उत्तराखण्ड
हरीश रावत का खुला विद्रोह!!! या असंतोष के संकेत जरूर! पार्टी के प्रति निष्ठा जताकर अपनी भूमिका का सवाल हाईकमान पर छोड़ा
फेसबुक पोस्ट में पूर्व मुख्यमंत्री ने गिनाईं अपनी राजनीतिक उपलब्धियां, जनाधार और संघर्ष; बोले— पार्टी कहेगी तो घर बैठ जाऊंगा, लेकिन मेरा इस्तेमाल करना है या नहीं, यह नेतृत्व को तय करना है
देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक नए राजनीतिक मोड़ पर दिखाई दे रहा है। पार्टी नेतृत्व के साथ दिल्ली में मुलाकात के बाद हरीश रावत की ताजा फेसबुक पोस्ट ने उनके रुख को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। पोस्ट में वह पार्टी को सर्वोपरि बताते हैं और नेतृत्व के आदेश का पालन करने की बात कहते हैं, लेकिन इसके साथ ही अपने राजनीतिक योगदान, जनता के बीच समर्थन और भाजपा से जारी संघर्ष का उल्लेख करके अपनी प्रासंगिकता भी रेखांकित करते हैं। ऐसे में इसे खुला विद्रोह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन उनके शब्दों में असंतोष और अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर उठते सवालों के संकेत जरूर दिखाई देते हैं।
हरीश रावत ने अपनी पोस्ट में लिखा है कि पार्टी से बड़ा कोई नहीं होता और नेतृत्व के प्रति आस्था लोकतंत्र को शक्ति देती है। उन्होंने वर्ष 2002 और 2012 की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि कठिन परीक्षाओं में भी वह पार्टी के साथ खड़े रहे और पार्टी ने उन्हें केंद्रीय मंत्री तथा मुख्यमंत्री बनाकर उसका पुरस्कार दिया। उनका यह बयान पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा जताने के साथ-साथ कांग्रेस नेतृत्व को अपने लंबे राजनीतिक योगदान की याद दिलाने वाला भी है।
के आदेश पर घर बैठने को तैयार, लेकिन अपनी भूमिका का फैसला नेतृत्व पर छोड़ा
पोस्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जिसमें हरीश रावत कहते हैं कि जिस दिन उन्हें लगेगा कि वह पार्टी के लिए भार बन रहे हैं या उनसे घर बैठने को कहा जाएगा, वह बिना पलक झपकाए आदेश का पालन करेंगे। पहली नजर में यह संगठन के प्रति समर्पण का संदेश है। लेकिन इसके साथ ही वह यह सवाल भी उठाते हैं कि किसी को तो उनकी राजनीतिक स्थिति का सही आकलन करना पड़ेगा, ताकि उनके किसी फैसले से पार्टी की संभावनाएं कमजोर न हों।
यहीं से पोस्ट का राजनीतिक अर्थ सामने आता है। हरीश रावत न तो पार्टी से अलग होने की बात कर रहे हैं और न ही नेतृत्व के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल रहे हैं। इसके बजाय वह अपनी भूमिका को लेकर फैसला करने की जिम्मेदारी हाईकमान पर छोड़ते दिखाई देते हैं। उनका संदेश है कि वह पार्टी के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक उपयोगिता का आकलन भी होना चाहिए।
‘मैं पूरक हूं, मेरा इस्तेमाल करना है या नहीं, यह उनको तय करना है’
हरीश रावत की पोस्ट की एक और अहम पंक्ति है कि वह सबके लिए एक पूरक हैं और यदि पार्टी उनका इस्तेमाल करना चाहती है तो वह उपलब्ध हैं। हालांकि, उनका उपयोग करना है या नहीं, यह फैसला उन लोगों को करना है जिनके पास राजनीतिक हथियार हैं।
यह बयान कांग्रेस नेतृत्व के सामने उनकी भूमिका का सवाल रखता है। वह अपने लिए किसी पद या जिम्मेदारी की खुली मांग नहीं करते, लेकिन यह स्पष्ट करते हैं कि उनके अनुभव और राजनीतिक पहचान का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके साथ ही वह निर्णय का अधिकार नेतृत्व को देकर भविष्य में अपनी भूमिका को लेकर एक गुंजाइश भी बनाए रखते हैं।
राजनीतिक नजरिये से देखें तो यह संदेश दो स्तरों पर काम करता है। एक तरफ हरीश रावत पार्टी के साथ बने रहने की बात कहते हैं, दूसरी तरफ वह अपनी उपयोगिता को नजरअंदाज नहीं किए जाने का संकेत देते हैं। यह असंतोष की ऐसी अभिव्यक्ति है, जिसमें टकराव के बजाय अपनी स्थिति स्पष्ट करने पर जोर दिखाई देता है।
जनता के समर्थन और चुनावी हार का जिक्र, अपनी प्रासंगिकता का दावा
