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पचास साल की धुंध से बाहर आया जमरानी बांध: धामी के कार्यकाल में टूटी जड़ता… आज मुख्यमंत्री खुद करेंगे निरीक्षण

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  • आज जमरानी बांध उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ पचास साल का धुंधला अतीत पीछे छूटता नजर आ रहा है। जिस परियोजना को पीढ़ियों ने केवल कागज़ों पर देखा, वह अब धरातल पर आकार लेती हुई दिख रही है। यह बदलाव केवल एक सरकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है, जिसने विकास को घोषणाओं से निकालकर क्रियान्वयन तक पहुँचाया।कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यभार संभालने के बाद जमरानी बांध परियोजना ने वास्तव में प्रगति की राह पकड़ी। यदि यह गति बनी रहती है, तो जमरानी बांध आने वाले वर्षों में केवल जल प्रबंधन की परियोजना नहीं रहेगा, बल्कि उत्तराखंड में पचास साल से अटकी संभावनाओं के मुक्त होने का प्रतीक बन जाएगा।

हल्द्वानी। उत्तराखंड की महत्वाकांक्षी जमरानी बांध परियोजना का इतिहास केवल एक विकास योजना का नहीं, बल्कि पचास वर्षों तक टलते फैसलों, बदलती सरकारों और ठहरी हुई प्रक्रियाओं का इतिहास रहा है। काग़ज़ों में यह परियोजना जितनी पुरानी है, ज़मीन पर उतनी ही अधूरी—और यही इसकी सबसे बड़ी त्रासदी रही।

जमरानी बांध की परिकल्पना पहली बार लगभग पांच दशक पहले की गई थी। तब उद्देश्य स्पष्ट था—भविष्य की बढ़ती आबादी के लिए पेयजल, कृषि के लिए सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण। लेकिन स्पष्ट उद्देश्य के बावजूद यह परियोजना समय के साथ फाइलों के जंगल में गुम होती चली गई। सर्वे हुए, रिपोर्टें बनीं, संशोधन हुए, पर निर्माण आगे नहीं बढ़ सका।

इन पचास वर्षों में सबसे बड़ा सवाल यह रहा कि परियोजना अटकी क्यों रही? कारण अनेक थे—भूमि अधिग्रहण की जटिलताएँ, वन एवं पर्यावरण स्वीकृतियों में देरी, लागत का बार-बार पुनर्मूल्यांकन, और सबसे अहम, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव। हर सरकार ने जमरानी बांध का उल्लेख तो किया, पर उसे प्राथमिकता की सूची में ऊपर नहीं ला सकी।उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी जमरानी बांध परियोजना की गति में कोई ठोस बदलाव नहीं आया। राज्य के गठन के साथ उम्मीद जगी थी कि स्थानीय जरूरतों को समझते हुए यह योजना तेज़ी से आगे बढ़ेगी, लेकिन नीतिगत अनिर्णय और प्रशासनिक ढिलाई ने इसे फिर ठहराव में डाल दिया।

यहीं से कहानी में निर्णायक मोड़ आता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यभार संभालने के बाद जमरानी बांध परियोजना को पहली बार घोषणाओं से निकालकर क्रियान्वयन के ट्रैक पर लाया गया। धामी सरकार ने इस परियोजना को केवल एक पुरानी विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की अनिवार्यता के रूप में देखा। धामी के नेतृत्व में परियोजना की लंबित स्वीकृतियों को समयबद्ध ढंग से आगे बढ़ाया गया, केंद्रीय स्तर पर समन्वय तेज़ किया गया और निर्माण कार्यों को वास्तविक रूप में गति मिली। दशकों से रुकी प्रक्रिया में पहली बार निर्माण मशीनों की आवाज़ सुनाई देने लगी—जो अपने आप में बदलाव का प्रतीक है।

जमरानी बांध अब केवल योजनाओं और बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थलीय निरीक्षण, कार्य प्रगति की समीक्षा और समयसीमा निर्धारण के दौर में प्रवेश कर चुका है।

मुख्यमंत्री का स्वयं निर्माणाधीन परियोजना स्थल का निरीक्षण करना इस बात का संकेत है कि सरकार इसे प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि परिणाम-केंद्रित परियोजना के रूप में आगे बढ़ा रही है।

पचास वर्षों की धुंध में लिपटी यह परियोजना आज जिस मुकाम पर खड़ी है, वह बताती है कि विकास केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि निर्णय लेने की हिम्मत से आगे बढ़ता है। जमरानी बांध की प्रगति यह संदेश भी देती है कि उत्तराखंड अब अटकी परियोजनाओं का राज्य नहीं, बल्कि अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प रखता है।यदि यही गति बनी रही, तो जमरानी बांध आने वाले समय में केवल जल प्रबंधन का साधन नहीं, बल्कि पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल की निर्णायक उपलब्धि के रूप में इतिहास में दर्ज होगा—और पचास वर्षों की प्रतीक्षा अंततः सार्थक सिद्ध होगी।

जमरानी को बिसराये जाने की पृष्ठभूमि में जब पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला, तब जमरानी बांध पहले से ही एक “भूली-बिसरी परियोजना” बन चुकी थी। लेकिन धामी सरकार ने इसे राजनीतिक बोझ नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता को सुधारने का अवसर माना। यहीं से फर्क साफ दिखने लगा।धामी के कार्यकाल में पहली बार जमरानी बांध को लेकर यह स्पष्ट किया गया कि यह परियोजना केवल हल्द्वानी की नहीं, बल्कि पूरे कुमाऊँ की जल-सुरक्षा से जुड़ी है। यही स्पष्टता पहले की सरकारों में नदारद रही। घोषणाओं से आगे बढ़कर निर्माण की प्रक्रिया शुरू होना, इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने राजनीतिक जोखिम उठाने का फैसला किया।मुख्यमंत्री का स्वयं निर्माणाधीन परियोजना स्थल का निरीक्षण करना महज़ औपचारिकता नहीं, बल्कि यह संदेश है कि अब इस परियोजना को फिर ठंडे बस्ते में नहीं जाने दिया जाएगा। यह शैली उन सरकारों से अलग है, जिन्होंने निरीक्षण से ज्यादा उद्घाटन पट्टिकाओं पर भरोसा किया।राजनीतिक रूप से देखें तो जमरानी बांध धामी सरकार के लिए परफॉर्मेंस बनाम प्रॉमिस का केस स्टडी बन चुका है। जहां पिछली सरकारें वादों में उलझी रहीं, वहीं मौजूदा सरकार ने परिणाम दिखाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। यही कारण है कि जमरानी बांध अब बहस का नहीं, प्रगति का विषय बन रहा है।

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संपादक

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