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व्यंग्य: यहां आला भूले, वहां कुर्सी टूटी…साथ में स्वास्थ्य विभाग के दो अति आवश्यक नियम

मनोज लोहनी
स्वास्थ्य है तो खराब होता ही है, ऐसा ही स्वास्थ्य विभाग के साथ भी है। कभीं छींक आती है तो कभी खांसी भी लाजिमी। छींक आई तो देहरादून तक हलचल नहीं होती, मगर खांसी आई तो बात दूर तलक चली जाती है। फैल जाती है, टीबी की तरह एक से दूसरे तक। यह परेशानियां होती ही हैं संक्रामक, कभी-कभी लाइलाज भी हो जाती हैं। देहरादून में अफसर की मैम को देखने डॉक्टर गए, आला भूल आए बाहर….। मगर अब उन्हें याद दिलाया जाना था कि भूलना क्या होता है! आला ले आला…और डॉक्टर ने तय कर लिया…जाला रे जाला। बात संक्रामक थी, तो फैल गई…ऐसी फैली कि जनता को सिस्टम का एक बड़ा नियम यह पता लग गया, जिसे स्वास्थ्य विभाग से संबंधित अति आवश्यक नियम भी कह सकते हैं। इस नियम के बारे में किसी भी डॉक्टर से कभी भी पूछा जा सकता है। जिसे नियम के बारे में ठीक से पता नहीं, फिर वह अपनी गत खुद तय कर ले। नियम यह पता चला- अगर स्वास्थ्य विभाग के किसी बड़े अधिकारी की पत्नी की तबीयत खराब हो तो उसे देखने के लिए ओपीडी में मरीजों को छोड़कर डॉक्टर को अधिकारी के घर पर ही जाना होता है, और उसे यह याद होना चाहिए कि उसे अपना आला बाहर खड़ी में नहीं भूलना होगा….!!!! इस नियम को शायद अब सरकारी विभाग के तमाम डॉक्टरों ने ठीक से याद भी कर लिया होगा। इस बीच स्वास्थ्य विभाग में थोड़ा हलचल (छींक टाइप) इधर कोटाबाग की तरफ भी हुई। बात यहां यह थी कि एक डॉक्टर बिना प्रभारी को बताए अपने बैठने के लिए या अपनी पुरानी हो चुकी कुर्सी को बदलने के लिए मीटिंग हाल से गलती से बिना प्रभारी को बताए एक अच्छी खासी ठीकठाक बॉस चेयर उठा लाया। फिर पता चला कि उसे वह चेयर नहीं मिलेगी और टूटी चेयर उसे दे दी गई थी जिसका कि वह इन दिनों विरोध करते हुए खड़े-खड़े ही मरीज देख रहे हैं। इस घटना से स्वास्थ्य विभाग से संबंधित एक ऐसा नियम पता लगा जिसके बारे में अगर मालूम न हो तो विभाग की इस कदर हंसी हो सकती है कि टूटी कुर्सी का बखेड़ा जैसे जुमले बन सकते हैं। यह नियम यह है- अगर किसी डॉक्टर की कुर्सी पुरानी या असहज हो गई हो तो वह बिना प्रभारी को बताए मीटिंग हॉल से अपने बैठने के लिए कुर्सी नहीं लाएगा, ऐसा करने पर मीटिंग हॉल से लाई गई बॉस चेयर के स्थान पर डॉक्टर के बैठने के लिए टूटी कुर्सी रख दी जाएगी….!!!!! और भी तमाम नियम हैं, बात निकलेगी तो नियम भी पता चलते रहेंगे, हम तो जनता हैं, हमें नहीं मालूम अंदर के नियम। बात खुलेगी तो नियम नंबर तीन भी आपके बताएंगे….तब तक के लिए राम राम।

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