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अजब किस्सा टूटी कुर्सी का, पैरों के बल डॉक्टर!, सरकारी अस्पताल में टूटी कुर्सी के चलते हुआ ऐसा बखेड़ा कि डॉक्टर और प्रभारी के बीच खिंची तलवारें

मनोज लोहनी, हल्द्वानी
किस्सी यहां कुर्सी का है, वह भी टूटी कुर्सी का! किस्सा ऐसा कि कुर्सी की असल अहमियत आपको यहां पता लगेगी। कुर्सी होती तो बैठने के लिए मगर यहां कुर्सी ने एक डॉक्टर को खड़ा कर दिया है, डॉक्टर पैरों के बल है। टूटी कुर्सी के चलते ही अब पैरों के बल आ चुके डॉक्टर और प्रभारी के बीच तलवारें खिंच आई हैं।
तो टूटी कुर्सी का किस्सा इस प्रकार है। कोटाबाग के सरकार अस्पताल में चिकित्सक हैं डॉ. हर्ष चौहान। वह मरीज देखने के लिए अपने कमरे में गए। उन्हें लगा कि कुर्सी गर्मी के मौसम के लिहाज से ठीक नहीं है, कुर्सी काफी पुरानी है। उन्होंने मीटिंग हाल से एक कुर्सी मंगवाई और मरीज देखने लगे। मरीज देखने के बाद वह घर गए। शाम को उन्हें अपने कमरे में आकर कुछ काम करना था। पता चला कि कमरे की कुर्सी बदल दी गई है, कोई दिक्कत नहीं, बात केवल बैठने की ही थी। कमरे में पहुंचे तो देखा कि वहां एक ऐसी कुर्सी रख दी गई है जिसमें आप दाएं-बाएं कहीं भी गिर सकते हैं, यानी टूटी कुर्सी। इस कुर्सी को उन्होंने प्रभारी के पास भिजवाया कि इसे ठीक करवा दीजिए, या फिर कोई और कुर्सी का इंतजाम करवा दीजिए, अगले दिन उन्हें मरीज देखने हैं। वह अगले दिन मरीज देखने पहुंचे तो देखा कि वहां कोई कुर्सी नहीं है। बहरहाल उन्हें मरीज देखने थे तो उन्होंने तय कि कि वह मरीज देखेंगे, साथ ही प्रभारी के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए उन्होंने अपनी मेज के आगे विरोध दर्ज करने के लिए एक कागज चस्पा कर दिया। पूरे दिन करीब ५० के आसपास मरीज देखे खड़े-खड़े। यह किस्से का पहला पार्ट है, यहां लिखी गई बातें हूबहू डॉक्टर हर्ष चौहान की बताई हैं। आगे क्या करेंगे? ऐसा पूछने पर डॉ. हर्ष का कहना था कि उनका पहला काम मरीजों की सेवा करना है, वह सोमवार को भी मरीज देखेंगे खड़े-खड़े पर उनका सांकेतिक विरोध जारी रहेगा। उनका कहना था कि कुर्सी ठीक करने के बावत ऑफिशियल ग्रुप में भी लिखा गया, मैसेज भी किया प्रभारी को जिसका कि कोई जवाब नहीं दिया गया। बोले, सरकार ने मरीज देखने के लिए अपाइंट किया है, अगर उन्होंने मीटिंग हॉल से कोई कुर्सी मंगवा ली तो क्या गलत? कुर्सी मैं अपने घर नहीं ले जा रहा था, बल्कि मरीज देखने के लिए लाया था।

क्या कहना है प्रभारी का
इस बारे में अस्पताल की प्रभारी डॉ. ऐश्वार्य कांडपाल से बात हुई। उन्होंने कहा- छोटी सी बात, डिमांड भेजी नहीं कुर्सी चाहिए, मीटिंग हाल की कुर्सी थी, उसको मेरे से पूछे बगैर चोरी करके ले आए, मैं गई थी वहां तो खड़े होकर मीटिंग कैसे लेती, एक कुर्सी मेन होती है इंचार्ज बैठते हैं जिसमें, मुझसे पूछे बगैर वह कुर्सी ले ली, डिमांड भी नहीं भेजी, बोलते तो सही कि कुर्सी की जरूरत है, मैं कुछ भी करके रखवा देती, गलती इनकी है, आराम से बात करते, रिटन में कुछ नहीं दिया, वर्बली भी नहीं कहा, मीटिंग हाल में कुर्सी गायब जो मुझे बाद में पता चला। कोई पूछने की जरूरत नहीं समझी इंचार्ज से कुर्सी उठाने के लिए।

अब क्या होगा
टूटी कुर्सी का यह किस्सा फिलहाल रुकता नहीं दिख रहा है। प्रभारी का कहना है कि डॉक्टर ने उनसे बात नहीं की, डॉक्टर का कहना है कि वह सोमवार को भी खड़े-खड़े मरीज देखेंगे। कुर्सी कहां से आएगी, कैसी होगी और कौन भेजेगा, इस यक्ष प्रश्न का सोमवार को जवाब मिले या नहीं, यह सोमवार को ही पता चलेगा।

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