उत्तराखण्ड
ईडी छापे के बाद हरीश रावत ने खोला मोर्चा: बोले- “हमने लोग कमाए, पैसा नहीं”, तीन साल के पूरे कार्यकाल की जांच की चुनौती
“छिपा खजाना ढूंढना है तो मेरे यहां छापा मारो”… ईडी के बीच हरीश रावत ने खोल दिया अपना सियासी मोर्चा
हरीश रावत का पलटवार: “मेरे पूरे कार्यकाल की जांच कर लो, हमने लोग कमाए हैं पैसा नहीं”
ईडी छापे के बाद हरीश रावत की हुंकार—“तीन साल का हिसाब ले लो, मेरा सार्वजनिक जीवन खुली किताब है”
देहरादून। चंदन जीना के घर पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बाद उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जिस तरह खुलकर अपनी बात रखी है, वह महज सफाई नहीं बल्कि एक व्यापक राजनीतिक प्रतिवाद के रूप में सामने आई है। रावत ने एक ओर चंदन जीना से अपने दशकों पुराने संबंध और उनकी भूमिका को सामने रखा, वहीं दूसरी ओर अपने पूरे मुख्यमंत्री कार्यकाल की जांच के लिए ईडी, सीबीआई और अन्य जांच एजेंसियों को खुली चुनौती दी है। उनके बयान में व्यक्तिगत पीड़ा, राजनीतिक आक्रोश, अपने कार्यकाल का बचाव और समर्थकों से भावनात्मक अपील—चारों पहलू एक साथ दिखाई देते हैं।
रावत ने शुरुआत ही इस टिप्पणी से की कि “ये जो हालात हैं, ये सब तो सुधर जाएंगे। मगर इस दौर में कई लोग अपनी ही नज़रों से गिर जाएंगे।” इसके बाद उन्होंने चंदन जीना के घर ईडी की छापेमारी का संदर्भ लेते हुए कहा कि चंदन जीना सरकार के “एक छोटे से पुर्जे” थे और उनकी सरकार का घोषित निर्णय था कि पब्लिक सर्विस कमीशन, अधीनस्थ सेवा चयन आयोग और भर्ती बोर्डों से संपर्क की आवश्यकता होने पर बैठक मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव के स्तर पर ही हो।
उन्होंने कहा कि सरकार की तरफ से कोई बात, सुझाव या समस्या होने पर इन संस्थाओं को प्रमुख सचिव कार्मिक विभाग से संपर्क करने के लिए कहा जाता था। रावत के मुताबिक उनकी सरकार ने इन संस्थाओं की स्वायत्तता का हमेशा सम्मान किया।
“मेरे पूरे कार्यकाल को टटोलिए”
हरीश रावत ने ईडी, सीबीआई समेत सभी जांच एजेंसियों को अपने कार्यकाल की जांच करने की खुली चुनौती दी। उन्होंने कहा कि वह तीन साल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे और उनकी सरकार के समय पहले भी कई फैसलों की फाइलें जांची गई हैं। रावत ने कहा कि वह चाहते हैं कि एक बार फिर उनके कार्यकाल को खंगाला जाए और उनके “तथाकथित छिपे खजाने” को ढूंढने के लिए जहां छापा मारना है, वहां छापा मारा जाए।
उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान हुए स्टिंग और राष्ट्रपति शासन लागू होने की परिस्थितियों की भी गहराई से जांच की मांग की। साथ ही उन्होंने कहा कि जिन भी नेताओं की भूमिका रही है, चाहे वे राष्ट्रीय स्तर के हों या प्रांतीय स्तर के, उनकी भी जांच होनी चाहिए।
रावत ने कहा कि तकनीकी रूप से वह तीन साल मुख्यमंत्री रहे, लेकिन एक साल राष्ट्रपति शासन ने परिस्थितियों को प्रभावित किया। इसके बावजूद, उनके अनुसार, सत्ता से बाहर हुए दस साल बीत जाने के बाद भी उनके खिलाफ राजनीतिक अभियान जारी है।
उन्होंने अपने ऊपर लगातार होने वाले हमलों का जिक्र करते हुए कहा कि कभी “स्टिंगर”, कभी “स्टीकर” और कभी “सर्वर” के जरिए हरीश रावत पर प्रहार किए जाते हैं। उनके मुताबिक लोकतंत्र में जब तक कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में है, उस पर हमले होते रहेंगे, लेकिन कुछ हमले स्वस्थ तरीके से और कुछ अस्वस्थ तरीके से किए जाते हैं। कुछ लोग खुलकर सामने आते हैं, जबकि कुछ कानाफूसी और दुष्प्रचार के जरिए हमला करते हैं।
रावत ने यहां तक कहा कि उनके तीन साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल की जांच के लिए आयोग गठित कर देना चाहिए।
1991 से साथ हैं चंदन जीना, बोले- 24 घंटे काम करने वाले कर्मचारी थे।
चंदन जीना के साथ अपने संबंधों का उल्लेख करते हुए रावत ने कहा कि वह वर्ष 1991 से उनके साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह खुद बड़े-बड़े पदों पर रहे और उस दौर में स्टाफ भी ज्यादा नहीं हुआ करता था। ऐसे में चंदन जीना उनके लिए 24 घंटे काम करने वाले कर्मचारी रहे।
