उत्तराखण्ड
स्टार कहां हैं….कांग्रेस में ‘स्टार’ की कमी या भरोसे की? तमिलनाडु में उत्तराखंड के नेताओं को नहीं मिली एंट्री!
कांग्रेस में ‘स्टार’ की कमी या भरोसे की? तमिलनाडु में उत्तराखंड के नेताओं को नहीं मिली एंट्री!
देहरादून। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने जैसे ही तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए 40 स्टार प्रचारकों की सूची जारी की, उत्तराखंड कांग्रेस में सन्नाटा और सवाल दोनों एक साथ पसर गए। सूची में मंगलौर से विधायक और राष्ट्रीय सचिव काजी निजामुद्दीन का नाम जरूर चमका, लेकिन बाकी नेता मानो “स्टार” की परिभाषा से ही बाहर कर दिए गए।
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प्रदेश के गलियारों में अब चर्चा यह है कि आखिर इतने “काबिल” और “अनुभवी” नेताओं के होते हुए भी तमिलनाडु जैसे बड़े चुनाव में किसी और को जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई? क्या पार्टी को डर था कि कहीं ज्यादा स्टार पहुंच गए तो मंच छोटा पड़ जाएगा, या फिर यह मान लिया गया कि उत्तराखंड के नेताओं की चमक दक्षिण की धूप में फीकी पड़ सकती है?
सूत्र बताते हैं कि कुछ नेता तो अपने-अपने स्तर पर “तैयारी” भी कर रहे थे—कोई तमिल सीखने की कोशिश में था, तो कोई दक्षिण भारतीय खाने के नाम याद कर रहा था। लेकिन सूची आते ही उनकी सारी मेहनत “इडली-सांभर” के साथ ठंडी पड़ गई।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह फैसला कहीं न कहीं पार्टी के अंदर “चयन की सख्ती” को भी दिखाता है, जहां स्टार प्रचारक बनने के लिए अब सिर्फ अनुभव नहीं, बल्कि “हाईकमान की नजर” में होना जरूरी है।
अब उत्तराखंड के बाकी नेता अपने-अपने क्षेत्रों में ही “स्थानीय स्टार” बनकर संतोष कर रहे हैं, जबकि तमिलनाडु की चुनावी पिच पर सिर्फ एक ही “उत्तराखंडी सितारा” उतारा गया है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस के पास नेता तो बहुत हैं, लेकिन तमिलनाडु के लिए “स्टारडम” फिलहाल सीमित एडिशन में ही जारी किया गया है—और बाकी नेता अब अगली सूची का इंतजार कर रहे हैं, शायद तब तक वे तमिल भी धाराप्रवाह बोलने लगें!
कुल मिलाकर कांग्रेस हाई कमान ने एक तरह से उत्तराखंड के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं की इस मुद्दे पर अनदेखी ही की है। उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, नेता प्रतिपक्ष और पूर्व कैबिनेट मंत्रीयशपाल आर्य, कहीं पूर्व मुख्यमंत्री पूर्व कैबिनेट मंत्री और पूर्व सांसद स्टार प्रचारक की भूमिका रखते हैं। मगर कांग्रेस हाई कमान का केवल एक नेता को बुलाया जाना कहीं ना कहीं हास्यास्पद लगता है। जाहिर है ऐसे निर्णय का असर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ता ही है वह भी तब जब कि अगले साल यहां विधानसभा का चुनाव प्रस्तावित है।
