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अब प्रकाश जोशी की गूगल कांग्रेस में किसके लिए :::निजी आकांक्षाओं ने भारतीय क्रिकेट को गहरी चोट पहुंचाई… कांग्रेस में किसके संदर्भ में क्रिकेट से राजनीति को जोड़ते हुए कहा गए जोशी यह बात… खबर पढ़कर आप खुद समझिए और लगाइए अंदाज़ा

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हल्द्वानी। कांग्रेस में इस वक्त चल रही अंदरूनी राजनीति के बीच पार्टी का वह चेहरा भी सामने आ गया है जो कि अभी तक ज्यादा सकरी नजर नहीं आ रहा था। हाल ही में नई दिल्ली में 6 नेताओं के कांग्रेस की जॉइनिंग में हरीश रावत की अनुपस्थिति के बाद उनकी ओर से लगातार आ रही कमेंट्स और अवकाश के साथ ही इस मुद्दे पर कांग्रेस दो गुटों में बंटी दिखाई देने के बाद इस वक्त कांग्रेस में अंदरूनी उठापटक जमकर चल रही है। इसी बीच कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से जुड़े नेता और कालाढूंगी से चुनाव लड़ चुके प्रकाश जोशी की एक फेसबुक पोस्ट ने इस उठा पटक के बीच नई बहस छेड़ दी है। क्रिकेट मैच के संदर्भ का उदाहरण देते हुए उनका यह कहना कि सुनील गावस्कर को भारतीय क्रिकेट ने सब कुछ दिया मगर अंत में सुनील गावस्कर की महत्वाकांक्षाएं टीम पर भारी पड़ गई और उनके जल्द रिटायरमेंट ना लेना कहीं नए खिलाड़ियों के लिए भारी पड़ गया। इसी संदर्भ में प्रकाश जोशी ने महेंद्र सिंह धोनी का नाम देते हुए कहा कि धोनी ने क्रिकेट के सब कुछ देने के बाद सही समय पर रिटायरमेंट लेकर के बहुत सही निर्णय लिया। प्रकाश जोशी का यह तंजी कांग्रेस में किसी बड़े नेता के लिए है यह तो आप बखूबी समझ ही गए होंगे और यह बात साफ है कि अब इस मुद्दे पर राजनीति औरगरमएगी। प्रकाश जोशी ने जो आज फेसबुक पर लिखा उसे आप हूबहू पढ़िए….

 

क्रिकेट और राजनीति में खेल से ज्यादा महत्वपूर्ण है, अपने विवेक से ऐसे समय या दौर का चयन करना, जब आप अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकते हैं और फिर समय की माँग के अनुसार अपने लिए अनुकूल रोल का चयन कर लेना।

दोनों ही फील्ड में रिटायरमेंट शब्द के लिये कोई ज़्यादा गुंजाइश नहीं है।

 

इस कहानी को हम भारतीय क्रिकेट के भीष्म पितामह कहे जाने वाले सुनील गावस्कर और भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाई में पहुंचाने वाले महेंद्र सिंह धोनी के कैरीअर और ट्रांसफॉर्मेशन प्रक्रिया से समझ सकते हैं।

 

सुनील गावस्कर जिन्होंने अपने क्रिकेट का प्रारंभ 1971 में अपनी डेब्यू सीरीज के सर्वाधिक 774 रन बनाकर किया, जो आज भी किसी बल्लेबाज के लिए एक रिकॉर्ड है।

सुनील गावस्कर जिस वक्त भारतीय क्रिकेट में शामिल हुए उस समय भारत की क्रिकेट टीम में एक भरोसेमंद तकनीक से लैस बल्लेबाज का अभाव था, सुनील गावस्कर ने इस कमी को न केवल पूरा किया बल्कि उस समय की दुनिया की सबसे बेहतरीन टीम, वेस्टइंडीज के ख़िलाफ़ ही अपने कैरियर के सर्वाधिक 13 शतक जमा डाले, जो आज भी रिकॉर्ड है।

लेकिन वही सुनील गावस्कर 1982 के आसपास अपनी फॉर्म को लेकर संघर्ष करते दिखाई देने लगे, हालाकि तब तक उन्होंने मात्र 62 टेस्ट मैचों में 21 शतक बना लिए थे, और तब उनका औसत था, 67 रन प्रत्येक टेस्ट.. ।

पहले, 1983 के विश्व कप का लालच, और फिर 10000 रनों का फेर, वह लगातार धीमी गति से खेलते रहे और आखिर के 63 टेस्ट मैचों में उनके द्वारा मात्र 35 रन प्रति टेस्ट का औसत दिया गया…।

हालांकि इस अवधि में उनके द्वारा, निजी रिकॉर्ड 10000 रन, और सर्वाधिक 34 टेस्ट शतक, ब्रैडमैन के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए अपने नाम तो कर लिया गया, लेकिन उनकी निजी आकांक्षाओं ने भारतीय क्रिकेट को गहरी चोट पहुंचाई, और उभर रहे वनडे क्रिकेट में तेज गति से रन बनाने वाले कई भारतीय खिलाड़ियों को टीम में अवसर नहीं मिला भारतीय क्रिकेट पिछड़ गई..।

इसके विपरीत महेंद्र सिंह धोनी ने वर्ष 2014 में ही अपने शानदार टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया इससे न उनका पद घटा न मान…।

भारत में राजनीति भी क्रिकेट की तरह सर्वाधिक लोकप्रिय खेल है, यहां राजनीति के कई महा-क्षत्रप स्वयं को पार्टी से भी ऊपर, पार्टी का पावर हाउस समझने लगते हैं, और भूल जाते हैं कि उन्हें प्राप्त हो रही शक्ति, प्रतिभा ,पद और सम्मान में उनके व्यक्तिगत योगदान से अधिक पार्टी की पहचान भी शामिल होती है।

अतीत बताता है कि भारत में किसी भी क्षत्रप के लिये दलीय राजनीति के बाहर अपना अस्तित्व बचाये रखना काफ़ी मुश्किल रहा है। इसे हम अजीत जोगी, कैप्टन अमरिंदर सिंह, कल्याण सिंह, उमा भारती, एस बांगरप्पा, नारायण राणे, शंकर सिंह वाघेला आदि के उदाहरण से समझ सकते है, जो अपने-अपने राज्य में बहुत महत्वपूर्ण थे, लेकिन पार्टी को चुनौती देकर, अलग होकर रसातल में पहुंच गए।

जब-जब भी किसी क्षत्रप ने अपना गलत आंकलन किया तो उसने न केवल, स्वयं के पद और कद का नुकसान किया बल्कि अपनी संततियों के लिए भी बड़े गड्ढे खोद दिए।

 

बहरहाल किसी भी राजनैतिक दल के लिये उसका प्रत्येक कार्यकर्ता एवं नेता जरूरी और महत्वपूर्ण होता है। बस जरूरत अनुसार परिस्थितियों, एवं समय अनुसार सही आकलन कर अपनी भूमिका स्वयं तय करने का होता है। कभी- कभी विरोधी टीम के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहे बैट्समैन को आउट करने के लिये अपने सर्वश्रेष्ठ एवं सबसे अनुभवी बॉलर की बजाय बैट्समैन को कन्फ़्यूस कर डालने वाले तथा थोड़ा फ्रेश खिलाड़ी से बोलिंग करवाने का भी लाभ मिल जाता है।

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