रावत ने दावा किया कि ऐसा कोई समय नहीं रहा, जब चंदन जीना को तनख्वाह न दी गई हो। उन्होंने चंदन जीना की विनम्रता, शिष्टता, सहनशीलता और हर व्यक्ति को सम्मान देने की आदत को अपनी राजनीति में सहायक बताया।
रावत ने कहा कि उनके कुछ साथी ऐसे भी रहे जिनके हाथ में भले ही ज्यादा ताकत न हो, लेकिन वे काफी “फूं-फा” करते थे। इसके विपरीत चंदन जीना हर व्यक्ति से हाथ जोड़कर कहते थे—“आइए, आइए बैठिए।”
बीमारी के दौरान आर्थिक मदद का भी किया जिक्र
रावत ने अपने स्वास्थ्य और बीमारी के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि जब वह इलाज के लिए दिल्ली आए और मेदांता में भर्ती थे, तब घर चलाने के लिए उन्होंने कई लोगों से मदद का आग्रह किया था। उन्होंने कहा कि स्टाफ का खर्च, डिफेंस कॉलोनी का किराया और बिजली आदि के खर्च भी थे।
रावत के अनुसार बीमारी के दौरान पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली समेत कई स्थानों से लोग उनके पास आए और इलाज के खर्च के लिए आर्थिक मदद करके गए।
उन्होंने बताया कि मेदांता से अस्थायी आवास पर आने के दिन उनके पास करीब 12 लाख रुपये थे और उस रकम को खातों आदि में समायोजित करने में समय लगता है।
रावत ने कहा कि लोगों ने उनकी मदद इसलिए की क्योंकि उन्होंने वर्षों तक लोगों की सेवा की और लोगों से रिश्ते बनाए। उन्होंने कहा कि उन्होंने कई चुनाव लड़े और बड़े-बड़े पदों पर रहे, लेकिन उनके पास कभी बहुत कुछ नहीं रहा, फिर भी कभी कोई कमी नहीं रही।
उनका कहना था कि लोगों ने दिल खोलकर उनकी मदद की, क्योंकि उन्होंने कभी किसी को राजनीतिक पद देने या कोई काम कराने के बदले “सर्विस चार्ज” के रूप में पैसा नहीं लिया।
“हमने लोग कमाए, पैसा नहीं कमाया”
रावत के बयान का सबसे राजनीतिक और भावनात्मक हिस्सा वह रहा, जिसमें उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की कमाई को धन के बजाय लोगों के रूप में परिभाषित किया।
उन्होंने कहा कि उनके भगवान और इष्ट देवता ने उन्हें जो अवसर दिया, उसका इस्तेमाल उन्होंने लोगों की मदद के लिए किया। रावत ने आरोप लगाया कि आज कुछ लोग यह प्रचार कर रहे हैं कि चंदन जीना के यहां मिला पैसा उनका है।
उन्होंने सवाल किया कि यदि वह इतने वर्षों तक इतने बड़े-बड़े पदों पर रहे तो क्या उनके पास एक-दो करोड़ रुपये भी नहीं हो सकते। इसके साथ ही उन्होंने अपने आयकर भुगतान का उल्लेख करते हुए कहा कि इस बार भी उन्होंने पांच लाख रुपये से अधिक का इनकम टैक्स भरा है।
रावत ने कहा कि फुसफुसाहट का अभियान चलाया जा रहा है कि वहां करोड़ों रुपये मिले और वह पैसा हरीश रावत का है। उन्होंने इसे चंदन जीना की वर्षों की कमाई और निष्ठा का अपमान बताया।
उनका कहना था कि जिसने इतने वर्षों तक निष्ठा के साथ उनके साथ काम किया और जनसेवा की, उसकी कमाई का अपमान क्यों किया जा रहा है।
रावत ने कहा कि जो लोग इस तरह की फुसफुसाहट कर रहे हैं, उन्हें उनके चाहने वालों और उत्तराखंड के प्रबुद्ध जनमानस को जवाब देना चाहिए। उन्होंने अपने समर्थकों से अपील की कि वे ऐसे लोगों को मुंहतोड़ जवाब देने के अभियान का नेतृत्व करें।
उन्होंने कहा—“मेरा सार्वजनिक जीवन एक खुली किताब है। हमने लोग कमाए, हमने पैसा नहीं कमाया।”
रावत ने कहा कि अब वह तिनका-तिनका जोड़कर और लोगों की मदद लेकर अपने आगे के जीवन को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उनके साथ इस तरह की “ओछी हरकतें” की जा रही हैं।
60 साल के सार्वजनिक जीवन पर दाग लगाने का आरोप
पूर्व मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड के लोगों से भावनात्मक अपील भी की। उन्होंने कहा कि सांसद बनने के दिन से आज तक उन्होंने लगातार उत्तराखंड की बात की है। जहां अवसर मिला, वहां उन्होंने लोगों के दुख-दर्द और समस्याओं को उठाया।
उन्होंने कहा कि उन्होंने पहाड़ की बात की, उत्तराखंड की बात की और हरिद्वार की बात की। ऐसे में जिस तरीके से उन्हें लांछित करने की कोशिश की जा रही है, उससे उनके करीब 60 साल के सामाजिक जीवन पर धब्बा लगाने का प्रयास हो रहा है।
रावत ने कहा कि यदि उत्तराखंड के लोग उनकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएंगे तो कौन आएगा। उन्होंने भावनात्मक अंदाज में कहा कि अगर जनता नहीं आएगी तो उत्तराखंड के देवी-देवता उनकी रक्षा करेंगे।
