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भारत के साथ-साथ दुनिया को डराने लगी है महंगाई डायन, कई तरह के संकट सामने आने लगे हैं

 महंगाई डायन खाये जात हैं…. ये चर्चित गाना फिर से इस समय प्रासंगिक हो गया है. भारत के साथ दुनिया के तमाम देशों में महंगाई एक खतरा बनती जा रही है. कल ही अमेरिका में इंफ्लेशन यानी महंगाई के आंकड़े आए थे. मार्च के आंकड़े देख कर अमेरिकी सरकार की टेंशन बढ़ गई है. मार्च में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (Consumer Price Index) 8.5 फीसदी पर पहुंच गया है. बीते 40 साल में अमेरिका में महंगाई में यह सबसे बड़ा उछाल है.

भारत के साथ साथ दुनियाभर में महंगाई के आंकड़े डराने लगे हैं. इंग्लैंड में मार्च में महंगाई यानी इनफ्लेशन (Inflation in England) 7 परसेंट पर पहुच गया है. यह 30 साल में इंग्लैंड में इनफ्लेशन का सबसे हाई लेवल है. भारत में मार्च में रिटेल इनफ्लेशन (Retail Inflation in India) 6.95% पर पहुंच चुका है. बढ़ती महंगाई ने सरकारों के साथ साथ केंद्रीय बैंकों की चिंताएं बढ़ाई दी हैं.

अर्थव्यवस्था की रिकवरी पर लग रहा ब्रेक
कोरोना से दुनिया दो साल से पहले ही तबाह थी. अब इकोनॉमी में धीरे धीरे रिकवरी आ रही थी. लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध ने संकट को और बढ़ा दिया गै. फ्यूल और फूड की बढ़ती कीमतों ने महंगाई की आग को और तेज कर दिया है. युद्ध की वजह से क्रूड ऑयल 100 डॉलर के पार चल रहा है. इसका सीधा असर इनफ्लेशन पर पड़ा है. बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट के मुताबिक, दुनिया के 60 फीसदी देशों में इनफ्लेशन 5 फीसदी से ज्यादा है.

1980 के दशक के बाद पहली बार दुनिया में महंगाई इतनी ज्यादा
बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट का मानना है कि 1980 के दशक के बाद पहली बार दुनिया में महंगाई में इतना उछाल दिख रहा है. यह नई चिंता का विषय बन गया है. विकसित देश भी इस महंगाई से बचे नहीं है. विकसित देशों में केंद्रीय बैंक आम तौर पर इनफ्लेशन के लिए 2 फीसदी टारगेट रखते हैं. उभरते देशों में औसत इनफ्लेशन विकसित देशों के मुकाबले ज्यादा रहता है. लेकिन, अभी ज्यादातर उभरते देशों में यह 7 फीसदी या इससे ज्यादा हो गया है. सिर्फ चीन और जापान अपवाद हैं, जहां इनफ्लेशन कम है.

राहत कब तक
एक्सपर्ट्स का मानना है कि महंगाई से फिलहाल राहत मिलती नहीं दिख रही है.इनफ्लेशन बढ़ाने वाली स्थितियां कुछ और समय तक जारी रह सकती हैं. एनर्जी और फूड प्राइसेज में उतार-चढ़ाव आम बात है. केंद्रीय बैंकों की चिंता इस बात से है कि अगर इनकी कीमतें काबू में नहीं आती हैं तो जल्द दूसरी चीजों और सेवाओं पर भी इसका असर पड़ सकता है. इससे कई देशों में लिविंग कॉस्ट बढ़ जाएगी. इसके चलते वेतन बढ़ाने की मांग जोर पकड़ सकती है.

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