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तीन साल में एक बार गूंजता है गणनाथ का आस्था पर्व, 20 से 24 अगस्त तक शतचंडी महायज्ञ
तीन साल में एक बार गूंजता है गणनाथ का आस्था पर्व, 20 से 24 अगस्त तक शतचंडी महायज्ञ
सतराली के सात गांवों के चूल्हों में बनेगा महाप्रसाद, प्रवासी ग्रामीण भी लौटेंगे गांव; 24 अगस्त को पारायण के साथ होगा भंडारा
मनोज लोहनी, लोहना
ताकुला/अल्मोड़ा। देवभूमि के पर्वतीय अंचल में कुछ धार्मिक स्थल ऐसे हैं, जहां आस्था केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह गांव, परिवार, परंपरा और प्रवास से जुड़े लोगों को भी एक सूत्र में बांध देती है। ताकुला क्षेत्र का प्राचीन गणनाथ मंदिर ऐसा ही एक आस्था केंद्र है। यहां तीन वर्ष में एक बार होने वाला शतचंडी महायज्ञ इस बार 20 से 24 अगस्त तक आयोजित किया जा रहा है। 24 अगस्त को महायज्ञ का पारायण होगा और इसके बाद विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा।
शतचंडी महायज्ञ के आयोजन को लेकर सतराली क्षेत्र के सात गांवों में विशेष उत्साह है। महायज्ञ में सातों गांवों के चूल्हों की परंपरा के साथ सामूहिक रूप से प्रसाद तैयार किया जाता है। इस अवसर पर केवल स्थानीय ग्रामीण ही नहीं, बल्कि रोजगार और अन्य कारणों से देश के विभिन्न हिस्सों में रह रहे सतराली क्षेत्र के प्रवासी भी अपने गांव लौटते हैं। आसपास के तमाम गांवों से भी श्रद्धालुओं के पहुंचने से पांच दिन तक गणनाथ का पूरा क्षेत्र धार्मिक गतिविधियों से सराबोर रहेगा।
गुफा में विराजते हैं गणनाथ
ताकुला क्षेत्र से जुड़े घने वन और पहाड़ी परिवेश के बीच स्थित गणनाथ मंदिर की अपनी विशिष्ट पहचान है। जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार गणनाथ मंदिर अल्मोड़ा से करीब 47 किलोमीटर दूर है और अपनी प्राकृतिक गुफाओं तथा शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां लगने वाला मेला भी क्षेत्र की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है।
प्राकृतिक गुफा में विराजमान भगवान शिव के कारण गणनाथ को क्षेत्र में विशेष श्रद्धा से देखा जाता है। मंदिर की सबसे आकर्षक विशेषताओं में गुफा के भीतर शिवलिंग पर ऊपर से जल की बूंदों का निरंतर गिरना बताया जाता है। स्थानीय श्रद्धालु इसे भगवान शिव की जटाओं से निकलने वाली जलधारा से जोड़कर देखते हैं। मंदिर का शांत वातावरण, आसपास का जंगल और पहाड़ी प्रकृति इसकी आध्यात्मिक अनुभूति को और गहरा कर देते हैं।
वल्लभ उपाध्याय की स्मृति से भी जुड़ा है गणनाथ
गणनाथ की धार्मिक पहचान के साथ-साथ इसका संबंध क्षेत्र के पुराने सामाजिक और पारिवारिक इतिहास से भी जोड़ा जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार श्री वल्लभ उपाध्याय, जिन्हें लोहानी वंशजों के अग्रज के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है, की समाधि भी गणनाथ परिसर से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि लोहानी वंश और आसपास के ग्रामीण परिवारों के लिए गणनाथ केवल एक देवस्थल नहीं, बल्कि अपनी पुरानी जड़ों और पूर्वजों की स्मृति से जुड़ा पवित्र स्थान भी है।

