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अपराध

निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत, दो दशक पुराने मामले की कहानी फिर चर्चा में

निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत, दो दशक पुराने मामले की कहानी फिर चर्चा में

हरिद्वार। करीब दो दशक पहले नोएडा के निठारी में बच्चों और महिलाओं के रहस्यमय ढंग से गायब होने और बाद में मानव कंकाल मिलने से पूरे देश को झकझोर देने वाला निठारी कांड एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार वजह है इस मामले के प्रमुख आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत। शुक्रवार को भूपतवाला क्षेत्र में उसकी चाय की दुकान के भीतर उसका शव फंदे से लटका मिला। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मौके से किसी सुसाइड नोट के मिलने की सूचना नहीं है और पुलिस मामले की जांच कर रही है।

 

 

चाय बेचकर जिंदगी शुरू करने की कोशिश

रिपोर्टों के मुताबिक निठारी कांड से जुड़े मुकदमों में आखिरकार अदालतों से बरी होने के बाद सुरेंद्र कोली कुछ समय से हरिद्वार में रह रहा था। वह भूपतवाला और सप्त सरोवर रोड क्षेत्र में चाय की दुकान चला रहा था। स्थानीय स्तर पर वह सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करता दिखाई दे रहा था। शुक्रवार को इसी चाय की दुकान के भीतर उसका शव मिलने से आसपास के लोग भी सकते में आ गए। पुलिस ने शव की पहचान सुरेंद्र कोली के रूप में की और उसके अल्मोड़ा निवासी परिजनों को सूचना दी।

 

 

लेकिन सुरेंद्र कोली का नाम देश के सामने पहली बार हरिद्वार की इस घटना के कारण नहीं आया था। करीब 20 साल पहले नोएडा का निठारी कांड उसके नाम के साथ जुड़ गया था और इसके बाद शुरू हुई लंबी कानूनी प्रक्रिया ने एक समय उसे मौत की सजा पाने वाला आरोपी बना दिया था।

 

 

निठारी में आखिर हुआ क्या था?

निठारी उत्तर प्रदेश के नोएडा क्षेत्र का एक गांव है। वर्ष 2005-06 के दौरान यहां से कई बच्चे और महिलाएं अचानक लापता होने लगे। उनके परिवार पुलिस के पास पहुंचते रहे। दिसंबर 2006 में यह मामला तब राष्ट्रीय स्तर पर सामने आया, जब सेक्टर-31 स्थित डी-5 मकान के पीछे नाले और आसपास से मानव खोपड़ियां और हड्डियों के अवशेष बरामद होने लगे।

डी-5 मकान कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर का था और सुरेंद्र कोली वहां घरेलू सहायक के तौर पर काम करता था। दोनों को दिसंबर 2006 में गिरफ्तार किया गया। शुरुआती पुलिस जांच के बाद मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। संसद में 2007 में दिए गए सरकारी जवाब के अनुसार सीबीआई ने निठारी से जुड़े 19 मामलों की जांच संभाली थी, जिनमें 11 बच्चों और सात महिलाओं/लड़कियों के लापता होने की जानकारी उस समय सामने आई थी।

 

 

 

सीबीआई ने 19 मामलों में से 16 में आरोपपत्र दाखिल किए। अभियोजन का आरोप था कि कोली आसपास के बच्चों और महिलाओं को डी-5 मकान तक ले जाता था और वहां अपराध किए जाते थे। जांच के दौरान कोली के कथित कबूलनामे और मकान के पीछे से मिले अवशेषों को अभियोजन ने अपने मामले का महत्वपूर्ण आधार बनाया।

 

 

 

एक के बाद एक मौत की सजा

निठारी मामले में विशेष सीबीआई अदालत में लंबे समय तक सुनवाई चली। सुरेंद्र कोली को अलग-अलग मामलों में हत्या समेत कई गंभीर धाराओं में दोषी ठहराया गया और कई मामलों में उसे मौत की सजा सुनाई गई। मोनिंदर सिंह पंढेर को भी कुछ मामलों में दोषी ठहराया गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जैसे-जैसे मामले ऊंची अदालतों में पहुंचे, अभियोजन के सबूतों और जांच की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे।

