उत्तराखण्ड
100वीं जयंती या कांग्रेस की विरासत की नई तलाश? स्व. गुलाब सिंह के बहाने सियासत पर नजर
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने समय में बेहद प्रभावशाली रहे, लेकिन समय के साथ राजनीतिक स्मृतियों के पीछे चले गए। स्वर्गीय गुलाब सिंह भी ऐसा ही एक नाम रहे हैं। चकराता-जौनसार की राजनीति में उनका लंबा प्रभाव रहा और अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौर में उन्होंने विधायक से लेकर मंत्री तक की जिम्मेदारियां संभालीं। लेकिन सवाल यह है कि गुलाब सिंह की 100वीं जयंती पर कांग्रेस ने जिस तरह उनकी राजनीतिक विरासत को प्रदेश के सामने रखा है, क्या यह महज एक श्रद्धांजलि है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संकेत भी छिपा है?
15 सितंबर को चकराता-त्यूणी से लेकर मसूरी और हल्द्वानी तक गुलाब सिंह की जन्मशती के कार्यक्रम सामने आए। चकराता के गृह क्षेत्र में बड़ा आयोजन हुआ, जिसमें कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेता पहुंचे। उनके पुत्र और चकराता के विधायक प्रीतम सिंह की मौजूदगी ने इस आयोजन को स्वाभाविक रूप से और राजनीतिक महत्व दे दिया। ऐसे में यह आयोजन केवल अतीत को याद करने तक सीमित नहीं रह जाता।
दिलचस्प बात यह है कि एक पत्रकार के नजरिये से भी सवाल उठता है कि पिछले कई वर्षों के उत्तराखंड के राजनीतिक घटनाक्रम में गुलाब सिंह का नाम आखिर कितनी बार प्रमुखता से सामने आया? चकराता की राजनीति में प्रीतम सिंह का नाम लगातार सुर्खियों में रहा, लेकिन उनके पिता गुलाब सिंह की राजनीतिक विरासत उसी अनुपात में सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा दिखाई नहीं दी। उनकी जयंती को लेकर भी ऐसी कोई लगातार दिखाई देने वाली प्रदेशव्यापी राजनीतिक परंपरा नजर नहीं आती, जैसी कांग्रेस के कई दूसरे पुराने नेताओं को लेकर देखने को मिलती रही है।
यही वजह है कि 100वीं जयंती इस बार एक सामान्य पुण्यस्मरण से आगे जाती हुई दिखाई देती है।
स्व. गुलाब सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत सिर्फ यह नहीं थी कि वह कई बार विधायक रहे या सरकार में मंत्री रहे। उनकी असली राजनीतिक पहचान जौनसार-बावर के उस दौर से जुड़ी है, जब यह क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से काफी पीछे था। क्षेत्र के अधिकारों, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास जैसे मुद्दों को उन्होंने राजनीति के केंद्र में रखा। जौनसार-बावर को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने की लड़ाई को भी उनकी राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
आज उसी विरासत को दोबारा सामने रखना कांग्रेस के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या चकराता की पुरानी राजनीतिक कहानी को फिर से मजबूत किया जा रहा है?
उत्तराखंड की राजनीति में चकराता लंबे समय से कांग्रेस के मजबूत किलों में गिना जाता है। इस सीट पर गुलाब सिंह की लंबी राजनीतिक पारी के बाद उनके पुत्र प्रीतम सिंह ने उसी राजनीतिक जमीन को आगे बढ़ाया। इसलिए गुलाब सिंह की विरासत का सार्वजनिक पुनर्स्मरण कहीं न कहीं चकराता की उस राजनीतिक कहानी को भी दोहराना है, जिसके केंद्र में एक परिवार, एक क्षेत्र और कांग्रेस की लंबी मौजूदगी रही है।
यहां से राजनीति का अगला सवाल शुरू होता है।
क्या कांग्रेस आने वाले चुनावी दौर में अपने वर्तमान मुद्दों के साथ-साथ अपनी ऐतिहासिक राजनीतिक विरासत को भी हथियार बनाना चाहती है?
क्योंकि राजनीति में विरासत सिर्फ इतिहास नहीं होती। सही समय पर उसे सामने लाया जाए तो वही विरासत संगठन, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम बन सकती है।
गुलाब सिंह के बहाने प्रीतम सिंह की राजनीतिक जमीन भी चर्चा में
100वीं जयंती का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू शायद यही है। गुलाब सिंह को याद करना स्वाभाविक रूप से प्रीतम सिंह की राजनीतिक यात्रा को भी चर्चा में ले आता है। पिता से पुत्र तक चली राजनीतिक विरासत को कांग्रेस इस आयोजन के जरिए एक बार फिर सार्वजनिक रूप से रेखांकित करती दिखाई दे रही है।
यह प्रीतम सिंह के लिए भी महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय तक महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के बाद उनकी राजनीति अब केवल चकराता तक सीमित नहीं मानी जाती। ऐसे में उनके पिता की विरासत को बड़े मंच पर सामने लाना उनकी राजनीतिक पहचान की उस ऐतिहासिक जड़ को भी मजबूत करता है, जिससे उनकी राजनीति शुरू हुई।
सवाल जयंती का नहीं, टाइमिंग का है।
गुलाब सिंह की 100वीं जयंती मनाना अपने आप में बिल्कुल स्वाभाविक है। किसी वरिष्ठ जननेता की जन्मशती पर उन्हें याद किया जाना राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से उचित है। लेकिन राजनीति में किसी आयोजन की अहमियत केवल आयोजन से नहीं, उसकी टाइमिंग और उसके पैमाने से भी तय होती है।
आज जब उत्तराखंड की राजनीति अगले विधानसभा चुनाव की दिशा में बढ़ रही है, कांग्रेस के सामने संगठन को मजबूत करने, पुराने कार्यकर्ताओं को जोड़ने और अपनी राजनीतिक जमीन को नए सिरे से परिभाषित करने की चुनौती है। ऐसे समय में अपने पुराने नेताओं की विरासत को सामने लाना निश्चित तौर पर एक राजनीतिक संदेश भी पैदा करता है।
और शायद यही वजह है कि गुलाब सिंह की 100वीं जयंती को केवल एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम मानकर छोड़ देना जल्दबाजी होगी।
कहानी गुलाब सिंह से शुरू होकर चकराता पर पहुंचती है, चकराता से प्रीतम सिंह तक जाती है और वहां से कांग्रेस की भविष्य की राजनीति तक।
इसलिए असली सवाल यही कि क्या 100वीं जयंती ने कांग्रेस को अपना एक पुराना राजनीतिक चेहरा याद कराया है, या कांग्रेस अब उसी पुराने चेहरे के जरिए अपनी खोती हुई राजनीतिक स्मृतियों और विरासत को फिर से जिंदा करने की कोशिश कर रही है? उत्तराखंड की राजनीति में इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में शायद ज्यादा साफ दिखाई देगा।

