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तारीफ के मंच से चुनावी चुनौती: संजय नेगी के बयान के मायने क्या? तीन बार के विधायक लेकिन हराऊंगा मैं ही..

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तारीफ के मंच से चुनावी चुनौती: संजय नेगी के बयान के मायने क्या? तीन बार के विधायक लेकिन हराऊंगा मैं ही…

रामनगर। सरस मेले के समापन समारोह में ज्येष्ठ प्रमुख संजय नेगी का रामनगर विधायक दीवान सिंह बिष्ट को लेकर दिया गया बयान स्थानीय राजनीति के लिहाज से सामान्य प्रशंसा से कहीं आगे जाता दिखाई देता है। एक ही मंच से पहले उन्होंने दीवान सिंह बिष्ट के तीन बार विधायक चुने जाने का उल्लेख करते हुए उनकी राजनीतिक उपलब्धि को स्वीकार किया और फिर साफ शब्दों में कहा कि वह कांग्रेस से चुनाव लड़कर उन्हें चुनाव में हराना चाहते हैं। यही विरोधाभास अब रामनगर की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।

 

 

दरअसल, राजनीति में किसी प्रतिद्वंद्वी की ताकत को स्वीकार करना और उसी ताकत को चुनौती देना—दोनों बातें एक साथ चल सकती हैं। संजय नेगी का बयान इसी राजनीतिक मनोविज्ञान को सामने रखता है। दीवान सिंह बिष्ट की लोकप्रियता अथवा चुनावी पकड़ को नकारने के बजाय उसे स्वीकार करते हुए चुनौती देना इस बात का संकेत माना जा सकता है कि संभावित मुकाबले को लेकर वे सीधे मैदान में उतरने का आत्मविश्वास दिखाना चाहते हैं।

 

 

सम्मान अलग, चुनावी मुकाबला अलग

किसी जनप्रतिनिधि की तारीफ करने का अर्थ यह जरूरी नहीं कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता खत्म हो गई। सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत सम्मान और राजनीतिक विरोध कई बार साथ-साथ चलते हैं। मंच पर दीवान सिंह बिष्ट की तारीफ को जहां राजनीतिक शिष्टाचार और उनके लंबे चुनावी अनुभव की स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा सकता है, वहीं ‘मैं ही उन्हें चुनाव में हराऊंगा’ कहना भविष्य की चुनावी तैयारी का संकेत देता है।

 

 

यानी संदेश कुछ इस तरह पढ़ा जा सकता है—’आप मजबूत हैं, इसलिए आपको हराना ही मेरी राजनीतिक चुनौती है।’

 

 

क्या यह कांग्रेस के लिए भी संदेश है?

इस बयान का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कांग्रेस की राजनीति से जुड़ा है। संजय नेगी ने सिर्फ दीवान सिंह बिष्ट को चुनौती नहीं दी, बल्कि यह भी कहा कि वे कांग्रेस से चुनाव लड़कर उन्हें शिकस्त देना चाहते हैं। इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि वे अपने आपको रामनगर विधानसभा क्षेत्र में संभावित कांग्रेस दावेदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में यह बयान केवल भाजपा विधायक के खिलाफ चुनौती नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर अपनी राजनीतिक दावेदारी को सार्वजनिक करने की कोशिश भी हो सकता है। चुनाव से काफी पहले किसी संभावित उम्मीदवार का इस तरह नाम लेकर मुकाबले की घोषणा करना पार्टी के अंदर और बाहर दोनों जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की रणनीति हो सकती है।

मंच का चुनाव भी महत्वपूर्ण

बयान जिस मंच से आया, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सरस मेला मूल रूप से महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्रामीण उत्पादों और सरकारी योजनाओं को बाजार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आयोजित कार्यक्रम था। ऐसे मंच पर राजनीतिक बयानबाजी की चर्चा अपने आप में इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि मंच का मूल उद्देश्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं था।

 

 

हालांकि सरस मेले को महिला समूहों और ग्रामीण उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने वाला आयोजन बताया गया है। इसलिए सवाल यह भी है कि क्या स्थानीय राजनीति इतनी गर्म हो चुकी है कि गैर-राजनीतिक सार्वजनिक मंच भी संभावित चुनावी संदेश देने के अवसर में बदलने लगे हैं?

तीन बार के विधायक को चुनौती—सिर्फ बयान या तैयारी?

दीवान सिंह बिष्ट की रामनगर में मजबूत राजनीतिक उपस्थिति को देखते हुए उन्हें सीधे चुनाव में हराने की बात कहना आसान राजनीतिक बयान नहीं माना जा सकता। इसलिए संजय नेगी के बयान को केवल मंचीय उत्साह मानकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी।

यह बयान तीन संभावनाओं की ओर इशारा करता है—

पहली, नेगी वास्तव में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर चुके हैं।

दूसरी, वे कांग्रेस में अपनी दावेदारी मजबूत करने के लिए राजनीतिक संदेश दे रहे हैं।

तीसरी, वे अपने समर्थकों और राजनीतिक विरोधियों दोनों को यह बताना चाहते हैं कि वे दीवान सिंह बिष्ट के सामने सीधे मुकाबले के लिए तैयार हैं।

रामनगर की राजनीति में बदलती तस्वीर?

रामनगर में लंबे समय से दीवान सिंह बिष्ट एक स्थापित राजनीतिक चेहरा हैं। हाल में भी सरस मेले के उद्घाटन और अन्य सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रिय राजनीतिक उपस्थिति सामने आई है।

ऐसे में किसी स्थानीय राजनीतिक चेहरे द्वारा खुले मंच से उन्हें चुनाव में हराने की बात करना यह संकेत जरूर देता है कि अगले विधानसभा चुनाव की राजनीतिक जमीन पर अभी से दावेदारी और समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है।

सबसे दिलचस्प बात यही है कि तारीफ और चुनौती एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि इस बयान में एक-दूसरे के पूरक नजर आते हैं। दीवान सिंह बिष्ट की ताकत को स्वीकार करके उन्हें हराने की बात करना दरअसल प्रतिद्वंद्वी को मजबूत मानते हुए उसके खिलाफ अपनी राजनीतिक क्षमता साबित करने का दावा है।

अब असली परीक्षा बयान की नहीं, मैदान की होगी। यदि संजय नेगी की दावेदारी आगे बढ़ती है और कांग्रेस उन्हें उम्मीदवार बनाती है, तभी यह साफ होगा कि सरस मेले के मंच से निकली यह चुनौती महज राजनीतिक संवाद थी या वास्तव में रामनगर की अगली चुनावी लड़ाई का शुरुआती बिगुल।

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