हाईकोर्ट में बदली तस्वीर

अक्टूबर 2023 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुरेंद्र कोली को 12 मामलों में और मोनिंदर सिंह पंढेर को उसके खिलाफ चल रहे दो मामलों में बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने अभियोजन के प्रमुख साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। खास तौर पर कोली के कथित कबूलनामे और हड्डियों की बरामदगी की परिस्थितियों को लेकर अदालत ने जांच की प्रक्रिया में गंभीर कमियां बताईं।

 

 

 

अदालत के सामने यह सवाल भी था कि पुलिस हिरासत में लंबे समय तक रहने के दौरान दिए गए कथित कबूलनामे को कितना स्वैच्छिक और विश्वसनीय माना जा सकता है। बरामदगी को लेकर भी यह मुद्दा उठा कि जिस स्थान से अवशेष मिले, वह ऐसा स्थान नहीं था जिस पर केवल कोली का नियंत्रण हो।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

हाईकोर्ट के फैसले को उत्तर प्रदेश सरकार, सीबीआई और कुछ पीड़ित परिवारों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा कोली और पंढेर की बरी किए जाने की स्थिति को बरकरार रखा।

 

 

 

हालांकि उस समय कोली एक मामले में अभी भी दोषसिद्ध था। यह मामला रिम्पा हलदर हत्याकांड से जुड़ा था। दिलचस्प कानूनी स्थिति यह थी कि जिन सबूतों—विशेषकर कथित कबूलनामे और बरामदगी—के आधार पर कई दूसरे मामलों में कोली को बरी किया जा चुका था, उन्हीं आधारों से जुड़े एक मामले में उसकी सजा कायम थी।

इसके बाद कोली ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका दाखिल की।

नवंबर 2025 में खत्म हुआ कानूनी अध्याय

11 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने क्यूरेटिव याचिका स्वीकार करते हुए सुरेंद्र कोली को अंतिम मामले में भी बरी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ही तरह के साक्ष्य के आधार पर परस्पर विरोधी नतीजे कायम नहीं रह सकते और मामले में न्याय की गंभीर त्रुटि को दूर करना जरूरी था। इसके साथ ही कोली की उस मामले में भी दोषसिद्धि समाप्त हो गई और वह सभी 13 संबंधित मामलों में कानूनी रूप से बरी हो गया।

 

 

 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में यह भी दर्ज है कि 2023 में हाईकोर्ट ने 12 मामलों में कोली को बरी किया था और जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उन बरी किए जाने के फैसलों को बरकरार रखा था। अंतिम मामले में क्यूरेटिव याचिका के बाद उसे राहत मिली।

 

 

इस तरह जिस व्यक्ति को कभी निठारी हत्याकांड का मुख्य आरोपी बताते हुए मौत की सजा सुनाई गई थी, वही व्यक्ति करीब दो दशक बाद सभी संबंधित मामलों में अदालत से बरी होकर जेल से बाहर आया।

अब हरिद्वार में मौत ने फिर खड़े किए सवाल

कानूनी तौर पर सभी संबंधित मामलों में बरी होने के करीब एक साल बाद सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में मौत ने निठारी कांड को फिर राष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। पुलिस के मुताबिक प्रथम दृष्टया मामला आत्महत्या का प्रतीत हो रहा है, लेकिन पोस्टमार्टम और जांच के बाद ही मौत की परिस्थितियों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। मौके से सुसाइड नोट नहीं मिलने की बात भी सामने आई है।

 

 

 

निठारी कांड की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि एक तरफ शुरुआती दौर में बरामद मानव अवशेषों और गंभीर आरोपों ने पूरे देश को झकझोर दिया, वहीं वर्षों बाद अदालतों में अभियोजन के साक्ष्यों और जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए और अंततः सुरेंद्र कोली सभी संबंधित मामलों में बरी हो गया। सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले ने भी इसी विरोधाभास को दूर करने के लिए अंतिम मामले में राहत दी थी।

 

 

 

अब हरिद्वार में उसकी मौत के बाद निठारी कांड की पूरी कहानी एक बार फिर सामने है—2005-06 में लोगों के गायब होने से शुरू हुई दहशत, दिसंबर 2006 में मानव अवशेषों की बरामदगी, सीबीआई जांच, मौत की सजाएं, वर्षों की कानूनी लड़ाई, 2023 में हाईकोर्ट से राहत, 2025 में सुप्रीम कोर्ट से अंतिम बरी और 2026 में हरिद्वार में हुई मौत। यह करीब दो दशक लंबी उस कहानी का नया और अप्रत्याशित अध्याय है।

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