उत्तराखण्ड
हार की साढ़े साती दूर करने के लिए श्रीराम की शरण में कांग्रेस
हार की साढ़ेसाती दूर करने के लिए श्रीराम की शरण में कांग्रेस
हनुमान दिवस पर रामलीला मैदान से चुनावी श्रीगणेश, खड़गे की सभा ने दिया सियासी संकेत; दो चुनाव से सत्ता से बाहर पार्टी के लिए 2027 की वापसी की बड़ी चुनौती
हल्द्वानी। राजनीति में संयोग भी कई बार संकेत बन जाते हैं। उत्तराखंड की सत्ता में लगातार दो विधानसभा चुनाव से वापसी का इंतजार कर रही कांग्रेस ने शनिवार को हल्द्वानी के रामलीला मैदान से अपने चुनावी अभियान का श्रीगणेश किया। दिन शनिवार था, जिसे हनुमानजी की उपासना का विशेष दिन माना जाता है और मंच था रामलीला मैदान—यानी श्रीराम की लीला से जुड़ा मैदान। ऐसे में कांग्रेस के इस आयोजन को राजनीतिक रूपक में देखें तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या दो चुनाव से चली आ रही ‘साढ़ेसाती’ दूर करने के लिए कांग्रेस अब श्रीराम की शरण में पहुंच गई है?
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की मौजूदगी में हुई जनसभा ने पार्टी के चुनावी अभियान को औपचारिक शुरुआत जरूर दी, लेकिन इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण इसके पीछे दिखाई देने वाला राजनीतिक प्रतीक है। कांग्रेस के लिए 2027 का चुनाव केवल सत्ता में वापसी की कोशिश नहीं है, बल्कि लगातार दो चुनावी हार के बाद अपने राजनीतिक अस्तित्व और संगठनात्मक ताकत को फिर से साबित करने की चुनौती भी है।
दो चुनाव की हार और कांग्रेस की ‘साढ़ेसाती’
उत्तराखंड में कांग्रेस को 2017 के विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवानी पड़ी थी। इसके बाद 2022 में पार्टी ने सत्ता में वापसी की उम्मीद की, लेकिन भाजपा फिर सरकार बनाने में सफल रही। यानी कांग्रेस लगातार दो विधानसभा चुनावों से सत्ता से बाहर है।
यही वजह है कि 2027 का चुनाव पार्टी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
अगर राजनीतिक भाषा में इसे ‘साढ़ेसाती’ का रूपक दिया जाए तो कांग्रेस के सामने इस दौर को समाप्त करने की चुनौती साफ दिखाई देती है। पार्टी को न केवल भाजपा सरकार के खिलाफ माहौल तैयार करना होगा, बल्कि अपने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में यह भरोसा भी पैदा करना होगा कि वह वास्तव में सत्ता में वापसी कर सकती है।
इसीलिए रामलीला मैदान से चुनावी शुरुआत महज एक जनसभा नहीं, बल्कि कांग्रेस के लिए राजनीतिक मनोबल बहाल करने का प्रयास भी दिखाई देती है।
शनिवार, हनुमान और रामलीला मैदान का संयोग
शनिवार को हनुमानजी की पूजा को लेकर धार्मिक आस्था है। मान्यता है कि इस दिन बजरंगबली की उपासना से शनिदेव के प्रतिकूल प्रभाव से राहत मिलती है और भय व नकारात्मकता दूर होती है।
इसी धार्मिक मान्यता को अगर राजनीतिक रूपक में देखें तो कांग्रेस की स्थिति से इसका एक दिलचस्प साम्य दिखाई देता है।
एक तरफ कांग्रेस के सामने दो चुनाव से सत्ता से बाहर रहने की चुनौती है, दूसरी तरफ पार्टी ने उसी दिन रामलीला मैदान से अपने चुनावी अभियान की शुरुआत की, जिस दिन हनुमानजी की उपासना का विशेष महत्व माना जाता है।
यह महज संयोग हो सकता है। लेकिन चुनावी राजनीति में स्थान, समय और प्रतीक कभी-कभी अपने आप में संदेश बन जाते हैं।
कांग्रेस ने चाहे इसे रणनीति के तहत चुना हो या नहीं, रामलीला मैदान ने उसके चुनावी अभियान को धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीक जरूर दे दिया है।
भाजपा के सबसे मजबूत नैरेटिव में कांग्रेस की दस्तक?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू है।
राम, हनुमान, सनातन और हिंदू सांस्कृतिक पहचान लंबे समय से भाजपा के राजनीतिक विमर्श के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। कांग्रेस पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वह इस मुद्दे पर भाजपा के मुकाबले रक्षात्मक रहती है।
लेकिन अब कांग्रेस के सामने सवाल है कि क्या वह भाजपा के हिंदुत्व नैरेटिव का मुकाबला केवल उसके विरोध से कर सकती है?
