसे शब्दों की जगह ‘कांग्रेस को जिंदा करने’ का इस्तेमाल हुआ और यही शब्द पूरे बयान का सबसे चर्चित हिस्सा बन गया।
क्या उत्तराखंड में कांग्रेस को सचमुच ‘जिंदा’ करने की जरूरत है?
यही वह सवाल है, जिस पर अब राजनीतिक विश्लेषण शुरू हो गया है।
उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस लंबे समय से भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी जरूर रही है, लेकिन पिछले चुनावी दौर में पार्टी को संगठनात्मक स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कई वरिष्ठ नेताओं के बीच मतभेद, संगठन में गुटबाजी, चुनावी स्तर पर लगातार कमजोर प्रदर्शन और भाजपा के मजबूत संगठन के सामने कांग्रेस की चुनौती जैसे मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
ऐसे में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का खुद उत्तराखंड आकर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना यह संकेत जरूर देता है कि पार्टी आगामी चुनाव को हल्के में नहीं लेना चाहती।
लेकिन सवाल यही है कि क्या कांग्रेस को केवल चुनाव के समय राष्ट्रीय नेतृत्व के दौरे से ‘जिंदा’ किया जा सकता है?
या फिर पार्टी को बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने, स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय करने और लगातार जनता के बीच मौजूद रहने की जरूरत है?
खड़गे के बयान का दूसरा राजनीतिक अर्थ भी
हालांकि इस बयान को केवल कांग्रेस की कमजोरी की स्वीकारोक्ति मानना भी पूरी तरह सही नहीं होगा।
राजनीतिक भाषणों में ‘जिंदा करना’ का इस्तेमाल कई बार किसी संगठन में नया जोश भरने, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और चुनावी संघर्ष को तेज करने के अर्थ में भी किया जाता है। खड़गे का आशय संभवतः यही था कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरनी है और भाजपा के खिलाफ पार्टी को निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार करना है।
लेकिन विपक्ष को राजनीतिक भाषा में यही मौका चाहिए होता है।
भाजपा अब यह सवाल पूछ सकती है कि अगर कांग्रेस पहले से मजबूत और सक्रिय थी तो उसे ‘जिंदा’ करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
और कांग्रेस पलटकर कह सकती है कि ‘जिंदा करना’ का अर्थ संगठन को खत्म मानना नहीं, बल्कि उसमें नया जोश भरना है।
एक शब्द, दो राजनीतिक अर्थ
खड़गे के बयान की सबसे दिलचस्प बात यही है कि एक ही शब्द के दो राजनीतिक अर्थ निकल रहे हैं।
कांग्रेस के लिए—‘जिंदा करना’ यानी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरना।
भाजपा के लिए—‘जिंदा करना’ यानी कांग्रेस की मौजूदा स्थिति को खुद कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा कमजोर मान लेना।
यानी मुख्यमंत्री धामी के ‘टूरिज्म’ वाले तंज का जवाब देने के लिए खड़गे ने जो डायलॉग चुना, वह अब खुद एक नया राजनीतिक सवाल बन गया है।
क्या खड़गे भाजपा को खत्म करने का संदेश दे रहे थे या अनजाने में कांग्रेस की कमजोरी का आईना दिखा गए?
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, संभव है कि खड़गे का यह एक वाक्य कांग्रेस और भाजपा दोनों के चुनावी भाषणों में बार-बार सुनाई दे। क्योंकि चुनावी राजनीति में कई बार पूरा भाषण नहीं, सिर्फ एक लाइन ही सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन जाती है।
