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78 की उम्र, 10 साल का संकल्प: बंशीधर भगत और सक्रिय राजनीति की जिद

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राजनीति में पीढ़ी परिवर्तन की मांग करने वालों के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या लंबे समय तक एक ही चेहरा सक्रिय रहना नई नेतृत्व क्षमता के रास्ते में बाधा बनता है?


राजनीति में उम्र अक्सर रिटायरमेंट की चर्चा ले आती है, लेकिन कालाढूंगी के विधायक बंशीधर भगत ने इस धारणा को सिरे से खारिज कर दिया है। 78 वर्ष की उम्र में उनका यह ऐलान कि वे अगले दस साल तक राजनीति से रिटायर नहीं होंगे, सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं—बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में अनुभव, निरंतरता और सक्रियता की बहस को नया आयाम देने वाला वक्तव्य है।
बंशीधर भगत का राजनीतिक सफर तीन दशक से भी लंबा है। वर्ष 1991 से वे लगातार चुनावी राजनीति में सक्रिय हैं। यह वह दौर था जब अभिभाजित उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहाड़ और तराई—दोनों की चुनौतियां अलग-अलग थीं। उसी कालखंड में उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। प्रशासनिक अनुभव और जमीनी राजनीति की समझ ने उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में गढ़ा, जो चुनावी उतार-चढ़ाव के बावजूद टिके रहे।
कालाढूंगी विधानसभा क्षेत्र में उनकी पहचान एक अनुभवी, सुलझे हुए और संगठनात्मक पकड़ वाले नेता की रही है। क्षेत्रीय मुद्दों पर उनकी पकड़, नौकरशाही से संवाद और लंबे समय तक जनता के बीच मौजूदगी—ये सभी कारण हैं कि उम्र के इस पड़ाव पर भी वे खुद को राजनीति से अलग नहीं देखना चाहते। उनका कहना, दरअसल, यह संकेत देता है कि राजनीति केवल युवाओं की ऊर्जा से नहीं, बल्कि अनुभव की परिपक्वता से भी आगे बढ़ती है।
हालांकि, यह ऐलान आलोचनाओं से परे नहीं है। राजनीति में पीढ़ी परिवर्तन की मांग करने वालों के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या लंबे समय तक एक ही चेहरा सक्रिय रहना नई नेतृत्व क्षमता के रास्ते में बाधा बनता है? लेकिन दूसरी ओर, समर्थक इसे स्थिरता और अनुभव की जीत मानते हैं—खासतौर पर ऐसे समय में जब त्वरित फैसलों और अस्थिर राजनीति के आरोप आम हैं।
बंशीधर भगत का यह संकल्प अंततः एक व्यापक संदेश देता है—राजनीति में सक्रियता की कोई तय उम्र नहीं होती, बशर्ते स्वास्थ्य, जनसमर्थन और उद्देश्य स्पष्ट हों। अगले दस साल तक सक्रिय रहने का उनका दावा भविष्य के चुनावी परिदृश्य में कितना प्रभावी साबित होगा, यह समय बताएगा। फिलहाल, यह जरूर है कि 78 की उम्र में भी उनका आत्मविश्वास और राजनीतिक इच्छाशक्ति उत्तराखंड की राजनीति में चर्चा का केंद्र बन चुकी है।

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संपादक

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