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भाजपा का मास्टर स्ट्रोक: दिनेश आर्य के जरिए साधा दलित सियासत का समीकरण, राज्यसभा टिकट से भाजपा ने कांग्रेस के ‘यज्ञ’ वाले नैरेटिव की काट निकाली, दलित चेहरे को दिया बड़ा सम्मान

 

 

भाजपा का मास्टर स्ट्रोक: दिनेश आर्य के जरिए साधा दलित सियासत का समीकरण, राज्यसभा टिकट से भाजपा ने कांग्रेस के ‘यज्ञ’ वाले नैरेटिव की काट निकाली, दलित चेहरे को दिया बड़ा सम्मान

 

हल्द्वानी। उत्तराखंड की राजनीति में भाजपा ने राज्यसभा के लिए दिनेश आर्य के नाम पर दांव खेलकर एक ऐसा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है, जिसे आने वाले दिनों की सियासत के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। खास तौर पर हल्द्वानी में कांग्रेस की सभा के बाद उठे यज्ञ विवाद के बीच भाजपा का यह फैसला महज राज्यसभा का टिकट नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

 

कुछ दिन पहले हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस की बड़ी सभा हुई थी, जिसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी पहुंचे थे। सभा के बाद रामलीला मैदान में कथित तौर पर काफी गंदगी रह जाने के बाद वहां हवन-यज्ञ किए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। कांग्रेस ने इस यज्ञ को दलित समाज के अपमान से जोड़ते हुए इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की। दूसरी ओर भाजपा की ओर से यह तर्क दिया गया कि यज्ञ का उद्देश्य मैदान की शुद्धि था और इसमें दलित समाज के लोगों की भागीदारी भी रही।

 

विवाद का राजनीतिक असर बढ़ने से पहले ही भाजपा ने राज्यसभा के लिए दिनेश आर्य को प्रत्याशी बनाकर सियासी तस्वीर का एक नया पक्ष सामने रख दिया है। दिनेश आर्य लंबे समय से भाजपा से जुड़े कार्यकर्ता रहे हैं और वर्तमान में उत्तराखंड सरकार में दायित्वधारी की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं। ऐसे में उन्हें राज्यसभा के लिए आगे करना भाजपा के संगठन और सरकार दोनों की ओर से दलित समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का स्पष्ट संदेश माना जा रहा है।

 

यज्ञ विवाद के बीच बदला नैरेटिव

 

राजनीति में किसी मुद्दे का असर केवल आरोप से नहीं, बल्कि उसके जवाब में उठाए गए कदम से भी तय होता है। कांग्रेस जिस यज्ञ को दलित अस्मिता के सवाल से जोड़कर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रही थी, उसी दौर में भाजपा ने दलित समाज से आने वाले एक प्रमुख चेहरे को देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक संस्था संसद के उच्च सदन में भेजने का निर्णय लिया है।

 

यही वजह है कि भाजपा के इस फैसले को पार्टी के भीतर ‘मास्टर स्ट्रोक’ के तौर पर देखा जा रहा है। संदेश साफ है—एक तरफ भाजपा पर दलित विरोधी होने के आरोप लगाए जा रहे थे, तो दूसरी तरफ पार्टी ने राज्यसभा के लिए दलित चेहरे पर भरोसा जताया।

 

धामी की रणनीति को भी माना जा रहा अहम

 

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए भी दिनेश आर्य का राज्यसभा प्रत्याशी बनना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। भाजपा संगठन जहां बूथ स्तर तक अपनी तैयारियों को मजबूत करने में जुटा है, वहीं सामाजिक समीकरणों को साधना भी पार्टी की रणनीति का अहम हिस्सा है।

 

दिनेश आर्य को राज्यसभा का टिकट देकर भाजपा ने एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है—कार्यकर्ताओं के सम्मान का, दलित प्रतिनिधित्व का और संगठन में लंबे समय से सक्रिय चेहरों को आगे बढ़ाने का।

 

कांग्रेस के लिए भी बढ़ी चुनौती

 

राजनीतिक तौर पर देखें तो भाजपा का यह फैसला कांग्रेस के लिए भी चुनौती पैदा कर सकता है। कांग्रेस ने रामलीला मैदान के यज्ञ को जिस राजनीतिक नैरेटिव में रखने की कोशिश की थी, उसके समानांतर भाजपा अब दिनेश आर्य को दलित प्रतिनिधित्व के चेहरे के रूप में सामने रख सकती है।

 

यानी जिस मुद्दे को कांग्रेस भाजपा के खिलाफ हथियार बनाने की कोशिश कर रही थी, भाजपा ने उसी राजनीतिक बहस की दिशा बदलने के लिए राज्यसभा के टिकट का इस्तेमाल कर दिया है। यही वजह है कि दिनेश आर्य की उम्मीदवारी को केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक पदोन्नति के बजाय उत्तराखंड की आने वाली चुनावी राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

 

राजनीतिक संदेश के स्तर पर भाजपा का दांव कितना असरदार साबित होगा, यह आने वाले समय में साफ होगा, लेकिन फिलहाल दिनेश आर्य को राज्यसभा का टिकट देकर पार्टी ने कांग्रेस के सामने एक नया राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।

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