शायद नहीं।
कांग्रेस को यह समझना होगा कि धार्मिक आस्था का राजनीतिक प्रभाव केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड की पहचान ही देवभूमि के रूप में है। ऐसे में यदि कांग्रेस धार्मिक प्रतीकों से पूरी तरह दूरी बनाए रखती है तो भाजपा को इस राजनीतिक मैदान में लगभग एकतरफा बढ़त मिल सकती है।
रामलीला मैदान से चुनावी अभियान का श्रीगणेश इसलिए इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस पहली बार नहीं, लेकिन एक बार फिर यह संदेश देने की कोशिश करती दिखाई दे रही है कि राम किसी एक दल के नहीं हैं और आस्था पर किसी राजनीतिक दल का एकाधिकार नहीं हो सकता।
‘श्रीराम की शरण’ का मतलब क्या है?
यहां ‘श्रीराम की शरण’ को सीधे तौर पर कांग्रेस की हिंदुत्व राजनीति में प्रवेश के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
कांग्रेस अभी भी भाजपा से अलग राजनीतिक पहचान रखती है। उसके लिए रोजगार, महंगाई, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दे चुनावी राजनीति के केंद्र में रहेंगे।
लेकिन पार्टी अगर इन मुद्दों के साथ देवभूमि की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को भी जोड़ने की कोशिश करती है तो उसका चुनावी संदेश ज्यादा व्यापक हो सकता है।
यानी कांग्रेस के सामने शायद ‘भाजपा की नकल करने’ के बजाय ‘भाजपा के मजबूत नैरेटिव को अपने तरीके से जवाब देने’ की रणनीति हो।
खड़गे की सभा से मिली कार्यकर्ताओं को संजीवनी
इस पूरे आयोजन का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ कांग्रेस को कार्यकर्ताओं के स्तर पर मिला।
बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा किया। लंबे समय से विपक्ष में रहने वाली पार्टी के लिए यह मनोबल बेहद महत्वपूर्ण है।
चुनाव केवल बड़े नेताओं की सभाओं से नहीं जीते जाते। चुनाव बूथ पर लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ताओं से जीते जाते हैं।
इस लिहाज से रामलीला मैदान की भीड़ कांग्रेस के लिए एक तरह की राजनीतिक संजीवनी बनकर सामने आई।
अब पार्टी की असली परीक्षा यह होगी कि शनिवार की भीड़ को वह बूथ स्तर की सक्रियता में कितना बदल पाती है।
मंच से एसएसपी दफ्तर तक—कांग्रेस ने दिखाए तेवर
जनसभा के बाद कार्यकर्ताओं के वाहनों को रोके जाने के आरोपों ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया। कांग्रेस के बड़े नेताओं का एसएसपी कार्यालय पहुंचकर धरने पर बैठना भी पार्टी के लिए एक संदेश बन गया।
कांग्रेस ने कार्यकर्ताओं को यह संकेत देने की कोशिश की कि चुनावी संघर्ष में नेतृत्व उनके साथ खड़ा है।
यह बात संगठन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लगातार चुनावी हार के बाद कार्यकर्ता के मन में अगर कहीं निराशा या असुरक्षा है तो नेतृत्व का सड़क पर उतरना उसे राजनीतिक ऊर्जा दे सकता है।
यानी शनिवार को कांग्रेस के लिए एक तरफ रामलीला मैदान में आस्था और भीड़, तो दूसरी तरफ एसएसपी कार्यालय में संघर्ष और तेवर दिखाई दिए।
असली सवाल—साढ़ेसाती कितनी लंबी है?
रामलीला मैदान की सभा कांग्रेस के लिए शुरुआत है, समाधान नहीं।
2027 में सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस को केवल धार्मिक प्रतीकों के सहारे आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। उसे संगठन मजबूत करना होगा, गुटबाजी पर नियंत्रण करना होगा, स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय करना होगा और भाजपा सरकार के खिलाफ ऐसा मुद्दा खड़ा करना होगा जो आम मतदाता के जीवन से सीधे जुड़ता हो।
इसके साथ उसे हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को बनाए रखने के बीच संतुलन भी बनाना होगा।
यही कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होगी।
अब देखना यह है…
शनिवार को हनुमान दिवस पर रामलीला मैदान से कांग्रेस ने चुनावी श्रीगणेश कर दिया। इसे संयोग कहें या रणनीति, लेकिन प्रतीक मजबूत बन गया है।
दो चुनाव से सत्ता से बाहर कांग्रेस के लिए यह राजनीतिक ‘साढ़ेसाती’ खत्म करने का समय है। रामलीला मैदान से शुरू हुआ अभियान क्या उसे सत्ता की दहलीज तक पहुंचाएगा, यह 2027 तय करेगा।
फिलहाल तस्वीर इतनी जरूर साफ है कि कांग्रेस ने चुनावी रण में पहला कदम ऐसे मैदान से रखा है, जिसका नाम ही रामलीला है।
और सियासत की भाषा में कहें तो—
हर की साढ़ेसाती दूर करने के लिए श्रीराम की शरण में पहुंची कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि आस्था के इस प्रतीक को वह चुनावी ऊर्जा और फिर उस ऊर्जा को वोट में कितना बदल पाती है।
