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हरदा का दिल्ली से धमाका : बाघ निर्णय नहीं कर पाया और वापस जंगल की तरफ जाना पड़ा…. दिल्ली और देहरादून के बीच रहने की बातों बातों में हरीश रावत आखिर कितना बड़ा संदेश दे गए…

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उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का एक पूरा कथन एक भावनात्मक आत्ममंथन है, जिसमें वे दिल्ली, देहरादून और हरिद्वार के बीच अपने जीवन और राजनीति के अनुभवों को जोड़कर भीतर चल रहे द्वंद्व को व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि कभी मन दिल्ली में रुकने को कहता है, तो कभी उत्तराखंड लौट जाने का आग्रह करता है, क्योंकि दोनों ही जगहों से उनका गहरा भावनात्मक और राजनीतिक जुड़ाव रहा है। दिल्ली उनके लिए लंबे समय तक सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रही है, जहाँ उनके कई संगठन, मीडिया मित्र और राजनीतिक सहयोगी उनसे घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे, लेकिन समय के साथ इन संबंधों में दूरी महसूस होने लगी। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि पहले जो लोग नियमित रूप से उनसे संवाद करते थे, मिलते-जुलते थे, अब वे भी शिकायत करते हैं कि संपर्क कम हो गया है। वहीं देहरादून और हरिद्वार से उनका जुड़ाव अधिक जमीनी और भावनात्मक है, जहाँ लौटने का मन उन्हें अक्सर खींचता है, लेकिन वहाँ से भी एक सवाल उठता है कि कठिन समय में क्या वे फिर पीछे हट जाएंगे। इसी मानसिक स्थिति को समझाने के लिए वे फलदाकोट की लोककथा का उदाहरण देते हैं, जिसमें एक बाघ दो गांवों के बीच निर्णय न कर पाने के कारण अंततः किसी ओर नहीं जा पाता और भोर होने पर जंगल लौट जाता है, और इसी प्रतीक के माध्यम से वे अपने भीतर की अनिश्चितता और निर्णयहीनता को व्यक्त करते हैं। उनका पूरा वक्तव्य यह संकेत देता है कि लंबे सार्वजनिक जीवन और सक्रिय राजनीति के बाद व्यक्ति के भीतर संबंधों, स्थानों और जिम्मेदारियों को लेकर एक गहरा भावनात्मक संघर्ष पैदा हो जाता है, जिसमें वह कभी जड़ों की ओर लौटना चाहता है और कभी वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक दायित्वों में बना रहना चाहता है।

 

 

ये है पोस्ट….

 

दो दिन से दिल्ली में हूँ। आज दिल कह रहा है कि हरिद्वार लौट चल, देहरादून लौट चल, और दिमाग कह रहा है कि दिल्ली में रहूँ।

दिल्ली के साथ बहुत सारी सुनहरी, उथल-पुथल भरी, प्यारी-प्यारी यादें हैं। वे यादें कह रही हैं— हमने क्या बिगाड़ा? दिल्ली के करीब-करीब हर क्षेत्र में कोई न कोई सामाजिक संगठन कभी न कभी मुझसे बहुत घनिष्ठता से जुड़ा रहा है। वे कह रहे हैं— हमको तो याद ही करना छोड़ दिया। कुछ साथी राजनीतिक सहयोगी बने, वे भी कह रहे हैं कि हमसे बात ही करना तुमने छोड़ दिया।

अखबार के मित्र मेरे प्रति हमेशा बड़े सहृदय रहे। पहले हर महीने एकाध बार मैं उनके दर्शन कर लेता था और वे लोगों को मेरे दर्शन करा देते थे। वे भी कह रहे हैं— आप कहाँ हो? राजनीति के साथी— कई लोगों ने मेरे साथ भ्रातृत्व स्नेह रखा, घर जैसा प्यार और समर्थन दिया। कुछ लोगों ने मुझे अपना सहचर समझा। अब वे दोनों प्रकार के लोग कहते हैं कि आप तो दिखाई नहीं देते! आते ही नहीं, बात नहीं करते, कभी चाय नहीं पीते हमारे साथ।

अब मेरी स्थिति यह है कि हर बार जब मैं दिल्ली आता हूँ, तो देहरादून लौटते वक्त बड़ा असमंजस हो जाता है। उधर देहरादून कहता है कि बस, कुछ कठिनाई आई तो भाग जाओगे यहाँ से? क्या करूँ— बड़ा असमंजस है।

हमारे इधर एक कहावत है कि फलदाकोट पट्टी में दो गांव हैं— जैनोली और पिलखोली। उनके बीच में एक धार पड़ती है, वहाँ सैम देवता का मंदिर भी है। उस धार से एक रास्ता नीचे की ओर जाता है— बड़ा आम रास्ता है, कई गांवों का रास्ता है।

एक बाघ शिकार की तलाश में आया तो वह उस धार में पहुँच गया। धार के एक तरफ पिलखोली था, एक तरफ जैनोली, और उसे दोनों गांवों में अपने लिए संभावनाएँ नजर आ रही थीं। अब वह कभी सोचे— मैं जैनोली जाऊँ, कभी सोचे— मैं पिलखोली जाऊँ। कभी कदम इधर बढ़ाए, तो कभी कदम उधर बढ़ाए। अनंतोगत्वा सुबह की पौ फटने लगी, लोगों का आना-जाना शुरू हो गया। बाघ निर्णय नहीं कर पाया और वापस जंगल की तरफ जाना पड़ा।

 

मुझे भी लग रहा है कि यदि मैं इस असमंजस में पड़ा रहा, तो आगे भगवान मालिक है।

 

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