उत्तराखण्ड
हूं तो मैं भी राजपूत ही…’ हरीश रावत के बयान में छिपा सियासी संदेश क्या है? ED पूछताछ के बाद तेवरों की नई व्याख्या
‘हूं तो मैं भी राजपूत ही…’ हरीश रावत के बयान में छिपा सियासी संदेश क्या है? ED पूछताछ के बाद तेवरों की नई व्याख्या
देहरादून। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की पूछताछ के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जिस अंदाज में अपने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जवाब दिया है, उसने उत्तराखंड की सियासत में एक अलग चर्चा छेड़ दी है। उनका वाक्य—“हूँ तो मैं भी राजपूत ही न! मैं ललकार कैसे सहन कर सकता हूं”—सिर्फ एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है या इसके पीछे बड़ा राजनीतिक संदेश भी है, यह सवाल अब चर्चा में है।
हरीश रावत ने अपने पोस्ट में लिखा कि करीब साढ़े छह घंटे तक उन्होंने ED के सवालों का सामना किया। उन्होंने यह भी कहा कि वह जांच से भाग नहीं रहे हैं और उनके तथा उनके परिवार की जांच करनी है तो एक बार पूरी तरह कर ली जाए, ताकि हर चुनाव में उनके घर पर जांच एजेंसियों की दस्तक न हो। उन्होंने CBI और ED का भी जिक्र करते हुए अपने संघर्ष को राजनीतिक लड़ाई के रूप में पेश किया है।
हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक 26 सितंबर को ED ने उनसे 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी (VPDO) भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पूछताछ की। एजेंसी ने पुराने आयकर रिटर्न, परिवार और संपत्तियों से जुड़े दस्तावेजों के साथ मामले के विभिन्न पहलुओं पर जानकारी ली।
‘राजपूत’ शब्द पर क्यों ठहरती है नजर?
रावत का यह कहना कि “हूं तो मैं भी राजपूत ही”, उनके पूरे बयान के संदर्भ में देखा जाए तो इसे केवल जातिगत पहचान बताने वाला वाक्य मानना जरूरी नहीं है। उन्होंने इसी के तुरंत बाद कहा कि “मैं ललकार कैसे सहन कर सकता हूं” और फिर “मैदान-ए-जंग में हूं” तथा “अब कुछ भी हो, इत्थे मरूंगा” जैसे शब्द इस्तेमाल किए।
यानी उनके बयान की भाषा में ‘राजपूत’ शब्द के साथ ललकार, मुकाबला, मैदान और संघर्ष जैसे शब्द जुड़े हुए हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि रावत अपने समर्थकों और राजनीतिक विरोधियों के सामने अपनी छवि एक ऐसे नेता के रूप में रखने की कोशिश कर रहे हैं जो दबाव के बावजूद पीछे हटने वाला नहीं है। यह उनके बयान की राजनीतिक भाषा की व्याख्या है, उनकी ओर से बताए गए उद्देश्य का प्रमाण नहीं।
ED की पूछताछ को रावत ने बनाया राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा
दिलचस्प बात यह है कि रावत ने ED की कार्रवाई को केवल कानूनी प्रक्रिया के रूप में संबोधित नहीं किया। उन्होंने अपने बयान में भाजपा, ED और CBI का नाम लेकर सवाल उठाया कि चुनाव के समय ही जांच एजेंसियों की सक्रियता क्यों दिखाई देती है। इससे उन्होंने जांच की कानूनी प्रक्रिया के समानांतर इसे राजनीतिक संघर्ष के नैरेटिव से जोड़ने की कोशिश की है।
इससे पहले भी सितंबर में अपने सहयोगी चंदन सिंह जीना से जुड़े ED प्रकरण के बाद रावत ने कांग्रेस के संगठनात्मक पदों से हटने की घोषणा की थी, जबकि उन्होंने कांग्रेस छोड़ने की बात नहीं कही थी। उस समय उन्होंने पार्टी से अपने रिश्ते को लेकर भी सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट की थी।
मां की तस्वीर से ‘राजपूत’ वाले तेवर तक
ED कार्यालय पहुंचने से पहले रावत अपनी मां की तस्वीर गले में डालकर पहुंचे थे और उन्होंने कहा था कि वह अपनी मां, जगदंबा मां और धरती मां का स्मरण करके कार्यालय जा रहे हैं।
अब पूछताछ के बाद सामने आए उनके नए बयान में मां के भावनात्मक संदर्भ से आगे बढ़कर “ललकार” और “मैदान-ए-जंग” की भाषा दिखाई दे रही है। यानी 24 घंटे के भीतर रावत के सार्वजनिक संदेश के दो अलग रंग दिखाई दिए—पहले भावनात्मक और पारिवारिक प्रतीक, फिर संघर्ष और चुनौती की भाषा।
2027 की पृष्ठभूमि में बयान का महत्व
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले रावत की सक्रियता और उनके बयानों को राजनीतिक रूप से देखा जाना स्वाभाविक है। लेकिन उनके इस बयान को सीधे किसी चुनावी रणनीति का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। इतना जरूर है कि ED प्रकरण ने उन्हें एक बार फिर सार्वजनिक राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
रावत का संदेश मोटे तौर पर यह दिखाई देता है कि जांच हो तो वह उसका सामना करेंगे, लेकिन जांच को लेकर राजनीतिक सवाल उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। ‘राजपूत’ वाला संदर्भ इसी व्यापक संघर्ष की भाषा का हिस्सा है—जहां वह अपनी व्यक्तिगत पहचान को साहस, प्रतिरोध और मैदान न छोड़ने की छवि के साथ जोड़ते दिखाई देते हैं।
आखिर में उनका अपना वाक्य ही इस पूरे संदेश का सार बन जाता है—“अब ललकारेंगे, लेकिन हूं तो मैं भी राजपूत ही न!” इसके बाद उन्होंने लिखा—“इसलिए मैदान-ए-जंग में हूं।” यह बयान आने वाले दिनों में उनके राजनीतिक तेवर और ED प्रकरण पर उनकी सार्वजनिक रणनीति की दिशा को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

