उत्तराखण्ड
नैनीताल और राजभवन की विरासत को पुस्तक में सहेजने वाले प्रो. गिरीश रंजन तिवारी का हुआ सम्मान, राज्यपाल गुरमीत सिंह ने किया पुस्तक का विमोचन, बोले- नैनीताल और उत्तराखंड की धरोहर का महत्वपूर्ण दस्तावेज
नैनीताल और राजभवन की विरासत को पुस्तक में सहेजने वाले प्रो. गिरीश रंजन तिवारी का हुआ सम्मान, राज्यपाल गुरमीत सिंह ने किया पुस्तक का विमोचन, बोले- नैनीताल और उत्तराखंड की धरोहर का महत्वपूर्ण दस्तावेज
नैनीताल। वरिष्ठ पत्रकार, शिक्षाविद् एवं शोधकर्ता प्रो. (डॉ.) गिरीश रंजन तिवारी की पुस्तक “अतीत से वर्तमान तक : नैनीताल का सफर और गॉथिक राजभवन के निर्माण की अद्भुत गाथा” का बुधवार को राजभवन नैनीताल में भव्य विमोचन किया गया। कार्यक्रम में उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने पुस्तक को नैनीताल, राजभवन और उत्तराखंड की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताते हुए कहा कि यह कृति आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी।

राजभवन में आयोजित समारोह में राज्यपाल ने कहा कि नैनीताल स्थित राजभवन केवल उत्तराखंड के राज्यपाल का ग्रीष्मकालीन आवास नहीं है, बल्कि 125 वर्षों से अधिक समय से इतिहास, वास्तुकला और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक बना हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रो. तिवारी द्वारा किए गए गहन शोध, प्रमाणिक तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर तैयार की गई यह पुस्तक इतिहास प्रेमियों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और आम पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।
राज्यपाल ने कहा कि विरासत और नवाचार का समन्वय ही विकसित भारत की आधारशिला है। हमारी ऐतिहासिक धरोहरें हमें अपनी जड़ों से जोड़ती हैं, जबकि आधुनिक तकनीक हमें भविष्य की दिशा दिखाती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण और तकनीकी नवाचार दोनों को समान महत्व देना आवश्यक है।
राज्यपाल ने बताया कि इस पुस्तक की परिकल्पना राजभवन और नैनीताल की ऐतिहासिक विरासत को व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से की गई थी। उन्होंने कहा कि पुस्तक केवल राजभवन के निर्माण का इतिहास नहीं है, बल्कि नैनीताल की सांस्कृतिक यात्रा, उत्तराखंड की विरासत और तत्कालीन सामाजिक परिवेश का भी विस्तृत दस्तावेज है।
समारोह में डॉ. गिरीश रंजन तिवारी ने बताया कि राज्यपाल ने उनसे नैनीताल, इसकी ऐतिहासिक धरोहरों तथा विशेष रूप से राजभवन के इतिहास पर एक विस्तृत पुस्तक तैयार करने का आग्रह किया था। इसी प्रेरणा से उन्होंने वर्षों तक विभिन्न अभिलेखों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थलों का अध्ययन कर यह शोधपरक पुस्तक तैयार की।
उन्होंने कहा कि शोध के दौरान अनेक ऐसे तथ्य सामने आए जो आम लोगों की जानकारी में नहीं हैं। अध्ययन से पता चला कि राजभवन के निर्माण में पंजाब के रामगढ़िया सिख समुदाय के कारीगरों और शिल्पकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। विशेष बात यह है कि इनमें से कई कारीगर वर्तमान राज्यपाल के पैतृक गांव और क्षेत्र से जुड़े थे। उन्होंने बताया कि भवन की डिजाइन भले ही ब्रिटिश वास्तुकारों ने तैयार की थी, लेकिन इसके निर्माण में भारतीय मजदूरों, शिल्पकारों और स्थानीय कारीगरों का प्रमुख योगदान रहा तथा कोई भी ब्रिटिश मजदूर निर्माण कार्य में शामिल नहीं था।
प्रो. तिवारी ने बताया कि शोध के दौरान उन्होंने उन स्थलों का भी भ्रमण किया जिनसे राजभवन की वास्तुकला की तुलना की जाती है। उन्होंने कहा कि आमतौर पर नैनीताल राजभवन की तुलना इंग्लैंड के बकिंघम पैलेस से की जाती है, लेकिन वास्तुशिल्पीय दृष्टि से यह भवन स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध बालमोरल पैलेस से अधिक साम्यता रखता है।