हरीश रावत ने लालकुआं और किच्छा में लोगों से हुई बातचीत का हवाला देते हुए लिखा कि लोगों ने उनसे आश्चर्य जताया कि वह चुनाव कैसे हार गए। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं और आम लोगों का एक बड़ा वर्ग आज भी उनके साथ खड़ा है।
इस उल्लेख के भी राजनीतिक मायने हैं। चुनावी हार के बावजूद वह अपने जनाधार को कायम बताते हुए यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी राजनीति को केवल चुनाव परिणामों के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए। उनके अनुसार, जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता अब भी मौजूद है।
हालांकि, व्यक्तिगत लोकप्रियता और संगठन में राजनीतिक भूमिका दो अलग-अलग पहलू हैं। किसी नेता का जनाधार पार्टी के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन उसकी भूमिका तय करने में संगठन की रणनीति और सामूहिक नेतृत्व का भी महत्व होता है। हरीश रावत की पोस्ट में यही दोनों पक्ष आमने-सामने आते दिखाई देते हैं—एक ओर उनका अपना राजनीतिक आकलन और दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व का निर्णय।
भाजपा, सीबीआई और ईडी का जिक्र कर संघर्ष की राजनीति को भी सामने रखा
हरीश रावत ने पोस्ट में भाजपा पर निशाना साधते हुए सीबीआई और ईडी का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आज भी उन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी मानती है और उनकी छवि बिगाड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने राज्य के अन्य पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलने वाली सुविधाओं का जिक्र करते हुए अपने साथ अलग व्यवहार होने की बात भी कही।
इस हिस्से के जरिए वह अपने राजनीतिक विवाद को केवल कांग्रेस के अंदरूनी मामले तक सीमित नहीं रखते। वह खुद को भाजपा के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेता के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं। उनके संदेश में यह भाव है कि राजनीतिक मुश्किलों और विरोध के बावजूद वह पीछे हटने वाले नहीं हैं।
उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा, ‘लुढ़कते-लुढ़कते, घिसते-घिसते, शून्य में मिल सकता हूं, लेकिन टूट नहीं सकता हूं।’ यह पंक्ति उनके संघर्ष और राजनीतिक दृढ़ता के दावे को सामने रखती है। वह अपने समर्थकों को भी यह संदेश देते हैं कि उम्र, हार या विरोध के बावजूद उनकी राजनीतिक सक्रियता समाप्त नहीं हुई है।
दिल्ली की मुलाकात के बाद भी सवाल बरकरार, असंतोष किस बात का?
धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर कांग्रेस नेतृत्व की आपत्ति के बाद हरीश रावत का दिल्ली जाना और प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा से मुलाकात करना इस पूरे घटनाक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी है। मुलाकात के बाद उन्होंने पार्टी को मजबूत करने और 2027 में सत्ता में लाने को साझा लक्ष्य बताया था। उन्होंने यह उम्मीद भी जताई थी कि राज्य में पार्टी उनकी सेवाओं का उपयोग करेगी।
अब उनकी ताजा फेसबुक पोस्ट में भी यही बात दूसरे अंदाज में दिखाई देती है। वह पार्टी के प्रति निष्ठा जताते हैं, लेकिन साथ ही अपनी भूमिका, योगदान और जनसमर्थन का उल्लेख करते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या वह केवल यात्रा को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं या पार्टी में अपनी राजनीतिक भूमिका को लेकर व्यापक संदेश भी देना चाहते हैं?
पोस्ट के आधार पर उनके निजी इरादे को निश्चित रूप से तय नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना स्पष्ट है कि वह अपनी राजनीतिक उपयोगिता का सवाल सार्वजनिक विमर्श में ला रहे हैं। वह नेतृत्व के फैसले को चुनौती देने के बजाय उसे अपनी भूमिका तय करने की जिम्मेदारी सौंपते हैं।
कांग्रेस के सामने चुनौती: वरिष्ठ नेता के अनुभव का उपयोग या संगठनात्मक अनुशासन पर जोर?
