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हल्द्वानी का रामलीला मैदान, दो बड़े नेता और देशभर में मचा सियासी बवाल…

हल्द्वानी का रामलीला मैदान, दो बड़े नेता और देशभर में मचा सियासी बवाल

खड़गे की सभा के बाद शुरू हुआ विवाद राहुल गांधी की एफआईआर तक पहुंचा, अब राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बना कुमाऊं का यह मैदान

हल्द्वानी। हल्द्वानी का रामलीला मैदान… जहां कभी रामलीला की गूंज सुनाई देती थी, जहां राजनीतिक सभाओं में स्थानीय मुद्दे उठते थे और जहां शहर की बड़ी गतिविधियां हुआ करती थीं। लेकिन इन दिनों यही रामलीला मैदान दिल्ली की सियासत से लेकर देशभर की राजनीतिक चर्चा तक सुर्खियों में है।

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी कहानी के केंद्र में हैं कांग्रेस के दो बड़े चेहरे—कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी।

कहानी की शुरुआत हुई खड़गे की हल्द्वानी के रामलीला मैदान में हुई सभा के बाद। सभा के कुछ समय बाद श्रीराम सेवा की ओर से मैदान में शुद्धिकरण यज्ञ कराया गया। संगठन की ओर से कहा गया कि सभा के बाद मैदान में गंदगी रह गई थी और इसी के विरोध में सफाई के साथ यज्ञ किया गया। आयोजकों ने यह भी दावा किया कि इस आयोजन में अनुसूचित जाति समाज के लोग भी शामिल हुए थे।

 

 

लेकिन इसके बाद मामला सिर्फ सफाई और यज्ञ तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस ने इसे दलित अपमान और छुआछूत से जोड़ दिया। कांग्रेस का आरोप था कि खड़गे दलित समाज से आते हैं और उनकी सभा के बाद मैदान का शुद्धिकरण किया जाना इसी मानसिकता को दर्शाता है।

 

 

दूसरी ओर भाजपा और आयोजन से जुड़े लोगों ने कांग्रेस के इस आरोप को खारिज किया। भाजपा का कहना रहा कि शुद्धिकरण किसी राजनीतिक दल ने नहीं कराया था, बल्कि श्रीराम सेवा की ओर से मैदान में गंदगी के विरोध और सफाई के उद्देश्य से यह आयोजन किया गया। भाजपा ने खड़गे की ओर से सनातन को लेकर की गई टिप्पणी को भी पूरे विवाद से जोड़कर कांग्रेस पर निशाना साधा।

यानी रामलीला मैदान में शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते कांग्रेस बनाम भाजपा की राजनीतिक बहस में बदल गया।फिर दिल्ली से आया राहुल गांधी का ‘हल्द्वानी कनेक्शन’। मामला तब और गरमा गया जब राहुल गांधी ने दिल्ली में इस प्रकरण का जिक्र कर दिया। राष्ट्रीय मंच से हल्द्वानी के रामलीला मैदान का नाम सामने आते ही स्थानीय विवाद की गूंज देश की राजनीति में सुनाई देने लगी।

और इसके बाद कहानी ने एक और बड़ा मोड़ ले लिया। राहुल गांधी के बयान के खिलाफ हल्द्वानी कोतवाली में एससी/एसटी एक्ट समेत विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कर दी गई। अब सवाल यह नहीं रह गया कि रामलीला मैदान में शुद्धिकरण क्यों हुआ था। सवाल यह भी बन गया कि जिस घटना ने हल्द्वानी में राजनीतिक हलचल पैदा की थी, वह आखिर दिल्ली तक कैसे पहुंची और उसी मामले में राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज हुई?

सियासत गरम, लेकिन चर्चा में हल्द्वानी

भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं। कांग्रेस इसे सामाजिक सम्मान और दलित अस्मिता से जोड़ रही है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक रंग दिए जाने का मामला बता रही है। लेकिन इस पूरे विवाद में एक बात दोनों से अलग है।

हल्द्वानी का रामलीला मैदान अब राष्ट्रीय पहचान बना चुका है। देश के किसी हिस्से में इस विवाद की चर्चा हो रही है तो साथ में हल्द्वानी का नाम लिया जा रहा है। राहुल गांधी के बयान की बात हो रही है तो रामलीला मैदान का जिक्र हो रहा है। एफआईआर की चर्चा हो रही है तो फिर वही मैदान सामने आ रहा है।

यानी जिस मैदान की पहचान अब तक हल्द्वानी और कुमाऊं तक सीमित थी, उसी मैदान ने एक राजनीतिक विवाद के जरिए दिल्ली तक अपनी जगह बना ली है।

खड़गे आए, विवाद हुआ… राहुल बोले तो एफआईआर हो गई

इस पूरे घटनाक्रम को अगर एक लाइन में समझें तो कहानी कुछ यूं है—

खड़गे की सभा हुई…
सभा के बाद शुद्धिकरण हुआ…
शुद्धिकरण पर सियासत हुई…
मामला दिल्ली पहुंचा…
राहुल गांधी ने बयान दिया…
और फिर हल्द्वानी में एफआईआर दर्ज हो गई।

इसलिए फिलहाल भाजपा और कांग्रेस के बीच कौन सही है और कौन गलत, यह बहस अपनी जगह है। कानूनी पहलू भी अपनी प्रक्रिया से आगे बढ़ेगा।

लेकिन राजनीतिक सुर्खियों में इस वक्त हल्द्वानी का रामलीला मैदान जरूर आगे निकल गया है।

 

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