अपराध
ज्योलिकोट में पीलिया से दो मौत के बाद हालात गंभीर, युवा और महिला ने दम तोड़ा
ज्योलीकोट में पीलिया का प्रकोप: बीमारी से ज्यादा सवाल व्यवस्था पर
दो मौतों ने खोली पेयजल व्यवस्था की पोल, आठ गांवों में दहशत; दूषित पानी की शिकायतों के बावजूद समय रहते क्यों नहीं चेता तंत्र?
ज्योलीकोट/नैनीताल। ज्योलीकोट क्षेत्र में पीलिया से हुई दो मौतों ने एक स्थानीय स्वास्थ्य समस्या को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट में बदल दिया है। एक किशोर और एक महिला की मौत के बाद आठ गांवों में जलजनित बीमारी के मामले सामने आने से ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई है। मामला केवल बीमारी के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि अब इसकी सबसे बड़ी कड़ी पेयजल की गुणवत्ता, जलस्रोतों की निगरानी और शिकायतों पर सरकारी तंत्र की प्रतिक्रिया से जुड़ गई है।
सरियाताल निवासी 16 वर्षीय रितेश और छीड़ा निवासी 26 वर्षीय नीमा जोशी की उपचार के दौरान मौत हुई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार दोनों मामलों में पीलिया की पुष्टि हुई थी। रितेश की हालत बिगड़ने के बाद उसे दिल्ली रेफर किया गया, जबकि नीमा का बरेली के निजी अस्पताल में उपचार चल रहा था। दोनों परिवारों पर इस त्रासदी का गहरा असर पड़ा है।
आठ गांवों तक पहुंचा संकट
ज्योलीकोट न्याय पंचायत के बेलवाखान, भल्यूटी, सड़ियाताल, छीड़ा, गंजा, चोपड़ा, कृष्णापुर और गोरिया गांवों में जलजनित बीमारी के मामले सामने आने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों के अनुसार पिछले कुछ समय से पेयजल लाइनों में गंदा पानी आने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।
यही बिंदु पूरे मामले को गंभीर बनाता है। यदि दूषित पानी की शिकायतें पहले से मिल रही थीं तो सवाल यह है कि पानी के स्रोत, पाइपलाइन और वितरण व्यवस्था की समय रहते जांच क्यों नहीं हुई? और यदि जांच हुई थी तो संक्रमण का खतरा सामने आने के बाद तत्काल स्थायी कदम क्यों नहीं उठाए गए?
बीमारी सामने आने के बाद सक्रिय हुआ स्वास्थ्य तंत्र
स्थिति बिगड़ने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने ज्योलीकोट पीएचसी में अतिरिक्त बेड बढ़ाए हैं और चिकित्सकों की अतिरिक्त टीम तैनात की गई है। स्वास्थ्य विभाग की टीमें प्रभावित क्षेत्रों में घर-घर जाकर लोगों की स्थिति की निगरानी कर रही हैं।
संक्रमण की आशंका को देखते हुए क्षेत्र के विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों में भी अग्रिम आदेश तक अवकाश घोषित किया गया है। यह कदम बताता है कि प्रशासन अब मामले को सामान्य मौसमी बीमारी के बजाय गंभीरता से ले रहा है।
विश्लेषण: दो मौतें महज आंकड़ा नहीं, चेतावनी हैं
ज्योलीकोट की स्थिति को केवल पीलिया के मामलों की संख्या के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में पेयजल स्रोत, पुरानी पाइपलाइन, बरसात के दौरान जलस्रोतों में गंदगी और पेयजल लाइनों में संभावित रिसाव जैसे कारण जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या प्रशासन बीमारी फैलने के बाद इलाज की व्यवस्था कर रहा है या बीमारी की जड़ तक भी पहुंच रहा है?
यदि दूषित पानी ही संक्रमण का कारण है तो केवल मरीजों का उपचार पर्याप्त नहीं होगा। जब तक संदिग्ध जलस्रोत और पाइपलाइन व्यवस्था की जांच कर उन्हें सुरक्षित नहीं किया जाता, तब तक बीमारी दोबारा फैलने का खतरा बना रहेगा।
अब जरूरत इलाज से आगे बढ़कर कारण तलाशने की
मामले में पानी के नमूनों की वैज्ञानिक जांच, जलस्रोतों का निरीक्षण और पाइपलाइन नेटवर्क की विस्तृत जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। साथ ही प्रभावित गांवों में लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना और संदिग्ध स्रोतों से पानी के इस्तेमाल को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए।
दो मौतों के बाद प्रशासन ने निगरानी और चिकित्सा व्यवस्था बढ़ा दी है, लेकिन इस पूरे प्रकरण की असली परीक्षा अब होगी। क्या व्यवस्था सिर्फ बीमारी का इलाज करेगी या उस वजह को भी खत्म करेगी, जिसने बीमारी को गांव-गांव तक पहुंचने का मौका दिया?
ज्योलीकोट का यह संकट स्वास्थ्य विभाग, जल संस्थान और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत भी सामने लाता है। क्योंकि पानी की एक छोटी-सी लापरवाही अगर बीमारी का बड़ा कारण बन जाए तो उसका खामियाजा सबसे पहले आम ग्रामीण को भुगतना पड़ता है।

