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उत्तराखण्ड

कभी सियासी सुरों से नाराजगी, तो अचानक अब दिल्ली में दस्तक… हरदा को समझना आसान नहीं!

 

जनसंवाद यात्रा से हाईकमान की नाराजगी तक और फिर चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी प्रदर्शन में मौजूदगी; हरीश रावत की राजनीति में कब कौन-सा मोड़ आ जाए, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं

 

देहरादून/नई दिल्ली। उत्तराखंड की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत यानी हरदा एक ऐसा नाम हैं, जिन्हें केवल उनके बयानों, नाराजगी या राजनीतिक गतिविधियों के आधार पर समझने की कोशिश की जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाती है। उनकी राजनीति में कभी बागी तेवर दिखाई देते हैं, कभी पार्टी के प्रति समर्पण का संदेश मिलता है, कभी वह अपने ही संगठन के बीच अपनी प्रासंगिकता का सवाल खड़ा करते नजर आते हैं, तो कभी अचानक ऐसे मंच पर पहुंच जाते हैं, जहां से उनकी सियासी मौजूदगी फिर चर्चा का विषय बन जाती है। हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर हरदा की इसी राजनीतिक शैली को सामने ला दिया है।

 

उत्तराखंड में अपनी धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर कांग्रेस हाईकमान की नाराजगी झेलने वाले हरीश रावत के सामने पिछले कुछ दिनों से असहज स्थिति दिखाई दे रही थी। यात्रा को लेकर प्रदेश कांग्रेस संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के साथ तालमेल पर सवाल उठे। पार्टी की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की ओर से आपत्ति जताए जाने और स्पष्टीकरण की स्थिति बनने के बाद हरदा को दिल्ली का रुख करना पड़ा। नौ अक्टूबर को सैलजा से उनकी मुलाकात भी हुई, जिसमें संगठनात्मक अनुशासन और पार्टी के सामूहिक कार्यक्रमों के साथ चलने का संदेश सामने आया। इस घटनाक्रम को हरदा के राजनीतिक विरोधियों ने उनके लिए असहज स्थिति के तौर पर देखा। लेकिन कहानी यहां समाप्त नहीं हुई।

 

12 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी प्रदर्शन और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद के बीच हरीश रावत की मौजूदगी ने राजनीतिक चर्चा को नया मोड़ दे दिया। जिस नेता को कुछ दिन पहले तक अपनी ही पार्टी के नेतृत्व के सामने स्पष्टीकरण देने की स्थिति में देखा जा रहा था, वही नेता अब कांग्रेस के व्यापक राजनीतिक संघर्ष के मंच पर दिखाई दिया। यानी हरदा को लेकर जो राजनीतिक चर्चाएं एक दिशा में बढ़ती नजर आ रही थीं, उन्होंने अचानक दूसरा मोड़ ले लिया।

 

### हरदा की राजनीति में नाराजगी भी संदेश, मौजूदगी भी संदेश

 

हरीश रावत की राजनीति का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उनकी गतिविधियों को केवल व्यक्तिगत नाराजगी या पार्टी के भीतर शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वह लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे पहचाने जाने वाले चेहरों में शामिल रहे हैं। मुख्यमंत्री रहने के कारण उनका अपना राजनीतिक आधार है और प्रदेश की राजनीति में उनकी पहचान केवल संगठनात्मक पदों तक सीमित नहीं रही है। ऐसे में जब वह कोई अलग राजनीतिक पहल करते हैं, तो उसके प्रभाव को पार्टी के भीतर उनके स्थान और चुनावी संभावनाओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

 

धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा के माध्यम से हरदा जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच अपनी सक्रियता दर्ज करा रहे थे। उनके समर्थकों की दलील रही कि इस तरह के कार्यक्रम पार्टी को मजबूत करने और आगामी विधानसभा चुनाव के लिए माहौल तैयार करने में मदद कर सकते हैं। दूसरी ओर, संगठन की चिंता यह थी कि चुनाव से पहले यदि वरिष्ठ नेता अलग-अलग कार्यक्रम चलाएंगे तो जनता के बीच कांग्रेस की एकजुटता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। यही इस पूरे विवाद का मूल राजनीतिक विरोधाभास था—एक नेता अपनी सक्रियता को पार्टी के हित में बता रहा था, जबकि संगठन उसी गतिविधि में सामूहिक अनुशासन के लिए चुनौती देख रहा था।

 

### हाईकमान के सामने स्पष्टीकरण, लेकिन सियासत से दूरी नहीं

 

हरदा के हालिया घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकमान के साथ विवाद के बाद भी उनकी राजनीतिक सक्रियता समाप्त होती नहीं दिखी। दिल्ली में मुलाकात और संगठनात्मक अनुशासन का संदेश मिलने के बाद 12 अक्टूबर के विपक्षी प्रदर्शन में उनकी मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि वह पार्टी के व्यापक राजनीतिक कार्यक्रमों से खुद को अलग नहीं कर रहे हैं।

 

इसे हाईकमान के खिलाफ खुली चुनौती कहना जल्दबाजी होगी। इसके बजाय इसे हरदा की उस राजनीतिक शैली के रूप में देखा जा सकता है, जिसमें मतभेदों के बावजूद वह अपनी राजनीतिक भूमिका बनाए रखना चाहते हैं। वह संगठन से बाहर खड़े होने का संदेश नहीं देना चाहते, लेकिन अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान को भी पूरी तरह पीछे छोड़ने के इच्छुक नजर नहीं आते। उनके सामने चुनौती यही है कि व्यक्तिगत सक्रियता और संगठनात्मक अनुशासन के बीच ऐसा संतुलन बनाए रखें, जिससे उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता भी बनी रहे और पार्टी के भीतर अनावश्यक टकराव भी न बढ़े।

