उत्तराखण्ड
MBPG हल्द्वानी : अपनों की बगावत में बिखरा एबीवीपी का गणित, निर्दलीय आर्यन ने रचा इतिहास
MBPG हल्द्वानी : अपनों की बगावत में बिखरा एबीवीपी का गणित, निर्दलीय आर्यन ने रचा इतिहास
एमबीपीजी में ‘एबीवीपी बनाम एबीवीपी’ की लड़ाई में संगठन का अधिकृत प्रत्याशी तीसरे पायदान पर, आर्यन बेलवाल 466 वोट से जीते
हल्द्वानी। मोतीराम बाबूराम राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय (एमबीपीजी) के छात्रसंघ चुनाव में इस बार जो सियासी पटकथा लिखी गई, उसका सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि एबीवीपी के अधिकृत प्रत्याशी को चुनौती किसी बाहरी संगठन ने नहीं, बल्कि संगठन से जुड़े ही एक बागी चेहरे ने दी। अध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी आर्यन बेलवाल ने 1723 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी एनएसयूआई के मेहुल शाह को 466 वोटों से पीछे छोड़ा। एबीवीपी के अधिकृत प्रत्याशी धीरज बिष्ट 988 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। 18 राउंड की मतगणना के दौरान आर्यन की बढ़त लगातार बनी रही और अंतिम दौर में उनकी जीत पर मुहर लग गई।
टिकट ने खोली बगावत की राह
इस चुनाव की कहानी परिणाम से कहीं पहले लिखी जा चुकी थी। अध्यक्ष पद के लिए एबीवीपी के भीतर आर्यन बेलवाल और धीरज बिष्ट की दावेदारी चर्चा में थी। संगठन ने अंततः धीरज बिष्ट को अधिकृत प्रत्याशी घोषित किया। इसके बाद टिकट से असंतुष्ट आर्यन बेलवाल ने निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला किया। टिकट वितरण के विरोध में संगठन से जुड़े कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के इस्तीफे की बात भी सामने आई।
यहीं से चुनाव का पूरा समीकरण बदल गया। मुकाबला सीधे तौर पर एबीवीपी बनाम एनएसयूआई नहीं रहा, बल्कि एक तरफ एबीवीपी का अधिकृत प्रत्याशी धीरज बिष्ट, दूसरी तरफ एनएसयूआई के मेहुल शाह और तीसरी ओर एबीवीपी से जुड़े रहे आर्यन बेलवाल के बीच त्रिकोणीय मुकाबला बन गया। चुनाव से पहले ही इसे संगठन के लिए बड़ी परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था।
बागी चेहरे के पीछे खड़ा हुआ संगठन का एक धड़ा
आर्यन बेलवाल के निर्दलीय मैदान में उतरने के साथ ही संगठन से जुड़े कई पुराने कार्यकर्ताओं और पूर्व पदाधिकारियों का समर्थन उनके साथ दिखाई दिया। इससे चुनावी मैदान में एक अलग ही तस्वीर बन गई। संगठन के भीतर सक्रिय रहे चेहरे अधिकृत प्रत्याशी के बजाय आर्यन के समर्थन में दिखाई दिए और देखते ही देखते यह लड़ाई छात्रसंघ चुनाव से आगे संगठनात्मक ताकत के प्रदर्शन जैसी नजर आने लगी।
आर्यन के समर्थन में एबीवीपी के कई पदाधिकारियों के नाम सामने आए। संगठन के भीतर इस्तीफों और विरोध के घटनाक्रम ने इस बगावत को और बड़ा बना दिया।
पूर्व छात्र नेताओं और भाजपा से जुड़े चेहरों की मौजूदगी ने बढ़ाया मुकाबले का वजन
चुनाव प्रचार के दौरान एमबीपीजी के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्षों और भाजपा से जुड़े कई चेहरों की सक्रियता भी चर्चा में रही।
इनमें दीपक सनवाल, जगदीश बिष्ट और चंद्र प्रकाश तिवारी आर्यन के समर्थन में पूर्व कई पुराने छात्र नेता मैदान में दिखाई दिए। इससे आर्यन के अभियान को संगठन से बाहर भी व्यापक समर्थन मिलने की तस्वीर बनी।
आर्यन की सबसे बड़ी ताकत उनका कॉलेज परिसर में लंबे समय से बना छात्र संपर्क और संगठन से जुड़ी पृष्ठभूमि रही। टिकट नहीं मिलने के बाद उनका निर्दलीय मैदान में उतरना ही चुनाव की सबसे बड़ी कहानी बन गया। चुनाव प्रचार के दौरान उनका नंगे पैर अभियान चलाना भी चर्चा का विषय रहा।
पहले राउंड से आखिरी राउंड तक बढ़त, अंत में 466 वोट का अंतर
मतगणना शुरू हुई तो आर्यन ने पहले राउंड से ही बढ़त बना ली थी। पहले राउंड में आर्यन को 146, मेहुल शाह को 88 और धीरज बिष्ट को 85 वोट मिले थे। इसके बाद लगभग हर चरण में आर्यन अपनी बढ़त बनाए रखने में सफल रहे। 15वें राउंड तक आर्यन 1419 वोट लेकर मेहुल शाह से 335 वोट आगे थे, जबकि धीरज बिष्ट 802 वोट पर थे।
अंतिम 18 राउंड की मतगणना पूरी होने के बाद आर्यन बेलवाल के खाते में 1723 वोट आए। मेहुल शाह को 1257 और धीरज बिष्ट को 988 वोट मिले। इस तरह आर्यन ने मेहुल को 466 वोटों के अंतर से हराकर अध्यक्ष पद पर कब्जा कर लिया।
एबीवीपी के लिए नतीजे में छिपा सबसे बड़ा संदेश
एमबीपीजी चुनाव का सबसे अहम राजनीतिक संकेत यह रहा कि एबीवीपी के अधिकृत प्रत्याशी को अध्यक्ष पद पर तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा, जबकि संगठन से जुड़े रहे आर्यन बेलवाल ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की। यानी संगठन का टिकट भले ही धीरज बिष्ट के पास रहा, लेकिन चुनावी मैदान में संगठन से जुड़े एक बड़े धड़े का समर्थन आर्यन के साथ जाता दिखाई दिया।
इसी वजह से एमबीपीजी छात्रसंघ चुनाव का यह परिणाम केवल एक अध्यक्ष के निर्वाचन तक सीमित नहीं माना जा रहा। इस चुनाव ने टिकट वितरण, संगठन के भीतर की नाराजगी, पुराने छात्र नेताओं की भूमिका और निर्दलीय प्रत्याशी की ताकत—इन सभी पहलुओं को एक साथ सामने ला दिया है। आर्यन की जीत ने एमबीपीजी की छात्र राजनीति में एक ऐसा अध्याय जोड़ दिया है, जिसमें मुकाबला बाहर से आए प्रतिद्वंद्वी से कम और अपनों के बीच ज्यादा दिखाई दिया।

