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उत्तराखंड की राजनीति, नारायण दत्त तिवारी और विधानसभा चुनाव

मनोज लोहनी
उत्तराखंड की राजनीति में नारायण दत्त तिवारी एक ऐसा जिसके इर्द-गिर्दकांग्रेस की धुरी घूमती थी। विवादों के नारायण कह लें या फिर अनुभव का जखीरा, एनडी तिवारी वह नाम था जिसके लिए विकास पुरुष पर्याय बना। इस बार विधानसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही राज्य की राजनीति गर्म है, मगर इस राजनीति में एनडी का कहीं जिक्र नहीं है। जिक्र होता है, किसी न किसी बहाने, मगर एनडी के जिक्र होने का कांग्रेसियों के पास कोई बहाना नहीं है। फिर यह सवाल है कि अगर रोहित शेखर जीवित होते तो क्या होता? रोहित के बहाने तो एनडी तिवारी का नाम जरूर आता! राजनीति में विरासत चलती है और एनडी अपनी विरासत रोहित के पास ही छोड़ गए थे। विरासत केवल पुत्र के साथ ही पुत्रियों, भाइयों के नाम भी होती है। राजनीति के परिवारवाद में इस वक्त देख लीजिए, तो स्थिति स्पष्ट है कि परिवारवाद की राजनीति में क्या जगह होती है। मगर एनडी तिवारी राजनीति में अकेली धुरी थे, परिवार में भाई राजनीति से कोसों दूर….किसी को ही शायद याद हो कि एनडी तिवारी के एक भाई पदमपुरी में रहते हैं। पहली पत्नी का काफी पहले देहांत और फिर उज्ज्वला शर्मा से शादी हुई, रोहित शेखर विरासत संभालने आए। मगर रोहित के देहांत के साथ ही एनडी तिवारी के नाम का भी एक तरह से अंत हो गया। इस वक्त उज्ज्वला कहां हैं? किसी को नहीं मालूम। उन्हें शायद राजनीति से कोई मतलब भी नहीं रह गया होगा। अपने पुत्र को खोने के बाद उनके लिए अब शायद किसी के लिए कुछ करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता होगा। खुद के लिए क्या करें….शायद जिंदगी गुजारनी है किसी तरह, उसी रोहित की याद में जिसने अपने नाम के आगे पिता का नाम लगाने के लिए इतना संघर्ष किया कि उसकी जिंदगी की संघर्ष बन गई थी। बहरहाल, चुनावों की बातों में कहीं भी एनडी तिवारी का नहीं होना एक खालीपन का एहसास तो है ही। हां एनडी का जिक्र तब जरूर आ जाता है जब उनका कोई करीबी राजनीतिक हलचल में कहीं कुछ करता दिखता है। ताजा घटनाक्रम बरेली में प्रवीण ऐरन और उनकी पत्नी सुप्रिया ऐरन के सपा में चले जाने का था। वहां खबरें चलीं तो इस बात का जिक्र जरूर हुआ कि खांटी कांग्रेसी एनडी तिवारी के करीबी सपा में चले गए। एनडी तिवारी और कांग्रेस क्या एक दूसरे का पर्याय थे, यह सवाल ‘एनडी तिवारी के करीबीÓ के साथ ही खत्म हो जाता है। उत्तर प्रदेश में इस बहाने एनडी तिवारी का नाम आया, मगर उत्तराखंड में शायद अब कोई ऐसा कनेक्शन नहीं है जहां चुनावों में राजनीति के उस पुरोधा का नाम आए जो अपने जीतेजी राजनीति का पर्याववाची बन गया। ‘खुट खुटानी, सुट विनायकÓ का नारा देने वाले इस राजनीतिज्ञ के गृह क्षेत्र तक में एनडी का कहीं जिक्र नहीं। यह बात हैरत पैदा करती है। चुनावी माहौल गर्म है और गप्पबाजी के अड्डे भी गुलजार। तो एक अड्डे पर एनडी को लेकर यह चर्चा चली तो वह भी बरेली के बहाने…। बाकी अगली बार।

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