उत्तराखण्ड
रुद्रपुर : मजबूत कांग्रेस हुई या भाजपा? ठुकराल के कांग्रेस ज्वाइन करने के बाद क्या है गणित, यहां समझिये
रुद्रपुर : मजबूत कांग्रेस हुई या भाजपा?
*अनिल धर्मदेश*
रुद्रपुर विधानसभा सीट पर विपक्षी खेमे में हलचल शुरू हो गयी है। चार साल की उठापटक के बाद भाजपा के पूर्व विधायक और कभी हिंदुत्व के फायरब्रांड नेता रहे राजकुमार ठुकराल ने अंततः कांग्रेस पार्टी का झंडा थाम लिया। कांग्रेस में उनकी वापसी इतनी आसान नहीं थी क्योंकि संगठन के कई स्थानीय दिग्गज ठुकराल को पार्टी में शामिल किए जाने का लगातार विरोध कर रहे थे। पार्टी का विश्वास जीतने के लिए ठुकराल को मजार और ईदगाह के समर्थन में सरकार और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा तक खोलना पड़ा, जो उनकी पिछली छवि के ठीक विपरीत था। समाज का एक तबका इसे अवसरवदिता की राजनीति कहा रहा है, तो कुछ लोग विचारधारा के बदलाव को भूल सुधार बता रहे हैं।
कांग्रेस में ज्वाइनिंग के लिए चली लंबी खींचतान के बावजूद राजकुमार ठुकराल एक स्पष्ट सन्देश देने में अवश्य सफल हो गए हैं। सन्देश यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में रुद्रपुर सीट से वही कांग्रेस के उम्मीदवार होंगे। पार्टी स्तर पर चाहे यह तय न भी हुआ हो मगर विधानसभा क्षेत्र में इसे सफलतापूर्वक प्रचारित किया गया है। रुद्रपुर में जीत की आस लगाए कुछ कांग्रेसी मानते हैं कि विधानसभा चुनाव में ठुकराल को उम्मीदवार बनाए जाने से लड़ाई भाजपा बनाम भाजपा की हो जाएगी और अल्पसंख्यक वोटों के बल पर कांग्रेस यह बाजी जीत सकती है। लगभग यही गणित ठुकराल और उनके समर्थक भी लगा रहे हैं। बल्कि ठुकराल के कुछ उत्साही समर्थकों ने उनके कांग्रेस में शामिल होने को तूफान और भूचाल बताकर पक्की जीत का दावा तक कर दिया है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम को समग्र दृष्टिकोण से देखा जाएगा और समाज के सभी वर्गों की राय से ही हार- जीत सुनिश्चित होगी। रुद्रपुर सीट पर तीन बार से अजेय भाजपा के समक्ष निश्चित रूप से ऐंटी इंकम्बेसी एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में स्थानीय विधायक से उनके समाज और खुद भाजपा के कुछ लोगों की नाराजगी समस्या को बड़ा कर रही है। मगर, राजकुमार ठुकराल के उम्मीदवार बनने का अर्थ अगर कांग्रेस के लिए भाजपा बनाम भाजपा है तो भाजपा के वोटर की दृष्टि में यह चुनाव भाजपा की संस्कृति बनाम भाजपा उससे विद्रोह का होगा। जिस भाजपा की परंपरा में पार्टी हित के लिए कल्याण सिंह और फडनवीस जैसे दिग्गजों ने सीएम की कुर्सी ठुकरा दी हो और जहाँ त्याग के अनगिनत उदाहरण स्थापित हों, वहाँ एमएलए की सीट के लिए भाजपाई विचारधारा की घुर विरोधी कांग्रेस के पाले में खड़े होने वाले को भाजपा का कोर वोटर समर्थन देगा, यह कहना बहुत मुश्किल है। भाजपा को घेरने के चक्कर में कांग्रेस भूल गयी कि इस निर्णय का स्पष्ट सन्देश यह जाएगा कि रुद्रपुर सीट पर नंबर एक और नंबर दो, दोनों पर भाजपा ही है। पूरी कांग्रेस पार्टी में एक भी ऐसा नेता नहीं है, जो अपने बूते भाजपा को टक्कर दे सके।
कांग्रेस संगठन की यह परोक्ष स्वीकारोक्ति उसके अपने कोर वोटर की प्रतिबद्धता को कमजोर करने वाली है। उससे भी बड़ी बात यह है कि अब रुद्रपुर में विधानसभा चुनाव का मुकाबला त्रिकोणीय नहीं होगा और भाजपा-कांग्रेस की सीधी टक्कर का परिणाम सभी जानते हैं। अगर ठुकराल निर्दलीय चुनाव लड़ते तो भाजपा का हिंदूवादी समर्थक वोट दो हिस्सों में बंट जाता मगर अब वह वोटबैंक कांग्रेस के साथ नहीं जाएगा। इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी को अपने पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी की कीमत निश्चित रूप से चुकानी ही पड़ेगी। कांग्रेस के नेता जिस वोटबैंक के दबाव में ठुकराल को पार्टी में शामिल करने का विरोध कर रहे थे, उन्हें अब क्षेत्र में इसका जवाब देना पड़ेगा।
संक्षेप में कहें तो ठुकराल के कांग्रेस में शामिल होने से उनके समर्थक ठीक उसी प्रकार उत्साहित हैं, जैसे 2022 में भाजपा से बगावत कर उनके निर्दलीय चुनाव लड़ने पर थे। धरातल के समीकरण बताते हैं कि ठुकराल के कांग्रेस में शामिल होने से भाजपा की मुसीबत बढ़ने के बजाय कम हुई है क्योंकि अब लड़ाई त्रिकोणीय नहीं रहेगी और कांग्रेस के दबाव में मुस्लिम वोटबैंक के पक्ष में उनके बयानों के कारण उनका अपना वोटर भी भाजपा के पाले में चला जाएगा। यदि वर्तमान विधायक से जनता की प्रचंड नाराजगी का विपक्ष का दावा नैरेटिव में बदलता भी दिखे, तब भी भाजपा को अधिकतम अपना उम्मीदवार ही बदलना पड़ेगा। किसी नए प्रत्याशी के साथ भाजपा ऐंटी इनकम्बेसी की चुनौती से बड़ी सरलता से निपट लेगी। चुनावों में अभी एक वर्ष शेष है और इतने समय तक कार्यकर्ताओं को साधे रखना कांग्रेस के लिए इतना आसान भी नहीं होगा।
*अनिल धर्मदेश*