भर्ती घोटालों पर भी रखी अपनी स्थिति
अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल का बचाव करते हुए रावत ने सरकारी नियुक्तियों का आंकड़ा भी सामने रखा। उन्होंने दावा किया कि उनके तीन वर्ष के कार्यकाल में 42 हजार से ज्यादा अभ्यर्थियों को नौकरी मिली, जबकि 18 हजार पदों की भर्ती का अधियाचन जारी करके वह गए थे।
उन्होंने कहा कि दस साल से लोग और व्यवस्था उनके रिकॉर्ड तक पहुंचने के लिए “हांप” रही है।
रावत ने कहा कि उनकी सरकार ने ही अधीनस्थ सेवा चयन आयोग, शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और मेडिकल भर्ती बोर्ड का गठन किया था। उनके अनुसार तीन साल के भीतर दो बार लोक सेवा आयोग की भर्तियां कराई गईं और तीसरी बार के लिए भी तैयारियां शुरू कर दी गई थीं।
अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति को बताया अपनी चूक
हालांकि रावत ने अपने कार्यकाल की एक चूक को स्वीकार भी किया। उन्होंने कहा कि काम करते हुए कभी-कभी चूक हो जाती है और उनसे भी एक गलती हुई थी।
रावत के अनुसार उन्होंने अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष पद पर जिस व्यक्ति की नियुक्ति की थी, वह उस पद की गरिमा का सम्मान नहीं रख सके। उन्होंने कहा कि उनकी ही सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था।
उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति शासन हटने के बाद परिणाम घोषित करने से संबंधित विभाग को रोका गया और परीक्षा निरस्त करने के लिए तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई गई।
रावत ने कहा कि नियुक्ति को लेकर हुई इस चूक के लिए वह पहले भी क्षमा मांग चुके हैं और एक बार फिर क्षमा मांग रहे हैं।
अब मामला सिर्फ ईडी कार्रवाई का नहीं, राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई का
हरीश रावत का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने ईडी की कार्रवाई को केवल चंदन जीना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे अपने पूरे राजनीतिक जीवन और मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल से जोड़ दिया है।
उनकी रणनीति साफ दिखाई देती है—एक तरफ वह चंदन जीना के साथ अपने पुराने संबंधों को सामने रखकर उनके खिलाफ चल रही चर्चाओं का जवाब दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ अपने कार्यकाल की किसी भी अनियमितता की जांच के लिए खुद को उपलब्ध बताते हुए राजनीतिक चुनौती पेश कर रहे हैं।
रावत ने यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि यदि उनके कार्यकाल की सरकारी नियुक्तियों में पद के दुरुपयोग का आरोप है तो उसकी जांच होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने अपनी सरकार द्वारा की गई भर्तियों और गठित भर्ती संस्थाओं का उल्लेख कर अपने शासनकाल का एक सकारात्मक रिकॉर्ड जनता के सामने रखने की कोशिश की।
यानी रावत की पूरी दलील का केंद्र यह है कि उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं बल्कि लोगों से बने रिश्ते हैं। इसी आधार पर वह चंदन जीना से जुड़े कथित धन को अपने साथ जोड़कर किए जा रहे प्रचार को खारिज कर रहे हैं।
“जरूरत पड़ी तो वीडियो और वैन के जरिए भी अपनी बात कहूंगा”
बयान के अंत में रावत ने संकेत दिया कि वह इस मुद्दे को यहीं खत्म करने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन में इतनी खुलकर कभी बात नहीं कही, लेकिन कुछ लोग जिस तरह का अभियान चला रहे हैं, उससे वह बाध्य होकर अपनी बात जनता तक पहुंचा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो वह वीडियो बनाकर और जगह-जगह वैन लगाकर भी अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का काम करेंगे।
अंततः रावत ने फिर अपनी पुरानी चुनौती दोहराई कि उनके खिलाफ आयोग बनाकर उनके पूरे कार्यकाल की जांच करा ली जाए। साथ ही उन्होंने उत्तराखंड की जनता से अपील की कि उनके खिलाफ चलाए जा रहे दुष्प्रचार का जवाब देने के लिए वह आगे आए।
उनका अंतिम संदेश भी उतना ही भावनात्मक रहा—“लोग रूग्ण हरीश रावत को भी छोड़ना नहीं चाहते हैं। मेरी रक्षा कौन करेगा? आप करेंगे या उत्तराखंड की देवी-देवता करेंगे?”

