उत्तराखण्ड
हरिद्वार से विधानसभा में लौटने की ‘हरदा’ की इच्छा, सियासत में फिर हलचल; क्या 2027 में बदलेगा हरीश रावत का चुनावी ठिकाना?
देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक ऐसी राजनीतिक इच्छा जाहिर की है, जिसने कांग्रेस के भीतर और हरिद्वार की सियासत में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। रावत ने सोशल मीडिया पर लिखी लंबी पोस्ट में हरिद्वार से एक बार फिर विधानसभा का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा खुलकर सामने रखी है। हालांकि उन्होंने इसे अभी चुनाव लड़ने का अंतिम ऐलान नहीं बताया है।
रावत ने अपनी पोस्ट में हरिद्वार से अपने पुराने रिश्ते को याद करते हुए लिखा कि उम्र बढ़ रही है, लेकिन हरिद्वार के साथ उनका रोमांस भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने 2009 से 2014 के बीच हरिद्वार से लोकसभा सांसद रहने के दौर को अपने जीवन का स्वर्णिम काल बताया। उनके मुताबिक उस दौरान मतदाता और प्रतिनिधि के रिश्ते इतने गहरे हो गए थे कि दोनों को अलग-अलग पहचानना मुश्किल था।
‘क्या मैं एक बार फिर हरिद्वार का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता?’
हरीश रावत की पोस्ट का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश इसी सवाल में छिपा है। उन्होंने लिखा कि उनके मन में इच्छा उठ रही है कि क्या वह एक बार फिर हरिद्वार का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा कि हरिद्वार के लिए उनके मन में बहुत सारी सोच और योजनाएं हैं और वह विधानसभा को ‘हरिद्वारमय’ करना चाहते हैं।
रावत ने यह भी दावा किया कि सोलानी के इस पार के लोगों के मन में यह भावना है कि एक बार हरिद्वार से हरीश रावत को विधानसभा भेजा जाए।
हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने अपने कदम को लेकर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सावधानी भी दिखाई। रावत ने साफ किया कि जब वह राज्य के व्यापक सवालों और पार्टी के आंतरिक सवालों को ध्यान में रखते हैं तो उन्हें अपनी व्यक्तिगत भावना को दबाना पड़ता है। यानी पोस्ट में इच्छा स्पष्ट है, लेकिन उम्मीदवारी को लेकर अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है।
हरिद्वार की सीट या अपने पसंदीदा चेहरे की तलाश?
यही वह बिंदु है जिसने रावत की पोस्ट को महज भावनात्मक बयान के बजाय राजनीतिक संकेत में बदल दिया है।
उन्होंने कहा कि वह हरिद्वार से इस बार एक सुदृढ़, विवेकशील, समन्वयकारी और सबको साथ लेकर चलने वाला नेतृत्व विधानसभा में पहुंचाने के लिए काम कर सकते हैं। इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि यदि स्वयं चुनाव मैदान में उतरने की परिस्थितियां नहीं बनती हैं तो वह हरिद्वार में कांग्रेस के लिए किसी ऐसे चेहरे को आगे बढ़ाने की भूमिका निभा सकते हैं, जिसे वह अपने राजनीतिक दृष्टिकोण के अनुकूल मानते हों।
हालांकि यह अभी राजनीतिक व्याख्या है, रावत ने स्वयं किसी संभावित उम्मीदवार का नाम नहीं लिया है।
अल्मोड़ा का जिक्र भी महत्वपूर्ण
रावत की पोस्ट में अल्मोड़ा का जिक्र भी राजनीतिक रूप से ध्यान खींचता है। उन्होंने कहा कि वह हरिद्वार की सेवा करते रहेंगे, लेकिन अल्मोड़ा को ध्यान में रखकर और कोई चीज छिपाकर नहीं।
यह संकेत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रावत की राजनीतिक पहचान केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं रही है। वह अल्मोड़ा से भी लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं और उत्तराखंड की राजनीति में उनका व्यापक आधार रहा है। ऐसे में हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा के साथ अल्मोड़ा का उल्लेख उनके व्यापक राजनीतिक रिश्तों को भी रेखांकित करता है।