गणनाथ की प्राचीनता को लेकर स्थानीय स्तर पर अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ स्थानीय विवरण इसे लगभग 11वीं शताब्दी की परंपरा से जोड़ते हैं और मंदिर की स्थापना को श्री वल्लभ महोपाध्याय से संबंधित बताते हैं। हालांकि इन ऐतिहासिक विवरणों की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि अलग विषय है, लेकिन क्षेत्रीय लोकविश्वास में गणनाथ की प्राचीनता और धार्मिक महत्ता गहरी तरह से रची-बसी है।
सात गांवों की साझी आस्था
गणनाथ से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में सतराली क्षेत्र के सात गांवों की सामूहिक भागीदारी इसकी सबसे खास विशेषताओं में है। यही सामूहिकता इस क्षेत्र की लोकसंस्कृति में भी दिखाई देती है। सतराली क्षेत्र की पारंपरिक खड़ी होली में भी सातों गांवों की सहभागिता का उल्लेख मिलता है और गणनाथ को इन लोक परंपराओं के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा जाता है।
शतचंडी महायज्ञ भी इसी सामुदायिक भावना को आगे बढ़ाता है। तीन वर्ष के अंतराल के बाद होने वाला आयोजन ग्रामीणों के लिए धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ मिलन का अवसर भी बन जाता है। गांव से बाहर रहने वाले लोग अपने परिवारों के साथ यहां पहुंचते हैं। वर्षों बाद एक-दूसरे से मुलाकात, सामूहिक पूजा, प्रसाद और भंडारे की व्यवस्था इस आयोजन को धार्मिक पर्व के साथ सामाजिक उत्सव का रूप देती है।
गणनाथ के ऊपर पहाड़ी चोटी पर मां मल्लिका देवी
गणनाथ मंदिर की यात्रा को श्रद्धालु अक्सर मां मल्लिका देवी के दर्शन से भी जोड़ते हैं। गणनाथ से कुछ ऊपर पहाड़ी की चोटी की ओर जाने पर मल्लिका देवी का मंदिर स्थित है। ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को रास्ते में कुमाऊं की पहाड़ी प्रकृति और विस्तृत पर्वतीय दृश्य भी देखने को मिलते हैं।
स्थानीय श्रद्धा में गणनाथ और मल्लिका देवी दोनों ही महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र हैं। गणनाथ की गुफा में भगवान शिव के दर्शन के बाद मल्लिका देवी के धाम तक पहुंचना कई श्रद्धालुओं के लिए यात्रा का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। क्षेत्र के धार्मिक स्थलों पर आधारित उपलब्ध विवरणों में भी गणनाथ के आसपास मल्लिका देवी मंदिर का उल्लेख मिलता है।
महायज्ञ के बहाने लौटेंगे गांव से दूर हुए लोग
पहाड़ के गांवों में लगातार बढ़ते पलायन के बीच ऐसे आयोजन अब धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जुड़ाव के भी महत्वपूर्ण अवसर बन गए हैं। शतचंडी महायज्ञ के लिए प्रवासी ग्रामीणों का अपने गांव लौटना इसी बदलाव के बीच एक अलग तस्वीर पेश करता है। कई परिवारों के सदस्य देश के अलग-अलग शहरों में रहते हैं, लेकिन गणनाथ का यह आयोजन उन्हें अपनी मिट्टी, अपने गांव और अपनी सामूहिक परंपराओं से जोड़ता है।
20 अगस्त से शुरू होकर 24 अगस्त को पारायण और भंडारे के साथ संपन्न होने वाला यह महायज्ञ इसलिए केवल पांच दिनों का धार्मिक कार्यक्रम नहीं है। यह सात गांवों की साझा आस्था, पूर्वजों की स्मृतियों, लोकपरंपराओं और पहाड़ से दूर जा चुके लोगों के अपनी जड़ों की ओर लौटने का पर्व भी है।
तीन वर्ष के अंतराल पर होने वाले इस आयोजन के दौरान जब गणनाथ की पहाड़ी पर मंत्रोच्चार गूंजेगा, सात गांवों के चूल्हों से प्रसाद की खुशबू उठेगी और दूर-दराज से लौटे प्रवासी अपने परिचित चेहरों के बीच बैठेंगे, तो यह प्राचीन देवस्थल एक बार फिर धार्मिक आस्था के साथ पर्वतीय समाज की सामूहिक स्मृति और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करेगा।

