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“अगर यह सिर्फ फ्रॉड था, तो आरोपी फरार क्यों नहीं हुआ?”— जांच से जुड़ा सवाल सबसे बड़ा सवाल : मंशा क्या थी, विकास ढाका : हल्द्वानी में क्रिकेट इवेंट का सपना… कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त
दिल्ली से हल्द्वानी तक : क्रिकेट इवेंट की आड़ में रचा गया भ्रम का महल
क्रिकेट प्रतियोगिता के नाम पर बड़े सपने, बड़े चेहरे और बड़ा दिखावा—लेकिन जब परतें खुलीं, तो सामने आया एक ऐसा मामला जो अब भी कई सवाल छोड़ जाता है।विकास ढाका सिर्फ एक आरोपी है या किसी गहरी साजिश का चेहरा?
जब हल्द्वानी ने ‘बड़े क्रिकेट सपने’ पर भरोसा कर लियाहल्द्वानी कोई महानगर नहीं है, लेकिन यहां के लोग अवसर पहचानना जानते हैं। पहाड़ और मैदान के संगम पर बसे इस शहर में जब यह चर्चा शुरू हुई कि यहां एक बड़े स्तर की क्रिकेट प्रतियोगिता होने जा रही है, तो इसे केवल खेल आयोजन नहीं माना गया। इसे शहर की पहचान, युवाओं के भविष्य और व्यापारिक संभावनाओं से जोड़कर देखा गया।
इसी माहौल में हल्द्वानी में दाखिल हुआ एक नाम—विकास ढाका।दिल्ली से आए इस व्यक्ति ने खुद को एक साधारण आयोजक की तरह पेश नहीं किया। उसकी बातचीत में आत्मविश्वास था, दावों में विस्तार था और योजनाओं में चमक। वह बार-बार यह जताता रहा कि उसने पहले भी बड़े शहरों में क्रिकेट और स्पोर्ट्स इवेंट कराए हैं और उसके संपर्क भारतीय क्रिकेट सिस्टम तक हैं।
धीरे-धीरे शहर के कुछ बड़े व्यवसायियों से उसकी नज़दीकियां बढ़ीं। होटलों, दफ्तरों और बंद कमरों में बैठकों का दौर चला। निवेश, प्रचार और ब्रांड वैल्यू पर चर्चा होने लगी। यहीं से सवाल पूछने की जगह भरोसे ने ले ली।और यही वह मोड़ था, जहां कई समझदार दिमागों पर जैसे ढक्कन लग गया।
प“यह टूर्नामेंट नहीं, हल्द्वानी का ब्रांड बनेगा।”— विकास ढाका (बैठकों में दोहराया गया दावा)प्रवीण कुमार की मौजूदगी
भरोसे की अंतिम मुहर: किसी भी बड़े भ्रम को सच जैसा दिखाने के लिए एक चीज़ जरूरी होती है—विश्वसनीय चेहरा। विकास ढाका यह बात अच्छी तरह जानता था।जब यह खबर सामने आई कि भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व खिलाड़ी प्रवीण कुमार भी इस आयोजन से जुड़े हैं और वह हल्द्वानी आए हैं, तो शंकाओं की बची-खुची गुंजाइश भी खत्म हो गई। शहर में आम धारणा बन गई—“अगर राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी यहां मौजूद है, तो मामला फर्जी कैसे हो सकता है?”यहीं से आयोजन केवल कागज़ों और बातों से निकलकर दिखावे के स्तर पर पहुंच गया।
बैनर-पोस्टर और वह भव्यता जो अंदर से खोखली थी
कुछ ही दिनों में हल्द्वानी का चेहरा बदल गया।चौराहों, सड़कों और मैदानों के आसपास बड़े-बड़े बैनर, पोस्टर और फ्लेक्स लगने लगे।लोहे के भारी-भरकम पोल खड़े कर दिए गए।इन सभी प्रचार सामग्रियों का ठेका दिल्ली की एक कंपनी को दिया गया। शुरुआत में सब कुछ सामान्य लगा, लेकिन समय बीतने के साथ उस कंपनी को यह अहसास होने लगा कि भुगतान को लेकर लगातार टालमटोल की जा रही है।
बहानों की पटकथा : एक्सीडेंट से पिच तकप्रतियोगिता शुरू होने का दिन नजदीक आया।शहर तैयार था। खिलाड़ी इंतज़ार में थे।लेकिन ठीक एक दिन पहले पहला बहाना सामने आया—“मेरे पार्टनर का एक्सीडेंट हो गया है, इसलिए अभी टूर्नामेंट शुरू नहीं हो सकता।”कुछ दिन बाद दूसरा बहाना आया—“पिच खराब है, इसलिए प्रतियोगिता संभव नहीं है।”इन बहानों की श्रृंखला ने साफ कर दिया कि आयोजन केवल तारीखों पर टिका था, व्यवस्था और तैयारी कहीं नहीं थी।करीब एक महीने तक यह पूरा खेल हल्द्वानी में चलता रहा। हैरानी की बात यह रही कि इतने समय तक किसी को स्पष्ट रूप से यह अंदाज़ा नहीं हुआ कि क्रिकेट इवेंट के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है, वह महज़ दिखावा है।
प्रवीण कुमार का बयान और भरोसे का टूटना
जब बाद में क्रिकेटर प्रवीण कुमार से बातचीत हुई, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा—“इस पूरे मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।”उन्हें यह तक जानकारी नहीं थी कि उनके नाम और मौजूदगी का इस्तेमाल किस स्तर पर प्रचार और भरोसा जुटाने के लिए किया जा रहा है।यह बयान पूरे मामले को और गंभीर बना देता है।यह स्पष्ट हो गया कि नामों और चेहरों का इस्तेमाल केवल विश्वास पैदा करने के औज़ार के रूप में किया गया।
सबसे बड़ा सवाल….
गिरफ्तारी… लेकिन भागा नहीं आरोपी
आखिरकार पुलिस ने कार्रवाई की। विकास ढाका को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।लेकिन यहीं से यह मामला सामान्य ठगी से अलग हो जाता है। विकास ढाका भागा नहीं। वह हल्द्वानी में ही मौजूद रहा। शुरुआती जांच से लेकर गिरफ्तारी तक उसने पुलिस को पूरा सहयोग दिया।
“अगर यह सिर्फ फ्रॉड था, तो आरोपी फरार क्यों नहीं हुआ?”— जांच से जुड़ा सवाल सबसे बड़ा सवाल : मंशा क्या थी? यही वह बिंदु है जो इस पूरे मामले को असामान्य और संवेदनशील बना देता है। अगर उद्देश्य केवल फ्रॉड करना था, तो—वह शहर छोड़कर क्यों नहीं गया? गिरफ्तारी तक सामने क्यों बना रहा? पुलिस जांच में सहयोग क्यों करता रहा? पुलिस अब इन्हीं सवालों की तह तक जाने की कोशिश कर रही है।
अभी खत्म नहीं हुई कहानी
यह मामला केवल एक क्रिकेट टूर्नामेंट का नहीं है। यह उस सिस्टम का सवाल है,जहां प्रचार, नाम और दिखावे के सहारे पूरे शहर को एक सपना दिखाया जा सकता है।विकास ढाका इस कहानी का आखिरी अध्याय नहीं,शायद सिर्फ एक चेहरा है।कहानी अभी अधूरी है।परतें खुलनी बाकी हैं।






