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उत्तराखण्ड

स्टिंग करने वाले उमेश कुमार पर हरीश रावत का ‘कूटनीतिक’ जवाब, न हां न ना…कहा- कांग्रेस के लिए जो अच्छा हो, वही होना चाहिए”

मनोज लोहनी, देहरादून

उत्तराखंड की राजनीति में कुछ रिश्ते ऐसे हैं, जिनकी कहानी सिर्फ आज के बयानों से नहीं समझी जा सकती। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और खानपुर विधायक उमेश कुमार का रिश्ता भी इसी श्रेणी में आता है। कभी एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े नजर आए रावत और उमेश कुमार अब एक ऐसे राजनीतिक मोड़ पर दिखाई दे रहे हैं, जहां उमेश कुमार के कांग्रेस में आने की संभावना को लेकर सवाल पूछा गया तो हरीश रावत ने सीधे तौर पर न तो हां कहा और न ही ना।
सवाल था कि क्या उमेश कुमार को कांग्रेस में आना चाहिए? हरीश रावत का जवाब था—जो कांग्रेस के लिए अच्छा हो, वही होना चाहिए। एएनआई से बातचीत में हरीश रावत का यह बयान अब काफी चर्चा में आ गया है।

सियासत में यह छोटा-सा जवाब अपने भीतर कई बड़े संकेत समेटे हुए है। खास तौर पर इसलिए कि उमेश कुमार वही नाम हैं, जिनकी पत्रकारिता के दौर में किए गए स्टिंग ऑपरेशन ने 2016 में हरीश रावत की सरकार को जबरदस्त राजनीतिक संकट के केंद्र में ला दिया था। उस दौर में स्टिंग को लेकर रावत और उमेश कुमार आमने-सामने थे और रावत ने स्टिंग को फर्जी और बनावटी तक बताया था।

 

यानी सवाल सिर्फ किसी राजनीतिक व्यक्ति के कांग्रेस में आने का नहीं था। सवाल उस व्यक्ति का था, जिसने कभी हरीश रावत की सरकार और उनकी राजनीतिक शैली को कैमरे के सामने चुनौती दी थी। ऐसे में अगर रावत साफ शब्दों में उमेश कुमार का विरोध करते तो इसे व्यक्तिगत और पुराने राजनीतिक टकराव से जोड़कर देखा जा सकता था। दूसरी तरफ अगर वे खुले तौर पर समर्थन करते तो इसे पुराने विवादों के ऊपर राजनीतिक जरूरत को रखने का संकेत माना जाता।
रावत ने इन दोनों रास्तों से बचते हुए फैसला कांग्रेस के हित पर छोड़ दिया। यही उनके जवाब की राजनीतिक दिलचस्पी है।
‘व्यक्ति’ से ज्यादा ‘पार्टी हित’ को आगे रखा
हरीश रावत के जवाब को एक तरह की राजनीतिक दूरी के तौर पर भी देखा जा सकता है। उन्होंने उमेश कुमार के पक्ष में कोई व्यक्तिगत समर्थन नहीं दिया, लेकिन उनके खिलाफ भी दरवाजा बंद नहीं किया। संदेश यह रहा कि फैसला किसी व्यक्ति के प्रति पसंद या नापसंद से नहीं, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक हित और चुनावी गणित से होना चाहिए।
यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड कांग्रेस आने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश में है। ऐसे समय में उमेश कुमार जैसे मुखर और संसाधन-संपन्न निर्दलीय विधायक को लेकर कांग्रेस के भीतर स्वाभाविक रूप से राजनीतिक गणित पर चर्चा हो सकती है।
उमेश कुमार 2022 में खानपुर से निर्दलीय विधायक बने। पत्रकारिता से राजनीति में आए उमेश कुमार की पहचान शुरू से ही सत्ता प्रतिष्ठान को चुनौती देने वाले चेहरे की रही है। 2024 में उन्होंने हरिद्वार लोकसभा सीट से भी निर्दलीय चुनाव लड़ा। यानी उनकी राजनीति किसी एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित रहने वाली राजनीति नहीं रही है।
पुराना ‘स्टिंग’ अब भी राजनीतिक स्मृति में
रावत और उमेश कुमार के बीच सबसे बड़ा संदर्भ 2016 का है। उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार के सामने आए राजनीतिक संकट के दौरान सामने आए स्टिंग ने राष्ट्रीय स्तर तक सुर्खियां बटोरी थीं। उस समय विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोपों और सरकार बचाने की कवायद के बीच स्टिंग राजनीतिक बहस का बड़ा हथियार बन गया था। बाद के वर्षों में भी यह प्रकरण पूरी तरह राजनीतिक स्मृति से बाहर नहीं हुआ। 2025 में सीबीआई की कार्रवाई के संदर्भ में भी 2016 का स्टिंग मामला फिर चर्चा में आया था।
यही वजह है कि आज उमेश कुमार के कांग्रेस में आने को लेकर हरीश रावत से पूछा गया सवाल सामान्य राजनीतिक सवाल नहीं था। इसमें अतीत भी था और 2027 का भविष्य भी।
रावत का जवाब क्या संकेत देता है?
रावत के जवाब की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने उमेश कुमार के कांग्रेस में आने की संभावना को खारिज नहीं किया। लेकिन उन्होंने इसके समर्थन में कोई व्यक्तिगत उत्साह भी नहीं दिखाया। यह अंतर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
इसे इस तरह भी पढ़ा जा सकता है कि रावत अब इस मामले को व्यक्तिगत टकराव के चश्मे से देखने के बजाय पार्टी की चुनावी जरूरत के तराजू पर छोड़ना चाहते हैं। आखिर राजनीति में पुराने विरोधी हमेशा पुराने विरोधी नहीं रहते और चुनावी समीकरण कई बार रिश्तों की पुरानी परिभाषाएं बदल देते हैं।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि हरीश रावत उमेश कुमार की कांग्रेस में एंट्री के पक्ष में हैं। उनके बयान से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि उन्होंने व्यक्तिगत असहमति को पार्टी के संभावित राजनीतिक फैसले के रास्ते में सार्वजनिक रूप से खड़ा नहीं किया।
यही शायद इस जवाब की असली सियासत है—जिस उमेश कुमार से कभी राजनीतिक टकराव इतना तीखा था कि स्टिंग उत्तराखंड की सत्ता के लिए संकट बन गया था, उसी उमेश कुमार पर आज हरीश रावत ने फैसला अपने हाथ में लेने के बजाय कांग्रेस के हित पर छोड़ दिया।
अब असली सवाल उमेश कुमार के कांग्रेस में आने का नहीं, बल्कि यह है कि अगर कभी यह सवाल वास्तव में पार्टी की मेज पर आता है तो कांग्रेस पुराने स्टिंग के अध्याय को देखेगी या 2027 के चुनावी गणित को?

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