उत्तराखण्ड
भाजपा में वंशवाद नहीं, फिर कालाढूंगी में पिता-पुत्र दोनों की टिकट दावेदारी को लेकर बंशीधर भगत के बयान ने खड़े किए सवाल
भाजपा में वंशवाद नहीं, फिर कालाढूंगी में पिता-पुत्र दोनों की टिकट दावेदारी को लेकर बंशीधर भगत के बयान ने खड़े किए सवाल
**35 साल की सियासत, मंत्री पद से प्रदेश अध्यक्ष तक का सफर… अब बेटे के लिए टिकट की दावेदारी, तो दूसरे भाजपाइयों का क्या होगा?**
हल्द्वानी। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच कालाढूंगी की राजनीति में भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक बंशीधर भगत के बयान ने टिकट की दावेदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उनके इस कथन कि कालाढूंगी विधानसभा सीट से टिकट की दौड़ में वह भी हैं और उनका बेटा भी, जिसे टिकट मिलेगा वही चुनाव लड़ेगा, ने पार्टी के भीतर परिवारवाद, वरिष्ठता और दूसरे दावेदारों के राजनीतिक भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भाजपा लंबे समय से परिवारवाद को विपक्षी दलों के खिलाफ एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाती रही है। ऐसे में कालाढूंगी सीट पर पिता और पुत्र दोनों की दावेदारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर तब, जब बंशीधर भगत दशकों से सक्रिय राजनीति में हैं और उत्तर प्रदेश के दौर से लेकर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद तक मंत्री तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर जिम्मेदारी निभा चुके हैं।
भगत का राजनीतिक सफर वर्ष 1975 में जनसंघ से जुड़ने के साथ शुरू हुआ। वह 1991 में अविभाजित उत्तर प्रदेश की नैनीताल विधानसभा सीट से पहली बार विधायक बने और बाद में उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी उन्होंने मंत्री पद संभाला। हल्द्वानी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के बाद वह कालाढूंगी से भी लगातार चुनावी मैदान में उतरते रहे। इस लंबे राजनीतिक सफर के बीच अब उनके बेटे की दावेदारी चर्चा में है।
**दूसरे दावेदारों ने भी तो पार्टी के लिए छोड़ी होगी अपनी दावेदारी!**
इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू कालाढूंगी विधानसभा सीट पर भाजपा के दूसरे नेताओं की दावेदारी से जुड़ा है। जब बंशीधर भगत लगातार चुनाव लड़ते रहे, तब पार्टी में ऐसे कई कार्यकर्ता और स्थानीय नेता भी रहे होंगे, जिनकी नजर विधानसभा के टिकट पर रही होगी। राजनीतिक परिस्थितियों और संगठन के फैसले को देखते हुए उन्होंने अपनी दावेदारी पीछे रखी होगी। संभव है कि पार्टी की प्रतिष्ठा और संगठनात्मक अनुशासन को प्राथमिकता देते हुए कई नेताओं ने चुनाव में भगत के सामने अलग राह चुनने से परहेज किया हो।
संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए यह स्वाभाविक अपेक्षा होती है कि उन्हें भी एक दिन विधानसभा चुनाव लड़ने का अवसर मिले। यदि कोई नेता लगातार उसी सीट से चुनाव लड़ता रहे, तो दूसरे दावेदारों के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब पार्टी उन नेताओं के राजनीतिक योगदान, क्षेत्र में उनकी सक्रियता और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा का भी मूल्यांकन करेगी, जो वर्षों से अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
बंशीधर भगत का राजनीतिक अनुभव और पार्टी के प्रति योगदान अपनी जगह है, लेकिन किसी भी सीट पर लंबे समय तक एक ही चेहरे की दावेदारी बने रहने से दूसरे नेताओं की राजनीतिक संभावनाओं पर क्या असर पड़ता है, यह भी विचारणीय विषय है। अगर पार्टी के अन्य नेताओं ने संगठन के फैसले का सम्मान करते हुए अपनी दावेदारी को पीछे रखा, तो क्या अब उनके लिए भी रास्ता खुलना चाहिए? यह सवाल केवल कालाढूंगी तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर अवसरों के वितरण और नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति से भी जुड़ा है।
**उम्र और नए नेतृत्व को लेकर भी उठ रहे सवाल**
बंशीधर भगत की उम्र और उनके लंबे राजनीतिक अनुभव को देखते हुए नेतृत्व के हस्तांतरण पर चर्चा होना भी स्वाभाविक है। हालांकि उम्र अपने आप में किसी नेता की चुनाव लड़ने की क्षमता का अंतिम पैमाना नहीं है, लेकिन जब कोई वरिष्ठ नेता दशकों तक राजनीति में सक्रिय रहने के बाद भी उसी सीट से अपनी दावेदारी बनाए रखता है, तो नए नेतृत्व को अवसर देने का प्रश्न जरूर उठता है।
यदि भगत स्वयं चुनाव लड़ने के बजाय अपने बेटे के लिए टिकट चाहते हैं, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि पार्टी इस दावेदारी को किस आधार पर परखेगी। और यदि वह स्वयं चुनाव लड़ना चाहते हैं, तो फिर बेटे की दावेदारी का राजनीतिक अर्थ क्या होगा? उनका यह कहना कि दोनों में से जिसे टिकट मिलेगा, वही चुनाव लड़ेगा, पार्टी के निर्णय को स्वीकार करने की बात भी हो सकती है। लेकिन इससे यह सवाल समाप्त नहीं होता कि लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे दूसरे नेताओं के लिए अवसर कब आएगा।
**वंशवाद के विरोध और टिकट वितरण की कसौटी पर भाजपा**
भाजपा विपक्षी दलों पर परिवारवाद का आरोप लगाते हुए यह तर्क देती रही है कि राजनीतिक अवसर किसी परिवार की निजी संपत्ति नहीं होने चाहिए। ऐसे में पार्टी के अपने वरिष्ठ नेताओं के परिवारों की दावेदारी सामने आने पर उसके सिद्धांतों की कसौटी पर चर्चा होना स्वाभाविक है। किसी नेता के बेटे को टिकट देना अपने आप में परिवारवाद का अंतिम प्रमाण नहीं है; उसका राजनीतिक अनुभव, संगठन में योगदान और जनता के बीच काम भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। लेकिन यही कसौटी अन्य दावेदारों पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए।
कालाढूंगी में भाजपा के सामने चुनौती केवल उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि वर्षों से काम कर रहे कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाने की भी है कि पार्टी में अवसर का रास्ता खुला है। यदि संगठन के प्रति निष्ठा रखने वाले नेता बार-बार अपनी दावेदारी पीछे रखते रहे हैं, तो उनकी भूमिका और संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
बंशीधर भगत का राजनीतिक योगदान अपनी जगह है और उनके बेटे की दावेदारी अपनी जगह। लेकिन कालाढूंगी विधानसभा सीट किसी एक परिवार की राजनीतिक विरासत है या भाजपा के सभी योग्य दावेदारों के लिए खुला अवसर—यह सवाल अब पार्टी के सामने है। आखिरकार टिकट का फैसला नेतृत्व को करना है, मगर उस फैसले में वरिष्ठता के साथ-साथ नए नेतृत्व, संगठनात्मक योगदान और कार्यकर्ताओं की लंबे समय से चली आ रही अपेक्षाओं को किस तरह जगह मिलती है, इस पर सबकी नजर रहेगी।