 

### विरोधियों को लगा था घिर गए हरदा, लेकिन कहानी में आया नया मोड़

 

उत्तराखंड की कांग्रेस राजनीति में हरीश रावत के विरोधियों के लिए जनसंवाद यात्रा का विवाद एक अवसर की तरह देखा जा सकता था। हाईकमान की नाराजगी, स्पष्टीकरण और संगठनात्मक अनुशासन की चर्चा के बीच यह संदेश उभर रहा था कि अब हरदा को अपनी राजनीतिक गतिविधियों के लिए केंद्रीय नेतृत्व की सीमाओं का ध्यान रखना होगा। लेकिन 12 अक्टूबर को दिल्ली में उनकी मौजूदगी ने चर्चा का केंद्र बदल दिया।

 

राजनीति में किसी नेता की ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसे पार्टी नेतृत्व से कितना समर्थन मिल रहा है। यह भी देखा जाता है कि वह विवाद के बीच अपनी भूमिका किस तरह बनाए रखता है और कब किस राजनीतिक मुद्दे पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। हरदा के मामले में यह पहलू महत्वपूर्ण है। वह विवाद के बाद गायब नहीं हुए, बल्कि एक ऐसे मुद्दे पर कांग्रेस के व्यापक विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बने, जिसे पार्टी लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाता अधिकारों से जोड़कर उठा रही है।

 

हालांकि, केवल इस मौजूदगी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि हाईकमान के साथ उनके सभी मतभेद समाप्त हो गए हैं या उत्तराखंड कांग्रेस में उनकी स्थिति पहले जैसी हो गई है। लेकिन इतना जरूर है कि इस घटनाक्रम ने उनके राजनीतिक भविष्य और पार्टी में उनकी भूमिका को लेकर चल रही चर्चाओं को फिर जीवित कर दिया है।

 

### 2027 की लड़ाई में हरदा की प्रासंगिकता का सवाल

 

उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच कांग्रेस के लिए हरीश रावत की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। वह पूर्व मुख्यमंत्री हैं, प्रदेश की राजनीति का अनुभव रखते हैं और उनके नाम की अपनी पहचान है। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने संगठन को एकजुट रखने, नेतृत्व के बीच समन्वय बनाने और चुनावी रणनीति को सामूहिक रूप देने की चुनौती भी है।

 

ऐसे में हरदा की राजनीति दो स्तरों पर असर डाल सकती है। पहला, वह अपने समर्थकों और जनता के बीच सक्रिय रहकर पार्टी के चुनावी अभियान को गति दे सकते हैं। दूसरा, यदि उनकी गतिविधियों और संगठन के बीच तालमेल नहीं बन पाया, तो यही सक्रियता पार्टी के भीतर असहजता का कारण भी बन सकती है। उनके लिए राजनीतिक चुनौती केवल अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी होगी कि उनकी सक्रियता कांग्रेस के सामूहिक लक्ष्य को मजबूत करती है।

 

### हरदा को समझना आसान नहीं, लेकिन उनका सियासी संदेश साफ है

 

हरीश रावत की राजनीति को लेकर अक्सर यह धारणा बनती है कि वह कब कौन-सा कदम उठा लें, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। कभी वह अपने अंदाज में राजनीतिक नाराजगी जाहिर करते हैं, कभी अपनी बात खुलकर रखते हैं और कभी ऐसे मौके पर सामने आते हैं, जब उनके विरोधियों को लगता है कि उनकी राजनीतिक जमीन कमजोर पड़ रही है। यही शैली उन्हें लगातार चर्चा में बनाए रखती है।

 

लेकिन इस शैली का एक दूसरा पहलू भी है। राजनीति में लगातार चर्चा में बने रहना और संगठन के भीतर प्रभाव बनाए रखना दो अलग-अलग बातें हैं। हरदा के सामने असली परीक्षा यह होगी कि वह अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक सक्रियता को कांग्रेस की चुनावी रणनीति के साथ किस हद तक जोड़ पाते हैं।

 

12 अक्टूबर को दिल्ली में उनकी मौजूदगी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। जनसंवाद यात्रा के विवाद से लेकर हाईकमान के सामने स्पष्टीकरण और फिर विपक्षी प्रदर्शन तक का घटनाक्रम बताता है कि हरदा की राजनीति में एक विवाद के बाद दूसरा अध्याय जल्दी खुल जाता है। वह राजनीतिक परिदृश्य से ओझल होने के बजाय किसी न किसी मुद्दे पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।

 

फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस पूरे घटनाक्रम से हरदा की पार्टी में स्थिति मजबूत हुई है या उनके और हाईकमान के बीच मतभेद केवल अस्थायी रूप से शांत हुए हैं। लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में उनकी प्रासंगिकता का सवाल एक बार फिर सामने है। **हरदा के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी विशिष्ट राजनीतिक शैली को कांग्रेस की सामूहिक चुनावी ताकत में बदलें। क्योंकि 2027 की लड़ाई में केवल चर्चा में बने रहना नहीं, बल्कि पार्टी को जीत की दिशा में ले जाने में अपनी भूमिका साबित करना भी जरूरी होगा।

 

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