उत्तराखण्ड
दो टर्म से सत्ता से बाहर कांग्रेस ने शनिवार को किया ‘शनि दोष’ दूर करने का जतन! हनुमान दिवस पर रामलीला मैदान से चुनावी श्रीगणेश
दो टर्म से सत्ता से बाहर कांग्रेस ने शनिवार को किया ‘शनि दोष’ दूर करने का जतन! हनुमान दिवस पर रामलीला मैदान से चुनावी श्रीगणेश
हल्द्वानी। उत्तराखंड की सत्ता से लगातार दो विधानसभा चुनावों से बाहर चल रही कांग्रेस ने शनिवार को हल्द्वानी के रामलीला मैदान से अपने चुनावी अभियान का श्रीगणेश किया। संयोग देखिए—दिन शनिवार, हनुमानजी की पूजा का विशेष दिन और जगह रामलीला मैदान। ऐसे में कांग्रेस की इस जनसभा को लेकर सियासी गलियारों में एक दिलचस्प चर्चा शुरू हो गई है—क्या कांग्रेस ने चुनावी ‘शनि’ को हटाने के लिए बजरंगबली का सहारा लिया है?
आस्था की अपनी मान्यताएं हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार शनिवार को हनुमानजी की पूजा करने से शनिदेव के अशुभ प्रभाव और साढ़ेसाती जैसी शनि संबंधी पीड़ाओं से राहत मिलती है। पौराणिक कथा में माना जाता है कि हनुमानजी ने शनिदेव को रावण की कैद से मुक्त कराया था। इसके बाद शनिदेव ने हनुमान भक्तों को अपनी पीड़ा से बचाने का वचन दिया।
अब इसे राजनीति के आईने में देखें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है।
कांग्रेस उत्तराखंड में दो लगातार विधानसभा चुनावों से सत्ता से बाहर है। 2017 में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद 2022 में भी कांग्रेस सत्ता में वापसी नहीं कर सकी। यानी पार्टी के सामने 2027 में इस राजनीतिक ‘साढ़ेसाती’ को खत्म करने की बड़ी चुनौती है।
और इसी चुनौती के बीच कांग्रेस ने शनिवार को, यानी हनुमानजी के दिन, रामलीला मैदान से चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी।
क्या बजरंगबली से मिलेगी सत्ता की संजीवनी?
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की जनसभा में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर भर दिया। लंबे समय से सत्ता से बाहर कांग्रेस के लिए यह भीड़ किसी राजनीतिक संजीवनी से कम नहीं थी।
सियासी नजरिए से देखें तो कांग्रेस को फिलहाल सबसे ज्यादा जरूरत इसी संजीवनी की है।
संगठन में जान फूंकना, कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना और भाजपा के मजबूत चुनावी संगठन के सामने अपने कैडर को खड़ा करना—2027 से पहले कांग्रेस के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है।
ऐसे में शनिवार का दिन और हनुमानजी की आस्था से जुड़ा रामलीला मैदान कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूपक बन गया।
शनिवार को हनुमानजी की पूजा से शनि की पीड़ा कम होने की मान्यता है और कांग्रेस के सामने भी दो चुनाव से चला आ रहा सत्ता से बाहर रहने का ‘शनि’ है।
संयोग है तो भी दिलचस्प है और रणनीति है तो उससे भी ज्यादा दिलचस्प।
रामलीला मैदान से क्यों शुरू हुआ चुनावी श्रीगणेश?
रामलीला मैदान केवल एक सभा स्थल नहीं है। इसके नाम के साथ भगवान राम और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा का सीधा संबंध जुड़ा है।
कांग्रेस पर अक्सर आरोप लगता रहा है कि वह भाजपा के मुकाबले हिंदू धार्मिक प्रतीकों और सनातन के सवाल पर उतनी मुखर नहीं रही। भाजपा ने राम, हनुमान, सनातन और हिंदू सांस्कृतिक पहचान को लंबे समय से अपने राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।
ऐसे में कांग्रेस का रामलीला मैदान से चुनावी अभियान शुरू करना अपने आप में राजनीतिक संदेश बन गया।
क्या कांग्रेस अब यह बताने की कोशिश कर रही है कि राम और हनुमान किसी एक राजनीतिक दल की विरासत नहीं हैं?
या फिर यह केवल ऐसा संयोग है, जिसमें कांग्रेस ने अनजाने ही अपने चुनावी अभियान को एक धार्मिक प्रतीकात्मकता दे दी?
शनिवार का संयोग कितना राजनीतिक?
राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है। खासकर चुनाव के समय।
शनिवार को हनुमानजी की पूजा को लेकर धार्मिक आस्था है। मान्यता है कि बजरंगबली की उपासना से भय, नकारात्मकता और मानसिक बाधाएं दूर होती हैं।
कांग्रेस के लिए भी चुनौती कुछ ऐसी ही है—दो चुनावी हार के बाद कार्यकर्ताओं के भीतर का डर और निराशा दूर करना, संगठन में आत्मविश्वास पैदा करना और भाजपा के सामने मुकाबले की मानसिकता तैयार करना।
इस लिहाज से हनुमान दिवस पर बड़ी जनसभा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं के लिए ‘आस्था से ऊर्जा’ और ‘सभा से संजीवनी’ का मेल भी बन गई।
सभा के बाद प्रशासन से टकराव ने बढ़ाया ताप
जनसभा के दौरान कार्यकर्ताओं के वाहनों को रोके जाने के आरोप के बाद कांग्रेस के बड़े नेता एसएसपी कार्यालय पहुंचे और धरने पर बैठ गए।
इस घटनाक्रम ने चुनावी अभियान के पहले ही दिन कांग्रेस के तेवर साफ कर दिए।
एक तरफ रामलीला मैदान में खड़गे की सभा और दूसरी तरफ एसएसपी कार्यालय में पार्टी नेताओं का धरना—कांग्रेस ने अपने कार्यकर्ताओं को यह संदेश देने की कोशिश की कि चुनावी संघर्ष में नेतृत्व उनके साथ खड़ा है।
अब देखना यह—शनि हटेगा या नहीं?
कांग्रेस के लिए 2027 सिर्फ एक और विधानसभा चुनाव नहीं है। यह दो चुनावी हार के बाद राजनीतिक वापसी का बड़ा मौका है।
शनिवार को हनुमानजी के दिन रामलीला मैदान से शुरू हुआ अभियान इसलिए भी प्रतीकात्मक बन गया है।
धार्मिक मान्यता कहती है कि बजरंगबली की आराधना से शनिदेव की पीड़ा कम होती है। सियासी मान्यता का फैसला अब जनता करेगी कि कांग्रेस के लिए शनिवार की यह ‘हनुमान आराधना’ और चुनावी श्रीगणेश कितनी राजनीतिक संजीवनी लेकर आता है।
कांग्रेस के सामने अब एक ही सवाल है—
क्या रामलीला मैदान से मिला यह जोश 2027 तक कायम रहेगा और दो चुनाव से सत्ता पर चढ़ा ‘शनि’ आखिरकार हट पाएगा?