हरीश रावत के इस बयान के बाद कांग्रेस नेतृत्व के सामने दो पहलू महत्वपूर्ण बने रहते हैं। एक तरफ उनके लंबे राजनीतिक अनुभव और जनता के बीच मौजूद पहचान का उपयोग करने का सवाल है, दूसरी तरफ संगठन की घोषित रणनीति और सामूहिक नेतृत्व के अनुरूप काम करने की अपेक्षा है।
कांग्रेस के लिए यह तय करना महत्वपूर्ण होगा कि वरिष्ठ नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक गतिविधियों और संगठन के साझा कार्यक्रमों के बीच समन्वय कैसे बनाया जाए। वहीं हरीश रावत के सामने भी यह सवाल है कि पार्टी के प्रति निष्ठा जताने के साथ वह अपनी राजनीतिक सक्रियता को संगठन की अपेक्षाओं के अनुरूप किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
फिलहाल उनकी पोस्ट में पार्टी छोड़ने या खुली बगावत का कोई ऐलान नहीं है। लेकिन अपने योगदान, जनाधार और उपयोगिता को जिस तरह उन्होंने सामने रखा है, उससे यह जरूर संकेत मिलता है कि वह अपनी भूमिका को लेकर नेतृत्व का स्पष्ट आकलन चाहते हैं।
ये रही पोस्ट
“लुढ़कते-लुढ़कते, घिसते-घिसते, शून्य में मिल सकता हूँ, लेकिन टूट नहीं सकता हूँ!”
यह शाश्वत सत्य है कि पार्टी से #बड़ा कोई नहीं होता और नेतृत्व के प्रति आस्था लोकतंत्र को शक्ति देती है. मैंने हमेशा पार्टी को बड़ा माना और नेतृत्व के प्रति अटूट आस्था रखी. वर्ष 2002 और वर्ष 2012 से और कठिन मेरी कोई परीक्षा नहीं हो सकती थी और उस परीक्षा में भी मैं अटूट रूप से पार्टी के साथ खड़ा रहा और उसके झंडे को ऊंचा उठाए रखा. और पार्टी ने निश्चय ही उसका मुझे पुरस्कार भी दिया— केंद्रीय मंत्री बनाया, मुख्यमंत्री बनाया.
हमारा लक्ष्य पार्टी हित होना #चाहिए. और मैं अपने कलमी भाइयों और राजनीतिक दोस्तों को स्पष्ट बता देना चाहता हूँ कि जिस क्षण हरीश रावत को लगेगा कि मैं पार्टी के लिए भार हो रहा हूँ, या मुझसे कहा जाएगा कि आप घर बैठिए, मैं बिना पलक झपकाए आदेश का #पालन करूँगा. मगर किसी को तो सही आकलन करना पड़ेगा. ऐसा न हो, मैं #अपने आप कोई फैसला लूं और कल मेरे कुछ दोस्तों को यह लिखना पड़े कि हरीश रावत के इस फैसले ने पार्टी की संभावनाओं को #कमजोर किया है.
एक बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का और आम जन का समर्थन आज भी मेरे साथ अविचल खड़ा है. अब तो चुनावी हारों का रहस्य भी सामने आने लग गया है, तो खुलकर के मतदाता अपनी बात कह रहा है. मैं कुछ दिन पहले लालकुआं और किच्छा क्षेत्र में गया था. दोनों जगहों पर जो लोग भी मुझे मिले, बोले— ‘साहब, हमें तो आश्चर्य है कि आप हारे कैसे?’
आप लोग जानते हैं, मैं विशुद्ध रूप से उत्तराखंडी,गढ़वाली और कुमाऊंनी हूं। लुढ़कते-लुढ़कते, घिसते-घिसते, शून्य में मिल सकता हूँ, लेकिन टूट नहीं सकता हूँ. भाजपा ने मेरे पीछे यूं ही #सीबीआई और ईडी नहीं लगाई. राज्य के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को और यहाँ तक कि अब तो पार्टियों के अध्यक्षों को भी #सुविधाएं दी जा रही हैं, हरीश रावत को कोई #सुविधा नहीं दी जा रही. क्या यह बताने के लिए स्पष्ट नहीं है कि भाजपा आज भी इस ढलती उम्र में भी मुझे अपना #प्रतिद्वंद्वी मान रही है? चार-चार पेज भाजपा ने मुझको समर्पित कर रखे हैं ट्रोल करने के लिए, छवि #बिगाड़ने के लिए. और कोई है ऐसा जिसकी छवि बिगाड़ने के लिए भाजपा इतना प्रयास कर रही है उत्तराखंड में?
राजनीति में प्रतिस्पर्धाएं होती हैं. मुझे गहरा दुःख है कि जिनसे मेरी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, क्योंकि मैं उस समझ से ऊपर चला गया हूँ, वे मेरे साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए दौड़ लगा रहे हैं और कभी #लंगड़ी लगाना चाहते हैं, कभी कुर्ता खींचना चाहते हैं. मैं सबके लिए एक पूरक हूँ और यदि इस पूरक का इस्तेमाल करना चाहें तो मैं वहाँ #उपस्थित हूँ, मगर इस्तेमाल तो जिनके पास #हथियार हैं, उनको तय करना है. मैं हाजिर हूँ, मगर तय उनको करना है कि मेरा उपयोग करना है या नहीं करना है ?