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बागेश्वर की बेटी प्रेमा रावत ने रचा नया इतिहास, एयरफोर्स के मैदान से भारतीय क्रिकेट टीम तक पहुंची कहानी
बागेश्वर की बेटी प्रेमा रावत ने रचा नया इतिहास, एयरफोर्स के मैदान से भारतीय क्रिकेट टीम तक पहुंची कहानी
बागेश्वर। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र के छोटे से गांव सुमटी-बैसानी से निकलकर भारतीय महिला क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंची प्रेमा रावत की कहानी आज पहाड़ की बेटियों के लिए मिसाल बन गई है। बागेश्वर की इस बेटी ने पहले उत्तराखंड महिला क्रिकेट टीम में अपनी पहचान बनाई, फिर रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) की ओर से महिला प्रीमियर लीग में खेलते हुए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह मजबूत की और अब भारतीय महिला क्रिकेट टीम का हिस्सा बनकर देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।
सुमटी गांव से शुरू हुआ क्रिकेट का सफर
प्रेमा रावत मूल रूप से बागेश्वर जिले के कपकोट क्षेत्र के सुमटी गांव की रहने वाली हैं। बचपन में गांव में भाइयों के साथ क्रिकेट खेलते-खेलते उनके भीतर इस खेल के प्रति जुनून पैदा हुआ। प्राथमिक शिक्षा के शुरुआती वर्षों के बाद परिवार के साथ बरेली चली गईं, जहां उनके क्रिकेट करियर को नई दिशा मिली।
प्रेमा के पिता केदार सिंह रावत भारतीय वायुसेना में सेवारत हैं। पिता की तैनाती के कारण परिवार बरेली में रहा और यहीं प्रेमा को एयरफोर्स स्टेशन के खेल मैदान में क्रिकेट खेलने का अवसर मिला। यही मैदान उनके सपनों की शुरुआती प्रयोगशाला बना। साधारण खेल मैदान से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर भारतीय क्रिकेट के बड़े मंच तक पहुंच गया।
एयरफोर्स स्टेशन बरेली के मैदान से टीम इंडिया तक
प्रेमा की कहानी की खास बात उनका भारतीय वायुसेना से जुड़ा रिश्ता भी है। उनके पिता वायुसेना में हैं और प्रेमा ने क्रिकेट की शुरुआती ट्रेनिंग एयरफोर्स स्टेशन बरेली के खेल मैदान में हासिल की। वहां से शुरू हुआ उनका सफर धीरे-धीरे घरेलू क्रिकेट की प्रतिस्पर्धाओं तक पहुंचा।
उत्तराखंड की महिला क्रिकेट टीम में जगह बनाने के बाद प्रेमा ने अपनी लेग स्पिन और उपयोगी बल्लेबाजी से पहचान बनाई। वह उत्तराखंड के लिए खेलने वाली शुरुआती प्रमुख महिला क्रिकेटरों में शामिल रहीं और बाद में इंडिया ए तक पहुंचीं।
आरसीबी ने पहचानी प्रतिभा
घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छे प्रदर्शन का परिणाम यह रहा कि प्रेमा रावत को महिला प्रीमियर लीग में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु ने अपनी टीम में शामिल किया। आरसीबी ने उन्हें 2025 की नीलामी में 1.20 करोड़ रुपये में खरीदा था। इसके साथ ही वह उत्तराखंड की उन क्रिकेट प्रतिभाओं में शामिल हो गईं, जिन्हें देश की सबसे चर्चित महिला टी-20 लीग में खेलने का अवसर मिला। �
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आरसीबी के मंच ने प्रेमा को बड़े खिलाड़ियों के साथ ड्रेसिंग रूम साझा करने और उच्च स्तर की प्रतिस्पर्धा का अनुभव दिया। इसके बाद उनके प्रदर्शन और अनुभव का असर इंडिया ए के स्तर पर भी दिखाई दिया।
एशिया कप से विश्व कप तक बढ़े कदम
प्रेमा ने वुमेंस एशिया कप राइजिंग स्टार्स में इंडिया ए की विजेता टीम का हिस्सा रहते हुए पांच मैचों में आठ विकेट हासिल किए थे। इसके बाद 2026 में उन्हें भारतीय महिला टीम के एशिया कप दल में भी शामिल किया गया।
भारतीय क्रिकेट में उनके बढ़ते कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चोट के कारण श्रेयंका पाटिल के बाहर होने के बाद बीसीसीआई ने प्रेमा को भारतीय महिला टी-20 विश्व कप टीम में शामिल किया। बीसीसीआई के अनुसार इससे पहले वह ऑस्ट्रेलिया दौरे पर इंडिया ए के लिए भी प्रभावी प्रदर्शन कर चुकी थीं।
बागेश्वर के लिए गर्व का पल
प्रेमा की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि बागेश्वर और पूरे उत्तराखंड के लिए भी गौरव का विषय है। पहाड़ के एक छोटे से गांव से निकलकर देश की महिला क्रिकेट टीम तक पहुंचना बताता है कि प्रतिभा को अवसर और मेहनत का साथ मिल जाए तो भौगोलिक सीमाएं रास्ते की बाधा नहीं बनतीं।
बागेश्वर की प्रेमा रावत की कहानी में एक खास संदेश भी छिपा है—सुमटी गांव की पगडंडियों से शुरू हुआ सपना बरेली के एयरफोर्स मैदान से होते हुए भारतीय क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच सकता है।
वायुसेना ने भी किया सम्मानित
प्रेमा की उपलब्धियों को भारतीय वायुसेना ने भी सम्मान दिया। एयर चीफ मार्शल एपी सिंह, चीफ ऑफ एयर स्टाफ, ने उन्हें क्रिकेट में उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया। उनके पिता के भारतीय वायुसेना में सेवारत होने और प्रेमा के एयरफोर्स स्टेशन बरेली के मैदान से क्रिकेट की शुरुआत करने के कारण यह सम्मान उनके सफर को एक अलग पहचान देता है।
आज प्रेमा रावत के नाम के साथ तीन पहचानें एक साथ जुड़ चुकी हैं—बागेश्वर की बेटी, भारतीय वायुसेना से जुड़ा परिवार और भारतीय महिला क्रिकेट की उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी। गांव के मैदान से शुरू हुआ उनका सफर अब देश के सबसे बड़े क्रिकेट मंचों तक पहुंच चुका है।

