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मोदी के दौर में पैदा हुई जेनजी को क्यों नहीं दिखता बदलाव? जिस भारत को सामान्य मान रही नई पीढ़ी, उसे बनाने में लगा एक लंबा सफर

मोदी के दौर में पैदा हुई जेनजी को क्यों नहीं दिखता बदलाव? जिस भारत को सामान्य मान रही नई पीढ़ी, उसे बनाने में लगा एक लंबा सफर

मनोज लोहनी

 

जिस समय देश में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सत्ता परिवर्तन हुआ, आज की जेनजी का बड़ा हिस्सा पैदा भी नहीं हुआ था। जिसने पुराने भारत की मुश्किलें देखी ही नहीं, उसके लिए आज की सुविधाएं उपलब्धि नहीं, सामान्य जीवन का हिस्सा हैं। यही पीढ़ीगत अंतर आज मोदी सरकार के मूल्यांकन की बहस में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है।

आज की जेनजी यानी नई युवा पीढ़ी को देश से बहुत कुछ चाहिए। बेहतर रोजगार चाहिए, बेहतर शिक्षा चाहिए, महंगाई से राहत चाहिए, आधुनिक सुविधाएं चाहिए और ऐसा भविष्य चाहिए, जिसमें अवसरों की कमी न हो। उसकी अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं। आखिर हर पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से बेहतर जीवन चाहती है। लेकिन इस पूरी बहस में एक सवाल ऐसा है, जिस पर शायद उतनी चर्चा नहीं होती—क्या आज की पीढ़ी उस भारत को जानती भी है, जहां से बदलाव की यह यात्रा शुरू हुई थी?

वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली, तब आज के अनेक युवा बचपन की उस अवस्था में थे, जब उन्हें देश की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों का कोई बोध नहीं था। आज वही बच्चे युवा हो चुके हैं। वे सोशल मीडिया पर सरकार के कामकाज का विश्लेषण करते हैं, राजनीतिक बहसों में हिस्सा लेते हैं और अपनी अपेक्षाओं के आधार पर सत्ता से सवाल पूछते हैं।

लेकिन जिस दौर को उन्होंने देखा ही नहीं, उस दौर की कठिनाइयों की तुलना आज से कैसे करेंगे?

माता-पिता ने संघर्ष देखा, बच्चों ने सुविधाओं को सामान्य मान लिया

एक समय था, जब आम परिवारों की जिंदगी में छोटी-छोटी जरूरतें भी बड़ी परेशानी बन जाती थीं। रसोई गैस के सिलेंडर के लिए लंबा इंतजार, सरकारी सेवाओं के लिए भागदौड़ और सीमित संसाधनों के बीच घर चलाने की चुनौतियां अनेक परिवारों के जीवन का हिस्सा थीं। आज की पीढ़ी के माता-पिता ने इन परिस्थितियों को करीब से देखा है, लेकिन उनके बच्चों के लिए ये बातें अक्सर केवल पुराने समय के किस्से हैं।

जिस पीढ़ी ने सुविधाओं के अभाव को झेला, उसके लिए किसी सुविधा का आसानी से उपलब्ध हो जाना अपने आप में राहत है। लेकिन जो पीढ़ी उस अभाव से गुजरी ही नहीं, उसके लिए वही सुविधा सामान्य बात है। उसे यह जानने की जरूरत महसूस नहीं होती कि उसके माता-पिता को उस मुकाम तक पहुंचने के लिए कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

यहीं मोदी सरकार के दौर में हुए बदलावों को देखने का एक महत्वपूर्ण नजरिया सामने आता है। वर्ष 2014 के बाद केंद्र सरकार ने जनधन खातों, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, डिजिटल भुगतान, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन और डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बड़े स्तर पर काम किया। इन पहलों के प्रभाव और सीमाओं का मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, लेकिन यह भी समझना होगा कि इन बदलावों ने सरकारी योजनाओं और सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने के तरीके पर व्यापक बहस को जन्म दिया है।

आज डिजिटल भुगतान करना, मोबाइल से जानकारी हासिल करना या सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे खाते में प्राप्त करना अनेक लोगों के लिए सामान्य अनुभव बन चुका है। नई पीढ़ी इसी बदले हुए परिवेश में बड़ी हुई है। उसके लिए यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं रह जाता कि पहले क्या मुश्किल था; उसका सवाल होता है कि अब और क्या बेहतर हो सकता है।

मोदी सरकार की चुनौती: उपलब्धि को सामान्य मानने वाली पीढ़ी

राजनीति की विडंबना देखिए। किसी सरकार के सामने एक ओर देश की पुरानी समस्याओं को दूर करने की चुनौती होती है, तो दूसरी ओर उन समस्याओं के कम होने या व्यवस्थाओं के बदलने के बाद पैदा होने वाली नई अपेक्षाएं भी होती हैं।

जब किसी परिवार को लंबे संघर्ष के बाद बेहतर घर मिलता है, तो अगली पीढ़ी उस घर की कठिनाई नहीं, उसकी सुविधाएं देखती है। जब किसी बच्चे को बचपन से इंटरनेट और स्मार्टफोन मिलता है, तो वह इसे आधुनिक जीवन का सामान्य हिस्सा मानता है। इसी तरह, जिस पीढ़ी ने 2014 से पहले के भारत की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को स्वयं अनुभव नहीं किया, उसके लिए मोदी सरकार के कार्यकाल में हुए बदलावों की तुलना करना सहज नहीं है।

