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उत्तराखण्ड

बोले हरीश रावत— “अब मैं जिंदा रहने की जंग लड़ रहा हूं”

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बोले हरीश रावत— “अब मैं जिंदा रहने की जंग लड़ रहा हूं”? पढ़िए मां के संघर्ष, 27 रुपये और उस सीख की पूरी कहानी

 

देहरादून। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री Harish Rawat ने अपने संस्मरण में जीवन के संघर्षों को याद करते हुए एक भावुक प्रसंग साझा किया है। उन्होंने बताया कि किस तरह आर्थिक तंगी, मां के त्याग, गांव के विकास के लिए किए गए संघर्ष और संयोग से ब्लॉक प्रमुख बनने तक का सफर तय हुआ। लेख के अंत में हरीश रावत लिखते हैं कि चुनाव लड़ने से पहले उनकी मां ने अपनी धोती की गांठ खोलकर 27 रुपये उनके हाथ में रखे और कहा था— “यदि पैसों की ही बात आएगी तो पीछे मत हटना। तुम्हारे पिताजी की छोड़ी काफी जमीन है, कुछ बेच देंगे, लड़ना… डटकर लड़ना।” हरीश रावत कहते हैं कि मां के यही शब्द आज भी उन्हें हर कठिन परिस्थिति में आगे बढ़ने की ताकत देते हैं। यही वजह है कि संस्मरण के अंत में उन्होंने लिखा— “हां, अब मैं जिंदा रहने की जंग लड़ रहा हूं। मगर यहां भी मां के शब्द ही बार-बार कानों में गूंजते हैं।”

पूरा मूल लेख बिना किसी बदलाव के…

 

 

मेरी मां: “लड़ना, डटकर लड़ना”

 

छोटे मामा जी चाहते थे कि मैं गांव में अधिक न रुकूं। लखनऊ जाकर बी.ए. पास होकर आऊं। खुद थोड़े से पढ़े-लिखे थे, परंतु शिक्षा के महत्व और राजनीति, दोनों की समझ रखते थे। छोटी-मोटी ठेकेदारी के साथ हमारे ब्लॉक के कनिष्ठ प्रमुख भी थे, बड़े मामा जंगलात विभाग में ठेकेदार थे। मैं मामा जी का निर्देश मानकर, मां की अनुमति लेकर लखनऊ को चल पड़ा। मां ने अपने बचाए हुए कुछ रुपए, एक बड़ा सा डिब्बा खजूर “अर्थात सूजी से घी में बनने वाले पकवान”, मेरे और मेरे दोस्तों के लिए दिया। लखनऊ आकर कुछ दिनों तक मां व गांव सब याद रहा, फिर धीरे-धीरे मैं पुनः लखनऊवा हो गया। जैसे-तैसे बी.ए. पास किया। मेरे अधिकांश दोस्तों ने एलएलबी में प्रवेश लेने का निश्चय किया और मेरा भी फॉर्म भर दिया। फीस आपस में इकट्ठा कर जमा कर दी। उन दिनों लॉ का कोर्स 3 वर्ष का होता था। मैं घर जाकर मां व मामा जी लोगों से परामर्श करना चाहता था। सत्यता यह थी कि मैं लखनऊ रहकर पढ़ने की स्थिति में नहीं था, मुझे नौकरी ढूंढनी थी। दोस्त घर जाने ही नहीं दे रहे थे। यूनियन के चुनाव के बाद गांव जाने का निश्चय हुआ और मैं एल.एल.बी. के प्रथम वर्ष का छात्र बन गया। हमारे एक जानने वालों के हाथ मामा जी का संदेश आया कि अब मेरा आगे का क्या इरादा है। पढ़ाई के खर्चे को लेकर मामा जी ने कोई बात नहीं कही। शायद अब वे अपने ग्रेजुएट भांजे से नौकरी को लेकर परामर्श करना चाहते थे। लखनऊ के दो प्रतिष्ठित परिवारों से मेरी अंतरंगता बहुत अधिक थी। मैंने उन्हें अपनी आर्थिक परेशानी बताई। एक परिवार ने फीस, कॉपी, किताब व हॉस्टल का खर्चा और दूसरे परिवार ने खाने व कपड़े का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया। परंतु मेरा मन बार-बार मुझको सलाह दे रहा था कि मैं गांव जाकर मामा जी व मां से परामर्श करूं। यूं भी मेरा आत्म स्वाभिमान मुझे किसी की दया-ममता पर पढ़ाई जारी रखने की अनुमति नहीं दे रहा था।

 

यूनियन के चुनाव के बाद छात्र आंदोलन को लेकर विश्वविद्यालय एक सप्ताह से बंद था, परंतु साथी घर जाने ही नहीं दे रहे थे। मैं हॉस्टल में ही घिरा पड़ा था। संयोग से इन्हीं दिनों गोमती नदी में भारी बाढ़ आई और विश्वविद्यालय सहित पूरा लखनऊ जलमग्न हो गया। दो-तीन दिन हमने बाढ़ सहायता सामग्री बांटने का काम किया। धीरे-धीरे साथी लोग अपने घर जाने लगे और मैं इस अवसर का लाभ उठाकर रामनगर का टिकट कटाया और गांव लौट गया।

