उत्तराखण्ड
पितामह का अवकाश ख़त्म : पात्र हैं, संवाद हैं, संघर्ष है, और अनिश्चितता… कौन किसके साथ जाएगा, कौन किसके खिलाफ…. रहस्य के बीच भाजपा के लिए शानदार कांग्रेस शो
उत्तराखंड की राजनीति भी कमाल की है—यहाँ मौसम ही नहीं, नेताओं के मूड और पार्टी के प्रति समर्पण का तापमान भी मिनटों में बदल जाता है। अभी तक जो नेता “मौन तपस्या” में लीन थे, अचानक उन्होंने पार्टी गतिविधियों में शामिल होने का एलान कर दिया। यह एलान ऐसा लगा मानो किसी ने वर्षों से बंद पड़े रेडियो का स्विच ऑन कर दिया हो—आवाज़ आई, पर पहले लोगों को भरोसा ही नहीं हुआ कि यह सच में वही है।
कांग्रेस पार्टी के लिए यह घोषणा किसी “खुशखबरी” से कम नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन हुआ इसका उल्टा। पार्टी के भीतर हलचल मच गई—कुछ लोग खुश हैं, कुछ लोग चिंतित हैं, और कुछ ऐसे भी हैं जो यह समझने में लगे हैं कि आखिर यह हो क्या रहा है। राजनीति में “सक्रिय होने का एलान” भी एक घटना बन जाए, तो समझ लीजिए कि पार्टी के भीतर निष्क्रियता कितनी गहरी जड़ें जमा चुकी थी।
दूसरी तरफ भाजपा है—वो इस पूरे घटनाक्रम को ऐसे देख रही है जैसे पड़ोसी के घर में चल रहे झगड़े का लाइव टेलीकास्ट। उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान है, जिसमें चिंता नहीं, बल्कि मनोरंजन ज्यादा झलक रहा है। भाजपा को यह अच्छी तरह पता है कि विपक्ष जितना ज्यादा अपने ही घर में उलझा रहेगा, उतना ही मैदान उनके लिए साफ रहेगा। इसलिए वे इस “सक्रियता” के एलान को किसी चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि एक दिलचस्प कॉमेडी शो के नए एपिसोड की तरह देख रहे हैं।
कांग्रेस के भीतर अब जो स्थिति बन रही है, वह किसी संयुक्त परिवार के उस दृश्य जैसी है, जहाँ अचानक कोई पुराना सदस्य वापस आकर घर की व्यवस्था पर सवाल उठाने लगे। जो लोग अब तक घर संभाल रहे थे, उन्हें लग रहा है कि उनकी कुर्सी खतरे में है। और जो बाहर थे, वे अब यह जताने में लगे हैं कि असली हकदार वही हैं। नतीजा—घर में दो नहीं, कई धड़े बन गए हैं।
अब सवाल यह है कि यह धड़े बने कैसे? दरअसल, कांग्रेस में धड़े बनना कोई नई बात नहीं है। यह परंपरा लगभग उतनी ही पुरानी है जितनी पार्टी खुद। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह धड़े पर्दे के पीछे होते थे, अब खुलेआम नजर आने लगे हैं। पहले असहमति को “विचारों का अंतर” कहा जाता था, अब उसे “गुटबाजी” कहने में भी कोई संकोच नहीं है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प बात यह है कि “सक्रिय होने का एलान” अपने आप में एक राजनीतिक संदेश भी है। यह संदेश सिर्फ जनता के लिए नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर बैठे उन नेताओं के लिए भी है, जो यह मानकर चल रहे थे कि मैदान अब खाली है। अचानक से किसी का लौट आना, और वह भी पूरे जोश के साथ, यह बताता है कि राजनीति में कोई भी जगह स्थायी नहीं होती—न ही सत्ता की, न ही संगठन की।
कांग्रेस के भीतर अब जो खेमेबाजी दिखाई दे रही है, वह सिर्फ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस असमंजस का भी प्रतीक है जिसमें पार्टी लंबे समय से फंसी हुई है। एक तरफ पुराने चेहरे हैं, जिनके पास अनुभव है, लेकिन ऊर्जा कम है। दूसरी तरफ नए चेहरे हैं, जिनके पास ऊर्जा है, लेकिन अनुभव कम है। और तीसरी तरफ वे लोग हैं, जो समय-समय पर “सक्रिय” और “निष्क्रिय” होने का खेल खेलते रहते हैं।
भाजपा के लिए यह स्थिति किसी वरदान से कम नहीं है। वे जानते हैं कि जब तक विपक्ष अपने ही अंतर्विरोधों में उलझा रहेगा, तब तक उन्हें ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए वे इस पूरे घटनाक्रम पर कोई तीखी प्रतिक्रिया देने के बजाय चुपचाप मुस्कुरा रहे हैं। यह मुस्कान वही है, जो किसी शतरंज के खिलाड़ी के चेहरे पर तब आती है, जब सामने वाला खिलाड़ी अपनी ही चालों में उलझ जाए।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह इस स्थिति को कैसे संभाले। क्या वह इसे “लोकतांत्रिक बहस” का नाम देकर आगे बढ़ेगी, या फिर इसे “अनुशासनहीनता” मानकर सख्ती दिखाएगी? दोनों ही रास्तों के अपने-अपने खतरे हैं। अगर वह इसे बहस मानती है, तो गुटबाजी और बढ़ेगी। और अगर वह सख्ती दिखाती है, तो असंतोष खुलकर सामने आ सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में जनता की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। जनता यह सब देख रही है, समझ रही है, और अपने तरीके से इसका विश्लेषण भी कर रही है। उसे यह समझ में आ रहा है कि जो पार्टी खुद अपने अंदर एकजुट नहीं है, वह राज्य को कैसे एकजुट रखेगी। इसलिए यह “सक्रियता” का एलान जितना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है, उतना ही उसकी विश्वसनीयता के लिए भी।
व्यंग्य की दृष्टि से देखें तो यह पूरा मामला किसी नाटक से कम नहीं है। इसमें पात्र हैं, संवाद हैं, संघर्ष है, और सबसे महत्वपूर्ण—अनिश्चितता है। कौन किसके साथ जाएगा, कौन किसके खिलाफ खड़ा होगा, और अंत में क्या होगा—यह सब अभी एक रहस्य है। लेकिन इतना तय है कि यह नाटक अभी लंबे समय तक चलेगा।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि उत्तराखंड की राजनीति में “सक्रियता” का यह नया अध्याय जितना दिलचस्प है, उतना ही जटिल भी। कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का समय है, जबकि भाजपा के लिए यह आत्मविश्वास का। और जनता के लिए—यह एक ऐसा शो है, जिसमें टिकट तो नहीं लगता, लेकिन असर जरूर पड़ता है।
अब देखना यह है कि यह “सक्रियता” वास्तव में पार्टी को मजबूत बनाती है, या फिर यह सिर्फ एक और अध्याय बनकर रह जाती है उस लंबी कहानी का, जिसमें कांग्रेस अपने ही सवालों के जवाब खोजती रहती