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बड़ी खबर : राजनीति में संन्यास से हरीश रावत का किनारा, गंगोत्री और धराली से शुरू करेंगे अपनी नई यात्रा, 2027 विधानसभा चुनाव देखते हुए रावत का बड़ा पॉलीटिकल एक्शन… विरोधियों को चेताया
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का यह वक्तव्य सिर्फ एक निजी स्पष्टीकरण नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक आत्ममंथन का सार्वजनिक दस्तावेज़ बनकर सामने आता है। “अर्जित अवकाश” जैसे व्यक्तिगत निर्णय से शुरू हुई बात अचानक उस बड़े सवाल पर आ टिकती है, जिससे वे वर्षों से जूझ रहे हैं—लगातार चुनावी पराजय का कारण क्या है?
रावत अपने बयान में जिस पीड़ा को व्यक्त करते हैं, वह केवल व्यक्तिगत हार की नहीं, बल्कि एक वैचारिक पराजय की भी झलक देती है। उन्होंने “उत्तराखंडियत” बनाम भारतीय जनता पार्टी के “हिंदुत्व आधारित राष्ट्रवाद” की जो बहस खड़ी करने की कोशिश की, वह जमीन पर उतनी प्रभावी नहीं हो सकी। उनका यह स्वीकारना कि “लोगों को हमारा नैरेटिव क्यों पसंद नहीं आया”, सीधे-सीधे जनादेश की दिशा पर सवाल उठाता है।
यहां एक अहम राजनीतिक संकेत भी छिपा है—रावत यह मानने को तैयार दिखते हैं कि चुनाव केवल संगठन या नेतृत्व के भरोसे नहीं, बल्कि जनता की भावनात्मक और वैचारिक स्वीकृति से जीते जाते हैं। “सामूहिक नेतृत्व” की बात कहकर वे जिम्मेदारी को साझा जरूर बताते हैं, लेकिन सवालों का केंद्र खुद पर आने से उनकी असहजता भी साफ झलकती है।
उनका आगामी “जन संवाद” और भ्रमण कार्यक्रम—उत्तरकाशी से लेकर थराली और हरिद्वार तक—दरअसल राजनीतिक पुनर्स्थापन (political repositioning) की एक रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। आपदा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर 2014-15 के अपने कार्यकाल की तुलना वर्तमान स्थिति से कराने की बात, सीधे तौर पर अपने शासनकाल को फिर से प्रासंगिक बनाने की कोशिश है।
लेकिन असली चुनौती वही है, जिसे रावत खुद शब्द देते हैं—क्या “उत्तराखंडियत” का नैरेटिव आज के मतदाता के लिए उतना आकर्षक है, जितना वे मानते रहे? या फिर राज्य की राजनीति अब राष्ट्रीय विमर्श के प्रभाव में पूरी तरह ढल चुकी है?
यह बयान एक तरह से राजनीतिक संन्यास की अटकलों का खंडन भी है और एक नई शुरुआत का संकेत भी। रावत फिलहाल पीछे हटने के मूड में नहीं हैं; बल्कि वे यह जानने के लिए मैदान में उतरना चाहते हैं कि आखिर उनकी राजनीति और जनता के बीच दूरी कहां पैदा हो गई।
संक्षेप में, यह केवल एक नेता की सफाई नहीं, बल्कि उस पूरी राजनीति का आत्मनिरीक्षण है, जो स्थानीय अस्मिता बनाम राष्ट्रीय विचारधारा के बीच अपनी जगह तलाश रही है।
यहां पड़े हरीश रावत की पोस्ट हूं बहू
मेरा अर्जित अवकाश एक बहुत अति सामान्य, छोटा सा व्यक्तिगत निर्णय था। मैंने अपने उद्वेलित मन की शांति के लिए यह निर्णय लिया था। कुछ बयान आए, कुछ टिप्पणियां हुईं, कुछ चर्चाएं भी हुईं, मुझ पर सवाल भी दागे गए। उसके आलोक में एक बड़ा प्रश्न उभर कर आया कि 2017 में, जो चुनाव मेरे मुख्यमंत्री रहते हुआ था, वह चुनाव हम क्यों हारे? 2022 के विधानसभा चुनाव में मैं कैंपेन कमेटी का चेयरमैन था, हम चुनाव क्यों हारे? सामान्यतः यह चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ा गया चुनाव था, मगर प्रश्न आज केवल मुझसे ही पूछा जा रहा है! प्रश्न ये भी पूछे जा रहे हैं कि मैं क्यों हारा? यह सब प्रश्न इस अदृश्य सुझाव के साथ पूछे जा रहे हैं कि क्यों नहीं अब मैं राजनीति से अलग हो जाऊं?
एक महति प्रश्न मेरे मन में भी उठ रहा है, जिसका समाधान उत्तराखंड के भाई-बहन ही कर सकते हैं। मैंने बहुत सोच-समझकर, व्यापक अध्ययन आधारित परामर्श के बाद भारतीय जनता पार्टी के हिंदुत्व आधारित राष्ट्रवाद, जिसकी शक्ति लोगों को बांटने में थी, उसके मुकाबले के लिए स्थानीयता अर्थात स्थानीय संस्कृति, भाषा-बोली, पहनावे, व्यंजन, हस्त-शिल्प और परिवेशी उत्पादन आधारित समन्वयवादी राष्ट्रवाद की बात की, जिसको हम बहुधा उत्तराखंडियत कहते हैं। हम लगातार एक के बाद एक चुनाव क्यों हारे? मैं इस सोच का अग्रगणीय संदेश वाहक था, मैं क्यों लगातार हारा? लोगों को हमारा नैरेटिव क्यों पसंद नहीं आया?
राज्य उत्तराखंड और उत्तराखंडियत का ध्वजवाहक हार जाए, तो यह एक बड़ा प्रश्न है, जिसका उत्तर जनता-जनार्दन से ही आ सकता है। मैं इस उत्तर की खोज में व्यापक भ्रमण करूंगा, जो छोटे-छोटे टुकड़ों में होगा। मैं इसे 15 अप्रैल, 2026 को जनपद उत्तरकाशी के गंगोत्री राजमार्ग और धराली की वस्तु-स्थिति के अध्ययन के साथ प्रारंभ करना चाहता हूं।
20 अप्रैल 2026 के बाद मैं थराली और कनलगढ़ घाटी के आपदा पीड़ितों के मध्य भी जाऊंगा। उनसे यह जानने का प्रयास करूंगा कि हमने वर्ष 2014-15 में आपदा के दौरान पुनर्निर्माण और पुनर्वास के जो काम किए थे, आप उसकी तुलना में आज अपने आप को कहां पर पाते हैं?
इसी दौरान मैं अपने गांव मोहनरी में ग्वेल देवता और ईष्ट देवता की शरण में भी जाऊंगा और 27 अप्रैल को अपने गांव में रहूंगा। इसके बाद मैं अपने कर्मक्षेत्र हरिद्वार का भी भ्रमण करूंगा।