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प्रबुद्ध भारत : भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान के सेतुकार स्वामी विवेकानंद का अमर स्वप्न, लोहाघाट मायावती से विश्व तक गूंजता वेदांत का संदेश, जहां चिंतन बना साधना और लेखन बना राष्ट्र-सेवा

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लोहाघाट। भारत की भौतिक उन्नति के साथ-साथ उसकी आध्यात्मिक चेतना को जाग्रत रखने का स्वप्न स्वामी विवेकानंद ने बहुत पहले देख लिया था। वे मानते थे कि यदि विज्ञान और तकनीकी ज्ञान को भारतीय दर्शन और सनातन ज्ञान-परंपरा से जोड़ा जाए, तो भारत न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि विश्व का मार्गदर्शक भी बनेगा। इसी दृष्टि से वे प्रारंभ से ही पूर्व और पश्चिम के बीच वैचारिक संवाद के पक्षधर रहे।इसी उद्देश्य को साकार करने के लिए उन्होंने एक ऐसे आश्रम की कल्पना की, जहां भारतीय और पाश्चात्य विचार सहज भाव से मिल सकें, चर्चा और चिंतन हो सके।

यही विचार आगे चलकर हिमालय की गोद में बसे मायावती आश्रम की स्थापना का आधार बना। यह वही हिमालयी क्षेत्र है, जहां अतीत में महान विचारों ने जन्म लिया और जहां से उठी चेतना ने विश्व को दिशा दी। शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में अपनी ओजस्वी वाणी से पूरी दुनिया को मानवता और भ्रातृभाव के सूत्र में बांधने के बाद, स्वामी विवेकानंद ने भारत लौटकर देश के कोने-कोने में भ्रमण किया। हर स्थान पर जनता ने उन्हें अपार श्रद्धा और भावनाओं के साथ स्वीकार किया। इसी प्रेरणा से उनके शिष्यों ने ठाकुर श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद की अमृतवाणी को वेदांत संदेश के रूप में संकलित कर जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।स्वामी विवेकानंद के भारत लौटने से पूर्व, वर्ष 1896 में चेन्नई के कुछ निष्ठावान शिष्यों ने अंग्रेजी भाषा में ‘प्रबुद्ध भारत’ मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। इसके संपादन का दायित्व विद्वान और प्रतिभाशाली बी.आर. अय्यर को सौंपा गया। यह पत्रिका शीघ्र ही स्वामी विवेकानंद के लिए आत्मा और परमात्मा के समान प्रिय बन गई। इसके माध्यम से ठाकुर श्रीरामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद के विचार जनमानस तक पहुंचने लगे।

हालांकि कुछ अपरिहार्य परिस्थितियों के कारण पत्रिका का प्रकाशन अस्थायी रूप से बंद हो गया, लेकिन स्वामी विवेकानंद ने इसे पुनर्जीवित करने का निश्चय किया। संपादन का कार्य स्वामी स्वरूपानंद जी महाराज को सौंपा गया और एक निर्जन, शांत स्थान की खोज की गई। इसी क्रम में मायावती को चुना गया, जिसे पूर्व में ‘मेंपट’ के नाम से जाना जाता था।19 मार्च 1899, ठाकुर श्रीरामकृष्ण जी के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर, मायावती में प्रबुद्ध भारत का पुनर्जन्म हुआ। स्वामी स्वरूपानंद जी अद्वैत आश्रम के प्रथम अध्यक्ष बने और प्रबुद्ध भारत के पहले संपादक भी। प्रारंभिक वर्षों में कठिन परिस्थितियों के बावजूद पत्रिका का प्रकाशन जारी रहा।21-22 जनवरी 1912 को प्रबुद्ध भारत भवन की नींव रखी गई और 2 अप्रैल 1914 को नए भवन से इसका प्रकाशन आरंभ हुआ। वर्ष 1923 तक मायावती से ही प्रबुद्ध भारत तथा अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन होता रहा।

कालांतर में इसका मुद्रण कोलकाता से होने लगा, जबकि संपादकीय कार्य, लेखन और वैचारिक संरचना आज भी मायावती में ही तैयार की जाती है। आज विश्व प्रसिद्ध “प्रबुद्ध भारत” पत्रिका के पाठक देश-विदेश के कोने-कोने में हैं, जो प्रत्येक नए अंक की प्रतीक्षा उत्सुकता से करते हैं। वर्तमान में इसके संपादक विद्वान स्वामी दिव्य कृपानंद जी महाराज हैं, जो अपनी प्रखर विचारधारा और समकालीन दृष्टि से पत्रिका को निरंतर नया कलेवर प्रदान कर रहे हैं। “प्रबुद्ध भारत” केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानंद के उस स्वप्न का सजीव प्रतीक है, जिसमें भारत की आत्मा आधुनिकता के साथ कदम मिलाते हुए विश्व का पथप्रदर्शक बनती है।

फोटो – मायावती में प्रबुद्ध भारत पत्रीका का पुराना भवन पीछे नया भवन आगे, संपादकीय कक्ष में प्रबुद्ध भारत के विचारों को समाहित करते संपादक। विश्व कल्याण के लिए दूरगामी सोच रखते स्वामी दिव्य कृपानंद।

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