उत्तराखण्ड
घर-कुड़ी पेंशन का ऐलान या कांग्रेस में नेतृत्व की जमीन तैयार करने की कोशिश? हरदा ने फिर खोला अपना राजनीतिक पिटारा
घर-कुड़ी आबाद रखने वाले परिवारों को पेंशन देने का वादा पहली नजर में पहाड़ की जड़ों से जुड़े लोगों को प्रोत्साहित करने वाली योजना है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी हैं। खास बात यह है कि हरीश रावत केवल सरकार बनने की स्थिति में एक योजना की बात नहीं कर रहे, बल्कि यह भी संकेत दे रहे हैं कि उनके पास उत्तराखंड के लिए अपनी अलग राजनीतिक और नीतिगत सोच है।
2027 से पहले हरीश रावत का नया दांव, पहाड़ में घर आबाद रखने वालों को पेंशन देने का वादा; क्या कल्याणकारी योजनाओं के बहाने कांग्रेस की भावी सरकार में अपनी भूमिका और नेतृत्व की दावेदारी मजबूत कर रहे हैं पूर्व मुख्यमंत्री?
मनोज लोहनी, देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी अपने पुराने राजनीतिक अंदाज में लगातार नए मुद्दों के साथ सामने आ रहे हैं। इस बार उनके निशाने पर पहाड़ का सबसे बड़ा दर्द पलायन है। रावत ने ऐलान किया है कि यदि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है तो पहाड़ में अपने घर-कुड़ी को आबाद रखने वाले परिवारों के लिए विशेष पेंशन योजना शुरू की जाएगी। यानी जो लोग तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपने गांव और पुश्तैनी मकानों को छोड़कर मैदानों की ओर नहीं गए, सरकार उन्हें आर्थिक प्रोत्साहन देगी।
पहली नजर में यह घोषणा पहाड़ की संस्कृति, गांवों और पारंपरिक जीवनशैली को बचाने की दिशा में एक सकारात्मक पहल दिखाई देती है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। सवाल यह है कि क्या हरीश रावत केवल पलायन के खिलाफ एक नई सामाजिक सुरक्षा योजना का विचार सामने रख रहे हैं या फिर इस बहाने 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता और भावी भूमिका को भी रेखांकित कर रहे हैं?
दरअसल, हरीश रावत की राजनीति का एक खास अंदाज रहा है। वह केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समय-समय पर ऐसी योजनाओं और अवधारणाओं को सामने लाते हैं, जिनके माध्यम से अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश करते हैं। पेंशन योजनाओं से लेकर उत्तराखंडियत और स्थानीय संस्कृति को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाने तक उनका यह अंदाज पहले भी दिखाई देता रहा है। घर-कुड़ी पेंशन का नया प्रस्ताव भी इसी राजनीतिक शैली का विस्तार माना जा सकता है।
इस घोषणा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हरीश रावत ने योजना को कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति से जोड़ा है। यानी वह केवल सरकार से मांग नहीं कर रहे, बल्कि भविष्य की सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं को लेकर अपना विजन भी प्रस्तुत कर रहे हैं। राजनीतिक दृष्टि से यह अपने आप में महत्वपूर्ण है। किसी भी पार्टी में चुनाव से पहले वही नेता अधिक प्रभावी दिखाई देता है, जिसके पास केवल चुनाव लड़ने की नहीं, बल्कि सरकार चलाने और नीतियां तय करने की भी स्पष्ट सोच हो।
यहीं से हरदा की राजनीतिक मंशा को लेकर चर्चाओं का दूसरा सिरा जुड़ता है। कांग्रेस में 2027 के चुनाव को लेकर नेतृत्व का सवाल अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। प्रदेश में गणेश गोदियाल, यशपाल आर्य, प्रीतम सिंह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की अपनी राजनीतिक भूमिका है। ऐसे में हरीश रावत लगातार जनहित से जुड़े मुद्दों और नई योजनाओं के जरिए यह संदेश देने की कोशिश करते दिखाई देते हैं कि उत्तराखंड की राजनीति में उनका अनुभव और उनका राजनीतिक विजन आज भी महत्वपूर्ण है।
यह भी गौर करने वाली बात है कि हरीश रावत हाल के दिनों में चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा और पार्टी में अपनी भूमिका को लेकर भी संकेत दे चुके हैं। खानपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जताने के साथ उन्होंने पार्टी नेतृत्व के फैसले को अंतिम बताया था। ऐसे में घर-कुड़ी पेंशन का ऐलान केवल एक कल्याणकारी घोषणा नहीं, बल्कि उनके व्यापक राजनीतिक अभियान के हिस्से के रूप में भी देखा जा सकता है।
हालांकि, इस योजना के सामने कई व्यावहारिक सवाल भी हैं। पहाड़ में घर आबाद रखने की पात्रता कैसे तय होगी? क्या केवल मकान होने से पेंशन मिलेगी या परिवार का गांव में नियमित निवास भी जरूरी होगा? खेती करने वाले परिवारों और केवल पुश्तैनी मकान की देखभाल करने वालों के बीच क्या अंतर होगा? पेंशन की राशि कितनी होगी और इसके लिए बजट का इंतजाम कैसे किया जाएगा? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है।
लेकिन राजनीतिक संदेश के लिहाज से हरदा ने एक बार फिर पहाड़ के उस वर्ग को संबोधित किया है, जो पलायन के दबाव के बावजूद अपने गांवों में रुका हुआ है। यह वर्ग केवल एक परिवार नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का भी रक्षक है।
अब असली सवाल यह है कि हरदा पहाड़ के घर-कुड़ी आबाद रखने वालों के लिए पेंशन की राह बना रहे हैं या 2027 में कांग्रेस की सत्ता वापसी की स्थिति में अपने लिए नीतिगत नेतृत्व की जमीन भी तैयार कर रहे हैं? उनकी घोषणाएं कम से कम इतना संकेत जरूर देती हैं कि वह चुनावी राजनीति में अपनी भूमिका को छोटा करके देखने के मूड में नहीं हैं।