कार्यक्रम के दौरान सिद्धार्थ माधव द्वारा विकसित एआई आधारित हेरिटेज एंड टूरिज्म एप का भी लोकार्पण किया गया। राज्यपाल ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वर्तमान दौर में तकनीक को केवल सुविधा का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, इतिहास और समाज के संरक्षण का सशक्त उपकरण बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह एप नैनीताल, लोक भवन और उत्तराखंड की समृद्ध विरासत को डिजिटल माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का अभिनव प्रयास है।
राज्यपाल ने बताया कि एप में हेरिटेज गाइड, स्मार्ट प्लानर, इंटरएक्टिव टाइम कैप्सूल तथा हिडन जेम्स जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इनके माध्यम से पर्यटक और शोधार्थी ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त कर सकेंगे तथा अपनी रुचि के अनुसार यात्रा अनुभव को बेहतर बना सकेंगे। उन्होंने कहा कि हिडन जेम्स फीचर स्थानीय नागरिकों को अपने क्षेत्र के कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थलों की जानकारी साझा करने का अवसर देगा, जिससे स्थानीय समुदायों और छोटे व्यवसायों को भी लाभ मिलेगा।
राज्यपाल ने कहा कि आज विमोचित पुस्तक हमें अपने अतीत से जोड़ती है, जबकि एआई एप भविष्य की दिशा दिखाता है। दोनों मिलकर ऐसे भारत की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जो अपनी विरासत पर गर्व करता है और नवाचार के साथ आगे बढ़ता है।
इस अवसर पर राज्यपाल ने प्रो. गिरीश रंजन तिवारी और एप के निर्माता सिद्धार्थ माधव को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम की शुरुआत में प्रो. तिवारी ने राज्यपाल को पुष्पगुच्छ भेंट किया। साथ ही पुस्तक के आवरण पर प्रकाशित प्रसिद्ध चित्रकार सुधीर वर्मा की हस्तनिर्मित पेंटिंग भी उन्हें स्मृति-चिह्न के रूप में भेंट की गई, जिसकी राज्यपाल ने सराहना की।
समारोह में राजभवन की वित्त नियंत्रक डॉ. तृप्ति श्रीवास्तव, संयुक्त निदेशक सूचना डॉ. नितिन उपाध्याय, परितोष बंगवाल, प्रकाशक संतोष सिंह, डीके शर्मा, दीपा शर्मा, विपुल शर्मा, अशोक तिवारी, खुशबू तिवारी, कुसुम तिवारी, प्रो. नीरजा टंडन, प्रो. महेंद्र राणा, प्रो. ललित तिवारी, प्रो. संतोष कुमार, कंचन वर्मा, दिग्विजय सिंह बिष्ट, विनय साह, विशाल आर्य, अंचल पंत सहित कुमाऊं विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।
इनसेट : राष्ट्रपति को भेंट की पहली प्रति, अब प्रधानमंत्री और राज्यपालों को भेजी जाएगी पुस्तक
राज्यपाल गुरमीत सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि पुस्तक में संकलित ऐतिहासिक तथ्य और शोध कार्य अत्यंत मूल्यवान हैं। उन्होंने बताया कि पुस्तक की पहली प्रति वह राष्ट्रपति को भेंट कर चुके हैं। अब प्रधानमंत्री, सभी राज्यों के राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों को भी इसकी प्रतियां भेजी जाएंगी। उन्होंने यह भी घोषणा की कि पुस्तक को उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों तक पहुंचाने के प्रयास किए जाएंगे ताकि विद्यार्थी और शोधार्थी इसका लाभ उठा सकें।
इनसेट : राज्यपाल ने लिखी प्रस्तावना, कवर डिजाइन में भी निभाई विशेष भूमिका
पुस्तक का प्रकाशन राज्यपाल गुरमीत सिंह की प्रेरणा और अनुशंसा पर किया गया है। पुस्तक की प्रस्तावना स्वयं राज्यपाल ने लिखी है, जबकि इसके कवर डिजाइन में भी उनकी विशेष रुचि और मार्गदर्शन रहा। प्रकाशक इंदु प्रकाशन के संतोष सिंह ने बताया कि केवल कवर पेज को देखने के बाद ही पुस्तक की एक हजार प्रतियों के अग्रिम ऑर्डर प्राप्त हो चुके हैं।
इनसेट : राज्यपाल के गांव के कारीगरों ने निभाई थी राजभवन निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका
प्रो. गिरीश रंजन तिवारी ने बताया कि उनके शोध में यह तथ्य सामने आया कि राजभवन के निर्माण में पंजाब के रामगढ़िया सिख कारीगरों का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। इनमें से कई कारीगर वर्तमान राज्यपाल के पैतृक गांव और क्षेत्र से जुड़े थे। सीमित संसाधनों, दुर्गम मार्गों और कठिन मौसम के बावजूद भारतीय कारीगरों और मजदूरों ने इस भव्य भवन का निर्माण किया, जो आज भी अपनी मूल संरचना और मजबूती के साथ खड़ा है।
यह संस्करण मूल सामग्री के लगभग सभी महत्वपूर्ण तथ्य, उद्धरण और तीनों इनसेट को सुरक्षित रखते हुए डॉ. गिरीश रंजन तिवारी-केंद्रित बनाया गया है।
