उत्तराखण्ड
किताबिउं रौ बिशु”: उत्तराखंड के बौंगाण क्षेत्र में आयोजित हुआ एक अनोखा पुस्तक मेला

उत्तरकाशी जनपद के बौंगाण क्षेत्र में एक ऐसा पुस्तक मेला आयोजित हुआ जैसा अब तक सुना नहीं गया है। “किताबिउँ रौ बिशु” (किताबों का मेला) नाम का यह मेला अपनी किस्म का अनूठा मेला रहा जिसने ग्रामीण लोगों के बीच किताबों के प्रति कौतूहल जगाने की दिशा में शानदार किस्म का प्रयास किया। स्थानीय लोक उत्सव “बिशु” के अवसर पर भुटाणु गांव में आयोजित इस विशेष पुस्तक मेले में सैकड़ों पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया तथा इच्छुक लोगों को पुस्तकें निःशुल्क उपलब्ध करवाई गई।
भुटाणू गांव के मंदिर परिसर में होने वाले “बिशु” उत्सव में पारंपरिक धनुष-बाण के खेल “ठोटै” और लोकगीत-नृत्य के माध्यम से मौइंजौणी, किरोलि, पाउलि, डेलूण, गमरी आदि गांवों से पहुंचे लोगों का आपसी मिलन हमेशा की तरह सौहार्दपूर्ण ढंग से हुआ। इसी उत्सव के दौरान यह पुस्तक मेला सभी के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा, जहां बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने अपनी रुचि के अनुसार पुस्तकें प्राप्त कीं।
इस अभिनव पहल के मूल विचारक मौंइंजौणी गांव (बौंगाण) निवासी शुबा, जो बौंगाणी भाषा को बौंगाणियों द्वारा लिखित रूप में लाने की मुहिम के प्रणेता हैं, ने बताया कि “इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य लोगों में पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करना और वैचारिक परिपक्वता विकसित करना है।” उन्होंने कहा कि “किताबें पढ़ना आत्म-विकास और सकारात्मक चिंतन का सशक्त माध्यम है। जिन परिवारों में विद्यालयी पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य साहित्य उपलब्ध नहीं है या पुस्तकें खरीदना जिनकी प्राथमिकता में नहीं है, वहां तक पुस्तकें पहुंचाना हमारा लक्ष्य है इसलिए इस मेले से कोई भी व्यक्ति कोई भी पुस्तक निःशुल्क ले जा सकता है।” उन्होंने यह भी बताया कि वह यह पहल बौंगाण में ही करना चाहते थे इसलिए इसका बौंगाणी नाम “किताबिउँ रौ बिशु” रखा गया। बौंगाणी भाषा में बिशु शब्द मेले या जमघट के रूप में भी प्रचलित है। इस पुस्तक मेले की सारी की सारी पुस्तकें शुबा के ही निजी संकलन से थीं। उनका कहना है कि ये तो एक छोटी सी शुरुआत है, भविष्य में इस आयोजन को बृहद रूप देने के लिए अन्य लोगों से भी सहयोग लेंगे ।
उन्होंने ये भी कहा कि इस पहल को अपेक्षा से कहीं अधिक उत्साह, सहयोग और स्नेह प्राप्त हुआ जिससे इसे बौंगाण के अन्य गांवों में आयोजित करने की उनकी इच्छा को और अधिक बल मिला है।
आयोजन के सहयोगी शिक्षाकर्मी और कलाकर्मी सुरक्षा रावत ने जानकारी दी कि यदि गांववासियों का इसी प्रकार सहयोग मिलता रहा, तो इस अभियान को अन्य गांवों तक और खूबसूरत ढंग से विस्तारित किया जाएगा। साथ ही, बच्चों की ग्रीष्मकालीन एवं शीतकालीन अवकाश के अतिरिक्त अन्य पर्व-त्योहारों पर भी इस ढंग के पुस्तक मेलों का आयोजन किया जाएगा जहां कोई भी बच्चा या बड़ा अपनी पसंद की पुस्तक मुफ्त में ले जा सकता है। एक व्यक्ति को एक ही किताब दी जा रही थी, जबकि अनेक ग्रामवासी एक से अधिक किताबें लेना चाहते थे। यह भी देखा गया कि कोई कोई युवा, वहीं बैठकर पढ़ रहे थे ताकि पुस्तकों का अधिक से अधिक लाभ उठाया जा सके।
इस मेले में पुस्तक ले जाने वाले हर व्यक्ति का ब्यौरा भी एक रजिस्टर में लिखा जा रहा था। इस काम का जिम्मा मुख्य रूप से देहरादून से आये एक छात्र सम्यक रावत ने उठाया था। सम्यक ने एक दिलचस्प बात बताई कि कोई कोई बच्चे किताब के बारे में नहीं जानते थे पर बड़ों की देखा देखी वो भी एक किताब अपने नाम करवाकर ले जाना चाहते थे। कोई कोई छोटे बच्चे तो किताब का रंग या चित्र देखकर ही किताब चुन लेते थे। सम्यक ने कहा कि अगली बार छोटे बच्चों के लिए अधिक पुस्तकें आनी चाहिए।
इस आयोजन को सफल बनाने में आर.पी. विशाल, प्रभु सिंह पंवार, फते सिंह पंवार, सम्यक रावत, कृष्ण गोपाल (बिट्टू विशाल) और दीपक पंवार का विशेष योगदान रहा। आयोजन के सूत्रधार शुबा ने शिक्षक दीवान सिंह चौहान, अतुल चौहान (ग्राम प्रधान), गौरव नौटियाल, बृजमोहन, रमेशी रीना, रेखा पंवार तथा समस्त भुटाणू ग्रामवासियों का उनके सहयोग के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किया।
जहां पढ़ने की शौकीन अदिति पंवार, ऋषिता और प्राची पंवार जैसी विश्वविद्यालयी छात्राएं अपने गांव में ऐसे अनोखे मेले से सुखद आश्चर्य में थे, वहीं स्कूली छात्र दीपू पंवार और दिव्यांश पंवार अपनी पसंद की किताबें पाकर फूले नहीं समा रहे थे।