यह कहना गलत होगा कि हर बदलाव का श्रेय केवल एक सरकार को दिया जा सकता है। देश का विकास लंबे समय की प्रक्रिया है और अनेक उपलब्धियों के पीछे पिछली सरकारों, संस्थाओं, वैज्ञानिकों, उद्यमियों तथा नागरिकों का योगदान भी होता है। लेकिन किसी सरकार के कार्यकाल का मूल्यांकन करते समय उसके द्वारा शुरू की गई योजनाओं, किए गए नीतिगत बदलावों और उनके वास्तविक परिणामों को भी उचित महत्व मिलना चाहिए।

मोदी सरकार के समर्थकों की दलील यही है कि देश में बुनियादी सुविधाओं, डिजिटल सेवाओं, वित्तीय समावेशन और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार ने आम नागरिक के जीवन में बदलाव लाने का प्रयास किया है। इन दावों की वास्तविक तस्वीर आंकड़ों और जमीनी अनुभवों से समझी जानी चाहिए। फिर भी, यह प्रश्न अपनी जगह कायम है कि क्या आज की राजनीतिक बहस में इन बदलावों की तुलना पुराने अनुभवों से पर्याप्त रूप से की जा रही है?

सोशल मीडिया के दौर में अपेक्षाओं की राजनीति

आज के युवा तक राजनीतिक जानकारी पहुंचने का प्रमुख माध्यम सोशल मीडिया भी है। यहां कुछ ही सेकंड में सरकार की आलोचना, किसी योजना की विफलता, किसी समस्या का वीडियो या किसी राजनीतिक विरोध का संदेश लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसके विपरीत, किसी योजना का व्यापक प्रभाव, उसके पीछे की प्रक्रिया और वर्षों में आए बदलाव को समझने के लिए अधिक समय और जानकारी की जरूरत होती है।

ऐसे माहौल में युवा किसी एक घटना या समस्या के आधार पर सरकार के प्रति अपनी राय बना सकते हैं। लेकिन किसी सरकार का समग्र मूल्यांकन केवल वायरल वीडियो, राजनीतिक नारों या समर्थकों और विरोधियों के दावों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

युवाओं को यह देखना चाहिए कि रोजगार के अवसरों में क्या बदलाव आया, महंगाई और आय का वास्तविक संबंध क्या है, सरकारी योजनाओं का लाभ कितने लोगों तक पहुंचा, स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति कैसी है और बुनियादी ढांचे पर हुए खर्च का जमीनी असर क्या रहा। यही कसौटियां सरकार की उपलब्धियों और कमियों, दोनों को सामने लाती हैं।

मोदी सरकार के समर्थन में सबसे मजबूत तर्क भी यही हो सकता है कि उसका मूल्यांकन केवल असंतोष की आवाजों से नहीं, बल्कि उसके काम, नीतियों और उनके परिणामों से किया जाए।

बेहतर भारत मांगने से पहले पुराने भारत को जानना जरूरी

जेनजी को यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसे देश की परिस्थितियों की समझ नहीं है। नई पीढ़ी के पास अपनी समस्याएं और अपने अनुभव हैं। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की चुनौतियां, महंगाई, शिक्षा की लागत और भविष्य की अनिश्चितता उसके वास्तविक सवाल हैं। इन पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।

लेकिन नई पीढ़ी के लिए यह समझना भी जरूरी है कि आज जिस व्यवस्था को वह सामान्य मान रही है, उसके पीछे वर्षों की विकास यात्रा है। माता-पिता के संघर्ष, पिछली सरकारों के प्रयास, तकनीकी विकास और वर्तमान सरकार की नीतियां—इन सबको समझे बिना देश की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ सकती।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन या विरोध व्यक्तिगत राजनीतिक विचार का विषय है। किसी युवा का सरकार से असहमत होना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है। लेकिन असहमति जितनी जरूरी है, उतना ही जरूरी है तथ्यों की समझ। सरकार से बेहतर काम की मांग की जानी चाहिए, मगर उसके कार्यकाल का आकलन करते समय उन क्षेत्रों को भी देखना चाहिए जहां बदलाव आया है।

जिस बदलाव को देखा नहीं, उसका महत्व कैसे समझेगी नई पीढ़ी?

आज की जेनजी एक ऐसे भारत में बड़ी हुई है, जहां डिजिटल तकनीक और अनेक आधुनिक सुविधाएं उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। उसने अपने माता-पिता की तरह पुराने दौर की हर परेशानी को स्वयं नहीं झेला। इसलिए संभव है कि वह उन बदलावों को उतना असाधारण न माने, जिन्हें पिछली पीढ़ी ने बड़ी राहत के रूप में अनुभव किया था।

यही पीढ़ीगत अंतर मोदी सरकार के मूल्यांकन की बहस को एक नया आयाम देता है। किसी सरकार की उपलब्धियां तभी सार्थक होती हैं, जब उनका लाभ आम नागरिक तक पहुंचे; और किसी सरकार की कमियों को पहचानना भी उतना ही जरूरी है। लेकिन उपलब्धियों और कमियों का आकलन एक ही पैमाने पर, पूरे संदर्भ के साथ होना चाहिए।

नई पीढ़ी को मोदी सरकार से और बेहतर भारत मांगने का पूरा अधिकार है। लेकिन बेहतर भारत की मांग करते समय यह जानना भी जरूरी है कि आज का भारत कल के भारत से किन मायनों में अलग है। क्योंकि जो पीढ़ी अपने अतीत को जाने बिना केवल वर्तमान की कमियां देखती है, वह विकास की पूरी कहानी नहीं देख पाती।

सवाल यह नहीं है कि जेनजी को बेहतर भारत चाहिए या नहीं—बेहतर भारत तो हर पीढ़ी का अधिकार और सपना है। असली सवाल यह है कि क्या हम बेहतर भविष्य की ओर बढ़ते हुए अपने अतीत के संघर्षों, वर्तमान की उपलब्धियों और शेष चुनौतियों—तीनों को एक साथ देखने के लिए तैयार हैं?

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