उत्तराखण्ड
5 हजार सरकारी स्कूलों पर संकट के साथ यशपाल आर्य ने सरकार से मांगा 30 दिन में शिक्षा व्यवस्था का पूरा हिसाब
देहरादून, 30 अगस्त। उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों में लगातार घटती छात्र संख्या को लेकर नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश में करीब पांच हजार प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या 10 या उससे भी कम रह गई है। इनमें लगभग 4,275 प्राथमिक विद्यालय और करीब 650 जूनियर हाईस्कूल बताए गए हैं। कई स्कूलों में तो महज एक, तीन या चार विद्यार्थी ही पढ़ रहे हैं।
आर्य ने सवाल उठाया कि जब सरकार शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बजट और बेहतर व्यवस्थाओं के दावे करती है, तो सरकारी विद्यालयों में बच्चों की संख्या लगातार क्यों घट रही है। उन्होंने कहा कि करीब 12 हजार करोड़ रुपये के वार्षिक शिक्षा बजट के बावजूद यदि हजारों स्कूल कम छात्र संख्या की स्थिति में पहुंच रहे हैं, तो इसकी वजहों की गंभीर समीक्षा जरूरी है।
नेता प्रतिपक्ष के मुताबिक मामला सिर्फ नामांकन घटने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे शिक्षकों की कमी, स्कूल भवनों की स्थिति, शौचालय, पेयजल, बिजली, प्रयोगशालाओं और डिजिटल सुविधाओं का अभाव तथा शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाए जाने जैसे कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिए।
सरकार से मांगा स्कूलवार डेटा
यशपाल आर्य ने सरकार से मांग की कि अगले 30 दिनों के भीतर प्रदेश के सभी सरकारी विद्यालयों की छात्र संख्या की जिला और विद्यालयवार जानकारी सार्वजनिक की जाए। इसके साथ ही 10 या उससे कम विद्यार्थियों वाले स्कूलों की सूची, पिछले पांच वर्षों में बंद अथवा विलय किए गए विद्यालयों का विवरण और प्रत्येक जिले में स्वीकृत एवं कार्यरत शिक्षकों की संख्या भी सामने रखी जाए।
उन्होंने जर्जर भवनों और बुनियादी सुविधाओं से वंचित विद्यालयों की सूची सार्वजनिक करने के साथ यह भी बताने को कहा कि पिछले पांच वर्षों में सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए कितना पैसा खर्च किया गया और उसका वास्तविक परिणाम क्या रहा।
आर्य ने कम नामांकन वाले विद्यालयों के लिए सरकार की प्रस्तावित कार्ययोजना और स्कूल बंद अथवा विलय करने के लिए निर्धारित मानकों को भी सार्वजनिक करने की मांग की है।
‘स्कूल बंद करने से पहले स्कूल बचाने की नीति बने’
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि कम छात्र संख्या को स्कूल बंद करने का आधार बनाना समस्या का समाधान नहीं है। यदि सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, बेहतर सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध नहीं होगी तो अभिभावकों का निजी स्कूलों की ओर रुख करना स्वाभाविक है।
उन्होंने कहा कि विशेषकर पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों में सरकारी स्कूल केवल शिक्षा के केंद्र नहीं हैं, बल्कि गांवों के सामाजिक जीवन से भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसी विद्यालय को बंद या विलय करने से पहले ग्रामसभा, अभिभावकों और स्थानीय समुदाय की राय लेने की व्यवस्था होनी चाहिए।
आर्य ने सरकार से प्रत्येक कम-नामांकन वाले विद्यालय के लिए विशेष पुनर्जीवन योजना बनाने, पर्याप्त शिक्षकों की तैनाती, जर्जर भवनों और मूलभूत सुविधाओं में सुधार तथा दूरस्थ क्षेत्रों की जरूरत के अनुरूप शिक्षा मॉडल विकसित करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों को बचाने के लिए उठाए गए कदमों और शिक्षा बजट के इस्तेमाल का स्वतंत्र मूल्यांकन और सोशल ऑडिट होना चाहिए। जनता के पैसे से संचालित विद्यालयों की जिम्मेदारी भी जनता के बच्चों के प्रति है। सरकार का लक्ष्य स्कूल बंद करना नहीं, बल्कि उनमें बच्चों की संख्या बढ़ाना होना चाहिए।
आर्य ने कहा कि अब सरकार को केवल योजनाओं और घोषणाओं का हवाला देने के बजाय सरकारी शिक्षा व्यवस्था के नतीजों का जवाब जनता के सामने रखना होगा।