 

मां बहुत खुश हुई। मेरे बी.ए. पास करने के उपलक्ष्य में उसने पूरी व बड़े बनाकर पूरे गांव में बांटे। इस वक्त हमारे इलाके के कुछ लड़के, जो लखनऊ के विभिन्न कॉलेजों में पढ़ रहे थे, वे भी बाढ़ की स्थिति को देखते हुए गांव आए थे। हमने मिल-जुलकर तय किया कि हमारे इलाके का चौनलिया स्कूल, जो कला विषय के साथ हाईस्कूल की कक्षाएं संचालित कर रहा था, अब इंटर होना चाहिए व स्कूल को विज्ञान वर्ग की मान्यता भी मिलनी चाहिए। हमने तय किया कि पहले इलाके में चंदा इकट्ठा करेंगे और फिर इंटर की मान्यता के लिए प्रयास करेंगे। प्रयासों का केंद्र बिंदु सभी ने मुझे बना दिया। इलाके में चंदा इकट्ठा करने व अपराह्न श्रमदान से पत्थर इकट्ठा करने व भूमि को समतल करने का काम प्रारंभ किया गया। लोगों ने दोनों कामों में बड़ा उत्साह दिखाया और बढ़-चढ़कर हाथ बटाया। हम चंदा एकत्र करने दिल्ली में सेवारत ककलासौं पट्टी के लोगों तक भी पहुंचे। संयोग से विज्ञान वर्ग का भवन भी इसी दौरान तैयार हो गया। अल्मोड़ा में डीआईओएस और लखनऊ में शिक्षा मंत्री, दोनों से मेरा विश्वविद्यालय संबंधों के कारण अच्छा-खासा परिचय था। डीआईओएस महोदय ने प्रबल संस्तुति के साथ मामले को लखनऊ शासन में भेज दिया। शिक्षा मंत्री जी का भांजा मेरा गहरा दोस्त था। उसकी मदद से हमारे प्रबंधक मंडल को शिक्षा मंत्री से मिलने का समय भी मिल गया और शिक्षा मंत्री ने विज्ञान वर्ग की मान्यता देने के स्पष्ट आदेश दे दिए।

 

प्रबंधक मंडल के वापस लौटने के बाद इलाके में मेरा रुतबा बढ़ गया। इलाके के लोग मुझसे आग्रह करने लगे कि अब इंटर की मान्यता के लिए प्रयास करो। सब लोग बड़े व नौजवान साथ देने को तत्पर थे। मुझको लेकर हो रही इन चर्चाओं से मामा जी व मेरी मां भी परिचित थी। मैं नौकरी खोजने पर जोर दे रहा था। मुझे घर व मां के हालात का अंदाजा था। मध्य मार्ग के रूप में तय हुआ कि मुझे स्कूल के प्रबंधन के साथ एक निश्चित मानदेय ₹500 प्रति माह के साथ जोड़ दिया जाए और मैं प्रत्यक्ष रूप में ही सही, स्कूल को इंटर कॉलेज बनाने के काम को आगे बढ़ाऊं। हमने और उत्साह व तेजी के साथ इंटर की कक्षाओं के लिए कक्ष बनाने हेतु चंदा व श्रमदान, दोनों कार्य प्रारंभ कर दिए। सारा इलाका उस समय इस अभियान का हिस्सा था। लोग छुट्टी लेकर घर आकर चंदा भी दे रहे थे और श्रमदान भी कर रहे थे। इस दौरान तीन दानवीर, स्वर्गीय श्री जीतराम जी की बड़ी भाभी, डुमना के मोती सिंह नेगी व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्री महेंद्र सिंह कठायत आगे आए और उन्होंने एक-एक कक्ष बनाने की घोषणा कर दी। कालांतर में कुछ और दानवीर भी आगे आए। सामूहिक प्रयासों से एक अभिनव उद्देश्य आगे बढ़ रहा था।

 

