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*बसंत ऋतु का आगाज,प्रेम की छटा बिखेरता लोकपर्व फूलदेई
बसंत ऋतु का आगाज,प्रेम की छटा बिखेरता लोकपर्व फूलदेई
कैलाश पाण्डे,दन्या
उत्तराखंड का पारंपरिक लोकपर्व फूलदेई सर्दियों का अंत व बसंत ऋतु के आगमन के स्वागत के रुप में मनाया जाता है,जब चारों ओर फूल खिलते हैं प्रकृति के नव जीवन व उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट के लिए हर घर के दहलीज पर छोटे छोटे बच्चों द्वारा पीले फूल, बुरांश फूलों व चावल अर्पित किया जाता है,,
इस दिन छोटे छोटे बच्चे **फूलदेई छम्मादेई,दैणी द्वार भर भकार* जैसे पारंपरिक लोकगीत गाते हैं गांव के हर घर घर के दहलीज में फूल व चावल चढ़ाते हैं,बदले में बच्चों को गुड चावल व पैसे दिये जाते हैं,
कुछ मान्यताओं के अनुसार इस पर्व को एक राजकुमारी के **फ्योंली* रुपी अमर प्रेमकथा कहते हैं कि हिमालय के पहाड़ों पर प्योंली नाम की एक राजकुमारी रहती थी उसको एक दुसरे देश के राजकुमार से प्रेम हो गया, वह राजकुमार उसे शादी करके अपने देश ले गया, उस राजकुमारी के जाने के बाद पहाड़ पेड़ पौधे मुरझाने लगे क्योंकि वह पहाड़ों की सबसे प्यारी व लाडली राजकुमारी थी, उधर उसकी सास भी उसे अपने मायके वालों से मिलने नहीं आने देती थी, पियोगी उदास रहने लगी, एक दिन ऐसा आया की पियोली नाम की राजकुमारी की मृत्यु हो गई, उसके ससुराल वालों ने उसे पास की जंगल में दफना दिया उसी जगह पर एक पीला फूल उग आया, उसी से प्याेली की याद में फूलदेई त्योहार माना जाता है, इसलिए फूलदेई त्यौहार के दिन पीला फूल प्याेली वह सरसों फूल बुरांश फूल का भी इस्तेमाल करने की प्रथा है। मनाया जाता है कुल-मिलाकर पारंपरिक लोकपर्व फूलदेई न केवल प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है बल्कि समाज में प्रेम भाईचारे और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत बनाता है।