2009 से शुरू हुआ हरिद्वार कनेक्शन
हरीश रावत 2009 में हरिद्वार लोकसभा सीट से सांसद निर्वाचित हुए थे और 2014 तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। इस दौरान हरिद्वार उनके राजनीतिक जीवन का प्रमुख केंद्र बना। बाद में 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने हरिद्वार सीट से चुनाव नहीं लड़ा, बल्कि नैनीताल-ऊधमसिंह नगर से मैदान में उतरे।
अब करीब एक दशक से अधिक समय बाद रावत का फिर हरिद्वार की विधानसभा राजनीति की ओर खुला झुकाव सामने आया है। यही वजह है कि उनकी पोस्ट को 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच सामान्य राजनीतिक टिप्पणी के बजाय एक संभावित चुनावी संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
पहले चुनाव न लड़ने के संकेत, अब हरिद्वार की इच्छा
रावत की ताजा पोस्ट उनके हाल के राजनीतिक बयानों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। 21 सितंबर को उन्होंने कहा था कि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस जो आदेश देगी, वह उसके अनुरूप काम करेंगे।
इसके कुछ ही दिन बाद हरिद्वार से स्वयं प्रतिनिधित्व करने की इच्छा जताना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
हरकी पैड़ी पर अगले दिन और स्पष्ट हुए संकेत
इस पोस्ट के अगले दिन हरिद्वार पहुंचे रावत ने हरकी पैड़ी पर गंगा पूजन किया। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि हरिद्वार से चुनाव लड़ने की इच्छा उनके मन में जरूर है, लेकिन अंतिम फैसला समय, परिस्थितियों, स्वास्थ्य और उम्र को देखते हुए लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी इच्छा है कि जीवन के अंतिम समय में उनकी अंतिम यात्रा हरिद्वार के प्रतिनिधि के तौर पर निकले।
इससे इतना जरूर स्पष्ट हुआ कि सोशल मीडिया पोस्ट महज पुरानी यादों को साझा करने तक सीमित नहीं थी। हरिद्वार से विधानसभा चुनाव लड़ने की संभावना उनके मन में वास्तविक रूप से मौजूद है, हालांकि अभी इसे उम्मीदवारी की घोषणा नहीं कहा जा सकता।
कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं होगा फैसला
रावत की उम्र, उनका लंबा राजनीतिक अनुभव, हरिद्वार से पुराना व्यक्तिगत जुड़ाव और पार्टी के भीतर मौजूद विभिन्न राजनीतिक समीकरण—इन सभी को देखते हुए यदि वह वास्तव में टिकट मांगते हैं तो कांग्रेस के लिए यह सिर्फ एक सीट का टिकट तय करने का मामला नहीं रहेगा।
हरिद्वार जिले में कई विधानसभा सीटें हैं और प्रत्येक सीट का स्थानीय सामाजिक तथा राजनीतिक समीकरण अलग है। ऐसे में रावत के सामने भी यही सवाल रहेगा कि किस सीट से चुनाव लड़ना है, पार्टी की स्थानीय राजनीति क्या कहती है और संगठन उनके पक्ष में कितना खड़ा होता है।
दूसरी ओर कांग्रेस के लिए यह तय करना होगा कि रावत को सीधे मैदान में उतारना है या उनके अनुभव का इस्तेमाल किसी नए चेहरे को आगे बढ़ाने में करना है।
‘खुल्लम-खुल्ला प्यार’ ने खोल दिया 2027 का नया पन्ना
हरीश रावत ने अपनी पोस्ट के अंत में हरिद्वार के साथ अपने रिश्ते को लेकर कहा कि उनका प्यार कभी छिपा हुआ नहीं था, बल्कि ‘खुल्लम-खुल्ला प्यार’ था और आगे भी रहेगा।
यही पंक्ति उनकी पूरी पोस्ट का राजनीतिक सार भी बन गई है। उन्होंने अभी यह नहीं कहा कि वह हरिद्वार की किसी खास विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे, लेकिन पहली बार 2027 के चुनाव को लेकर हरिद्वार से विधानसभा में वापसी की अपनी व्यक्तिगत इच्छा इतने स्पष्ट शब्दों में सामने रख दी है।
अब नजर कांग्रेस संगठन के अगले कदम और हरिद्वार के स्थानीय राजनीतिक समीकरणों पर रहेगी। क्योंकि यदि रावत स्वयं मैदान में उतरने का फैसला करते हैं तो 2027 में हरिद्वार की विधानसभा राजनीति का एक महत्वपूर्ण चुनावी अध्याय उनके नाम के इर्द-गिर्द भी घूम सकता है।

