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नवरात्र में धामी कैबिनेट विस्तार: इन चेहरों पर टिकी नजरें, सियासी समीकरण साधने की बड़ी तैयारी

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उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार में लंबे समय से प्रतीक्षित कैबिनेट विस्तार को लेकर अब तस्वीर काफी हद तक साफ होती नजर आ रही है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी संगठन और सरकार के बीच कई दौर की बैठकों और मंथन के बाद अब उन नामों पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है जिन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक इस बार विस्तार केवल औपचारिकता नहीं होगा, बल्कि इसे सीधे तौर पर आगामी उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।

मौजूदा समय में धामी मंत्रिमंडल में पांच पद खाली हैं और इन पदों पर नियुक्ति को लेकर पार्टी के भीतर काफी उत्सुकता और प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है। जिन नामों की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है, उनमें वरिष्ठ विधायक बिशन सिंह चुफाल का नाम सबसे आगे माना जा रहा है। चुफाल लंबे समय से पार्टी के मजबूत स्तंभ रहे हैं और कई बार मंत्री भी रह चुके हैं, लेकिन वर्तमान सरकार में उन्हें जगह नहीं मिली थी। ऐसे में संगठन के भीतर यह धारणा बनी हुई है कि उन्हें दोबारा कैबिनेट में शामिल कर अनुभव और संतुलन दोनों साधे जा सकते हैं। कुमाऊं क्षेत्र से उनका मजबूत जनाधार भी उनके पक्ष में जाता है और पार्टी के लिए क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है।

इसी क्रम में देहरादून के राजपुर क्षेत्र से विधायक खजान दास का नाम भी तेजी से उभरा है। खजान दास को पार्टी का जमीनी और सक्रिय नेता माना जाता है, जिन्होंने संगठन के लिए लंबे समय तक काम किया है। सामाजिक समीकरण की दृष्टि से भी उनका नाम महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि भाजपा इस विस्तार के जरिए दलित प्रतिनिधित्व को मजबूत करने का प्रयास कर सकती है। शहरी क्षेत्र से उनका प्रतिनिधित्व और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें मजबूत दावेदार बनाती है।

देहरादून क्षेत्र से ही सहसपुर विधायक सहदेव पुंडीर का नाम भी चर्चा में है। पुंडीर को संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल रखने वाला नेता माना जाता है। वे लगातार सक्रिय रहे हैं और मुख्यमंत्री के करीबी माने जाते हैं। हालांकि देहरादून क्षेत्र से पहले से प्रतिनिधित्व होने के कारण उनके नाम पर अंतिम निर्णय संतुलन के आधार पर ही लिया जाएगा। यदि पार्टी को लगता है कि क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित नहीं होगा तो उन्हें भी मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है।

गढ़वाल क्षेत्र से संतुलन साधने के लिए सुरेश चौहान का नाम भी अंदरखाने चर्चा में है। चौहान संगठन में मजबूत पकड़ रखने वाले नेता माने जाते हैं और पार्टी कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता लगातार बनी रहती है। उनका नाम भले ही सार्वजनिक चर्चाओं में ज्यादा सामने नहीं आया हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उन्हें एक संभावित सरप्राइज एंट्री के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा अक्सर ऐसे चेहरों को आगे लाती है जो संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित रहे हों और जिनकी छवि विवादों से दूर हो।

इसके अलावा कुछ अन्य नाम भी दावेदारी में माने जा रहे हैं, जिनमें क्षेत्रीय और जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए अंतिम सूची तैयार की जा सकती है। पार्टी इस बार केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं बल्कि पिछले चार वर्षों के कार्यों, जनसंपर्क, संगठन से तालमेल और चुनावी उपयोगिता को ध्यान में रखकर फैसला करेगी। यही कारण है कि कई ऐसे विधायक भी अचानक चर्चा में आ गए हैं जो अब तक सुर्खियों से दूर थे लेकिन संगठन में लगातार सक्रिय रहे हैं।

कैबिनेट विस्तार को लेकर सबसे अहम पहलू यह है कि इस बार भाजपा किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। 2027 का चुनाव पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और वह लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की रणनीति पर काम कर रही है। ऐसे में मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने वाले चेहरे केवल प्रशासनिक दृष्टि से नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी मजबूत होने चाहिए। यही वजह है कि चयन प्रक्रिया को काफी गोपनीय रखा गया है और अंतिम सूची को केंद्रीय नेतृत्व की मंजूरी के बाद ही सार्वजनिक किया जाएगा।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस विस्तार के जरिए भाजपा एक साथ कई संदेश देना चाहती है। पहला, पार्टी अपने अनुभवी नेताओं को नजरअंदाज नहीं करती और समय आने पर उन्हें उचित स्थान देती है। दूसरा, संगठन के प्रति समर्पित और जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेताओं को भी मौका दिया जाएगा। तीसरा, सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखते हुए सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की जाएगी।

इसके साथ ही यह भी माना जा रहा है कि कैबिनेट विस्तार के साथ-साथ दायित्वधारियों की नियुक्ति भी की जाएगी। निगमों, बोर्डों और आयोगों में कई पद खाली हैं और इन पदों पर पार्टी के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देकर संगठन को और मजबूत किया जाएगा। इससे उन नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी संतुष्ट किया जा सकेगा जिन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाएगी। भाजपा की यह रणनीति पहले भी सफल रही है और इस बार भी उसी मॉडल को अपनाने की संभावना है।

कैबिनेट विस्तार का असर केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव जमीनी राजनीति पर भी पड़ेगा। जिन विधायकों को मंत्री बनाया जाएगा, उनके क्षेत्रों में राजनीतिक माहौल बदल जाएगा और उन्हें आगामी चुनाव में सीधा लाभ मिल सकता है। वहीं जिन नेताओं को मौका नहीं मिलेगा, उनके सामने अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती होगी। ऐसे में पार्टी के लिए संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भाजपा एंटी-इंकम्बेंसी को कम करने की दिशा में भी काम कर रही है। लंबे समय से एक ही चेहरे को पद पर बनाए रखने से जनता में असंतोष बढ़ सकता है, इसलिए नए चेहरों को शामिल कर सरकार एक नई ऊर्जा और संदेश देना चाहती है। यह कदम चुनावी दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो उत्तराखंड में प्रस्तावित कैबिनेट विस्तार केवल पदों की पूर्ति नहीं बल्कि एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। पुष्कर सिंह धामी के सामने चुनौती यह है कि वे ऐसा संतुलन स्थापित करें जिससे न केवल सरकार मजबूत हो बल्कि संगठन भी संतुष्ट रहे और आगामी चुनाव में पार्टी को इसका सीधा लाभ मिल सके। आने वाले दिनों में जैसे ही इस विस्तार की औपचारिक घोषणा होगी, राज्य की राजनीति में नए समीकरण देखने को मिलेंगे और यह तय करेगा कि 2027 के चुनाव की दिशा किस ओर जाएगी।

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