मैं अब भी लखनऊ व मोहनरी के मध्य फंसा पड़ा था। दोस्तों के पत्र व संदेश तथा विश्वविद्यालय की रूमानियत बार-बार लखनऊ की ओर खींच रही थीं, और इधर मैं इलाके में एक बड़े अभियान का हिस्सा बन गया था। मैं एक जबरदस्त उलझन में था ही, उन्हीं दिनों गांव पंचायतों व क्षेत्र पंचायतों के चुनाव भी घोषित हुए और गांव में एक नई चर्चा व चहल-पहल प्रारंभ हो गई। हमारे गांव में उस समय तक प्रधान निर्विरोध चुने जाते थे। इस बार गांव के लोग नाथू काका अर्थात नाथू सिंह को प्रधान बनाना चाहते थे। वे अड़ गए कि यदि हरीश अर्थात मैं उपप्रधान बनने को तैयार हूं, तो तभी प्रधान का पर्चा खरीदेंगे। उपप्रधान कोई पद न होकर गांव की अपनी व्यवस्था होती थी। वस्तुतः पंचायत सदस्य ही उपप्रधान प्रतिनिधि होता था। गांव में तय हुआ कि मैं, नाथू सिंह जी व मोहन चाचा, सबके लिए पर्चा खरीद लायेंगे। मोहन चाचा दिल्ली में ई.डी. पोस्टल कर्मचारियों के नेता थे। हम तीनों पर्चा खरीदने ब्लॉक में पहुंचे। हम में से कोई भी न बीडीओ को, न किसी और को जानता था। एक कक्ष में 5-6 व्यक्ति बैठे थे। इनमें से चार लोगों ने खादी के कुर्ते, वास्कट आदि पहने थे। मैं आगे था। मैंने सबको हाथ जोड़ते हुए पूछा कि पर्चा कहां से मिलेगा, हम पर्चा खरीदना चाहते हैं। उपस्थित लोगों में से एक व्यक्ति ने ऊंची आवाज में पूछा कि क्या प्रमुख का पर्चा खरीदोगे। उनके कहने के अंदाज व उसके बाद लगे ठहाके के मध्य मोहन चाचा ने कहा कि हां, प्रमुख का पर्चा भी खरीद लेंगे, बता दीजिए कहां मिलेगा। वहां बैठे हुए महानुभावों को मैं बहुत बाद में पहचान पाया। बीडीओ साहब के अलावा विधान परिषद सदस्य स्वर्गीय श्री बी.डी. शर्मा, प्रधानाचार्य स्वर्गीय श्री मोतीराम रिखाड़ी, वरिष्ठ प्रधान श्री शंभू सिंह के अलावा दो और ब्लॉक के कर्मचारी उस समय उस कक्ष में थे। हमें पर्चा काटने वाले अपने साथ साइड की टेबल पर ले गए और हमने प्रधान व क्षेत्र पंचायत सदस्यों के पर्चे कटवाए। फीस जमा की। श्री रिखाड़ी जी फिर व्यंग्य किया और कहा कि भाई काटो न प्रमुख का पर्चा। मोहन चचा ने पैसे निकाले व मेरे नाम का पर्चा कटवा दिया। हमने मामले को बहुत गंभीरता से नहीं लिया, परंतु शाम तक जब हम अपने इलाके में लौटे तो यह खबर चारों तरफ फैल गई कि हरीश ने प्रमुख का पर्चा भर दिया है। रात तो बीत गई। सुबह हमारी श्रमदान चौकड़ी घर पर ही आ गई। हम में से किसी को मालूम नहीं था कि प्रमुख क्या होता है, उसके लिए न्यूनतम अर्हता क्या है। जोर-शोर में सब कहने लगे कि लड़ लेते हैं। बहुत विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि इलाके के बड़े लोगों, जिनमें मामा जी भी सम्मिलित थे, उनसे परामर्श कर लेते हैं। लड़ने व न लड़ने पर इसके साथ ही निर्णय होगा। संयोग देखिए, मामा जी सहित इलाके के सभी लोग मुझे प्रमुख का चुनाव लड़ाने के लिए एकमत हो गए। हमारी टोली ने व्यवस्था की कि हम नाम वापस लेने के दिन विकासखंड जाने की बजाय सुबह सब लोग हमारे घर पर इकट्ठा होकर इलाके में चुनाव अभियान को निकल पड़ेंगे।

 

नाम वापसी का दिन हमारे चुनाव अभियान का दिन बन गया। हमारे पर्चे पर विकासखंड में किसी ने कुछ भी गौर नहीं किया। कहीं कोई चर्चा भी नहीं थी। चर्चा निवर्तमान ब्लॉक प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय श्री जयदत्त बेला और एडवोकेट स्वर्गीय श्री हरीश लकचौरा जी तक सीमित थी। चुनाव अभियान प्रारंभ करने से पहले सब लोग हमारे घर पर एकत्र हुए। मां ने पूरी-आलू खिलाई। चर्चा में बार-बार पैसों का जिक्र आ रहा था। हरीश लकचौरा जी के पैसा बिछा देने का भी जिक्र आ रहा था। हमारे अभियान पर निकलने से पहले मां गुड़ व दही लाई। हम सबको खाने को दिया। मां ने अपनी धोती की गांठ खोलकर 27 रुपए मेरे हाथ में रखे और जोर से कहा कि यदि पैसों की ही बात आएगी तो पीछे मत हटना। तुम्हारे पिताजी की छोड़ी काफी जमीन है, कुछ बेच देंगे, लड़ना डटकर लड़ना।

 

मां के दिए रुपयों में से केवल ₹2 खर्च हुए, ₹25 वापस आ गए। मैं ब्लॉक प्रमुख हो गया था। उपप्रधान का पर्चा भरने के बने संयोग ने प्रमुख बना दिया। आगे भी खूब लड़ा, अब भी लड़ ही रहा हूं। मां के शब्द—”लड़ना, डटकर लड़ना”, जमीन बेच देंगे—मुझे आज भी प्रेरित करते हैं। हां, अब मैं जिंदा रहने की जंग लड़ रहा हूं। मगर यहां भी मां के शब्द ही बार-बार कानों में गूंजते हैं।

 

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